मकिदुनिया की उदारता और मसीह का अनुग्रह
पद 1–9
1अब हे भाइयों, हम तुम्हें परमेश्वर के उस अनुग्रह का समाचार देते हैं, जो मकिदुनिया की कलीसियाओं पर हुआ है। 2कि क्लेश की बड़ी परीक्षा में उन के बड़े आनन्द और भारी कंगालपन के बढ़ जाने से उन की उदारता बहुत बढ़ गई। 3और उनके विषय में मेरी यह गवाही है, कि उन्होंने अपनी सामर्थ भर वरन सामर्थ से भी बाहर मन से दिया। 4और इस दान में और पवित्र लोगों की सेवा में भागी होने के अनुग्रह के विषय में हम से बार बार बहुत बिनती की। 5और जैसी हम ने आशा की थी, वैसी ही नहीं, वरन उन्होंने प्रभु को, फिर परमेश्वर की इच्छा से हम को भी अपने तईं दे दिया। 6इसलिये हम ने तितुस को समझाया, कि जैसा उस ने पहिले आरम्भ किया था, वैसा ही तुम्हारे बीच में इस दान के काम को पूरा भी कर ले। 7सो जैसे हर बात में अर्थात विश्वास, वचन, ज्ञान और सब प्रकार के यत्न में, और उस प्रेम में, जो हम से रखते हो, बढ़ते जाते हो, वैसे ही इस दान के काम में भी बढ़ते जाओ। 8मैं आज्ञा की रीति पर तो नहीं, परन्तु औरों के उत्साह से तुम्हारे प्रेम की सच्चाई को परखने के लिये कहता हूं। 9तुम हमारे प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह जानते हो, कि वह धनी होकर भी तुम्हारे लिये कंगाल बन गया ताकि उसके कंगाल हो जाने से तुम धनी हो जाओ।
मकिदुनिया की कलीसियाओं ने अपने अभाव के बीच भी उदारता दिखाई। उनकी देने की भावना केवल उनकी सामर्थ पर नहीं, बल्कि परमेश्वर के अनुग्रह और प्रभु यीशु मसीह के उदाहरण पर आधारित थी।
दान में मन की तैयारी और बराबरी
पद 10–15
10और इस बात में मेरा विचार यही है, क्योंकि यह तुम्हारे लिये अच्छा है; जो एक वर्ष से न तो केवल इस काम को करने ही में, परन्तु इस बात के चाहने में भी प्रथम हुए थे। 11इसलिये अब यह काम पूरा करो; कि जैसा इच्छा करने में तुम तैयार थे, वैसा ही अपनी अपनी पूंजी के अनुसार पूरा भी करो। 12क्योंकि यदि मन की तैयारी हो तो दान उसके अनुसार ग्रहण भी होता है जो उसके पास है न कि उसके अनुसार जो उसके पास नहीं। 13यह नहीं कि औरों को चैन और तुम को क्लेश मिले। 14परन्तु बराबरी के विचार से इस समय तुम्हारी बढ़ती उनकी घटी में काम आए, ताकि उन की बढ़ती भी तुम्हारी घटी में काम आए, कि बराबरी हो जाए। 15जैसा लिखा है, कि जिस ने बहुत बटोरा उसका कुछ अधिक न निकला और जिस ने थोड़ा बटोरा उसका कुछ कम न निकला॥
दान का मूल्य केवल उसकी मात्रा में नहीं, बल्कि मन की तैयारी और अपनी सामर्थ के अनुसार देने में है। यहाँ उद्देश्य एक-दूसरे के अभाव और आवश्यकता में सहायता करके बराबरी लाना है।
तितुस और सहकर्मियों की सेवकाई
पद 16–24
16और परमेश्वर का धन्यवाद हो, जिस ने तुम्हारे लिये वही उत्साह तितुस के हृदय में डाल दिया है। 17कि उस ने हमारा समझाना मान लिया वरन बहुत उत्साही होकर वह अपनी इच्छा से तुम्हारे पास गया है। 18और हम ने उसके साथ उस भाई को भेजा है जिस का नाम सुसमाचार के विषय में सब कलीसिया में फैला हुआ है। 19और इतना ही नहीं, परन्तु वह कलीसिया से ठहराया भी गया कि इस दान के काम के लिये हमारे साथ जाए और हम यह सेवा इसलिये करते हैं, कि प्रभु की महिमा और हमारे मन की तैयारी प्रगट हो जाए। 20हम इस बात में चौकस रहते हैं, कि इस उदारता के काम के विषय में जिस की सेवा हम करते हैं, कोई हम पर दोष न लगाने पाए। 21क्योंकि जो बातें केवल प्रभु ही के निकट नहीं, परन्तु मनुष्यों के निकट भी भली हैं हम उन की चिन्ता करते हैं। 22और हम ने उसके साथ अपने भाई को भेजा है, जिस को हम ने बार बार परख के बहुत बातों में उत्साही पाया है; परन्तु अब तुम पर उस को बड़ा भरोसा है, इस कारण वह और भी अधिक उत्साही है। 23यदि कोई तितुस के विषय में पूछे, तो वह मेरा साथी, और तुम्हारे लिये मेरा सहकर्मी है, और यदि हमारे भाइयों के विषय में पूछे, तो वे कलीसियाओं के भेजे हुए और मसीह की महिमा हैं। 24सो अपना प्रेम और हमारा वह घमण्ड जो तुम्हारे विषय में है कलीसियाओं के साम्हने उन्हें सिद्ध करके दिखाओ॥
इस अध्याय में दान को केवल आर्थिक सहायता के रूप में नहीं, बल्कि विश्वास, प्रेम, मन की तैयारी और कलीसियाओं की सहभागिता से जुड़ी सेवकाई के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पौलुस साथियों की नियुक्ति और पारदर्शिता पर भी ध्यान देता है, ताकि सेवा प्रभु की महिमा के लिए हो और उस पर दोष न लगे।
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