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2-कुरिन्थियों अध्याय 3 — बाइबल पाठ, व्याख्या और मुख्य शिक्षाएँ

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01

मसीह की पत्री और नई वाचा के सेवक

पद 1–6
क्या हम फिर अपनी बड़ाई करने लगे? या हमें कितनों की नाईं सिफारिश की पत्रियां तुम्हारे पास लानी या तुम से लेनी हैं? 2 हमारी पत्री तुम ही हो, जो हमारे हृदयों पर लिखी हुई है, और उसे सब मनुष्य पहिचानते और पढ़ते हैं। 3 यह प्रगट है, कि तुम मसीह की पत्री हो, जिस को हम ने सेवकों की नाईं लिखा; और जो सियाही से नहीं, परन्तु जीवते परमेश्वर के आत्मा से पत्थर की पटियों पर नहीं, परन्तु हृदय की मांस रूपी पटियों पर लिखी है।
मुख्य विचार

विश्वासियों का बदला हुआ जीवन स्वयं मसीह की पत्री के समान दिखाई देता है; यह परिवर्तन परमेश्वर के आत्मा के कार्य से होता है।

4 हम मसीह के द्वारा परमेश्वर पर ऐसा ही भरोसा रखते हैं। 5 यह नहीं, कि हम अपने आप से इस योग्य हैं, कि अपनी ओर से किसी बात का विचार कर सकें; पर हमारी योग्यता परमेश्वर की ओर से है। 6 जिस ने हमें नई वाचा के सेवक होने के योग्य भी किया, शब्द के सेवक नहीं वरन आत्मा के; क्योंकि शब्द मारता है, पर आत्मा जिलाता है।
संदर्भित शिक्षा

सेवकाई की योग्यता का स्रोत मनुष्य की अपनी सामर्थ्य नहीं, बल्कि परमेश्वर है। नई वाचा की सेवकाई में आत्मा के जीवन देने वाले कार्य पर जोर दिया गया है।

02

पुरानी और नई वाचा की महिमा

पद 7–11
7 और यदि मृत्यु की यह वाचा जिस के अक्षर पत्थरों पर खोदे गए थे, यहां तक तेजोमय हुई, कि मूसा के मुंह पर के तेज के कारण जो घटता भी जाता था, इस्त्राएल उसके मुंह पर दृष्टि नहीं कर सकते थे। 8 तो आत्मा की वाचा और भी तेजोमय क्यों न होगी? 9 क्योंकि जब दोषी ठहराने वाली वाचा तेजोमय थी, तो धर्मी ठहराने वाली वाचा और भी तेजोमय क्यों न होगी?
10 और जो तेजोमय था, वह भी उस तेज के कारण जो उस से बढ़कर तेजामय था, कुछ तेजोमय न ठहरा। 11 क्योंकि जब वह जो घटता जाता था तेजोमय था, तो वह जो स्थिर रहेगा, और भी तेजोमय क्यों न होगा?
मुख्य विचार

अध्याय यहाँ उस महिमा का अंतर सामने रखता है जो घटती जाती थी और उस महिमा का जो स्थिर रहती है।

03

हियाव और पुराने नियम पर पड़ा परदा

पद 12–16
12 सो ऐसी आशा रखकर हम हियाव के साथ बोलते हैं। 13 और मूसा की नाईं नहीं, जिस ने अपने मुंह पर परदा डाला था ताकि इस्त्राएली उस घटने वाली वस्तु के अन्त को न देखें। 14 परन्तु वे मतिमन्द हो गए, क्योंकि आज तक पुराने नियम के पढ़ते समय उन के हृदयों पर वही परदा पड़ा रहता है; पर वह मसीह में उठ जाता है।
15 और आज तक जब कभी मूसा की पुस्तक पढ़ी जाती है, तो उन के हृदय पर परदा पड़ा रहता है। 16 परन्तु जब कभी उन का हृदय प्रभु की ओर फिरेगा, तब वह परदा उठ जाएगा।
संदर्भित शिक्षा

इस भाग में हृदय के प्रभु की ओर फिरने और परदा उठने की बात सामने आती है। अध्याय का जोर केवल बाहरी समझ पर नहीं, बल्कि हृदय के परिवर्तन पर है।

04

स्वतंत्रता और प्रभु के स्वरूप में परिवर्तन

पद 17–18
17 प्रभु तो आत्मा है: और जहां कहीं प्रभु का आत्मा है वहां स्वतंत्रता है। 18 परन्तु जब हम सब के उघाड़े चेहरे से प्रभु का प्रताप इस प्रकार प्रगट होता है, जिस प्रकार दर्पण में, तो प्रभु के द्वारा जो आत्मा है, हम उसी तेजस्वी रूप में अंश अंश कर के बदलते जाते हैं॥
मुख्य विचार

प्रभु की ओर देखते हुए विश्वासी धीरे-धीरे उसी तेजस्वी रूप में बदलता जाता है; यह परिवर्तन आत्मा के द्वारा होता है।

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