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2-कुरिन्थियों अध्याय 13 — बाइबल पाठ, व्याख्या और मुख्य शिक्षाएँ

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बाइबल पाठ

01सत्यापन, चेतावनी और मसीह की सामर्थ (पद 1–4)

1अब तीसरी बार तुम्हारे पास आता हूं: दो या तीन गवाहों के मुंह से हर एक बात ठहराई जाएगी। 2जैसे जब दूसरी बार तुम्हारे साथ था, सो वैसे ही अब दूर रहते हुए उन लोगों से जिन्हों ने पहिले पाप किया, और और सब लोगों से अब पहिले से कहे देता हूं, कि यदि मैं फिर आऊंगा, तो नहीं छोडूंगा। 3तुम तो इस का प्रमाण चाहते हो, कि मसीह मुझ में बोलता है, जो तुम्हारे लिये निर्बल नहीं; परन्तु तुम में सामर्थी है। 4वह निर्बलता के कारण क्रूस पर चढ़ाया तो गया, तौभी परमेश्वर की सामर्थ से जीवित है, हम भी तो उस में निर्बल हैं; परन्तु परमेश्वर की सामर्थ से जो तुम्हारे लिये है, उसके साथ जीएंगे।

02अपने विश्वास को परखो (पद 5–10)

5अपने आप को परखो, कि विश्वास में हो कि नहीं; अपने आप को जांचो, क्या तुम अपने विषय में यह नहीं जानते, कि यीशु मसीह तुम में है नहीं तो तुम निकम्मे निकले हो। 6पर मेरी आशा है, कि तुम जान लोगे, कि हम निकम्मे नहीं। 7और हम अपने परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, कि तुम कोई बुराई न करो; इसलिये नहीं, कि हम खरे देख सकें, पर इसलिये कि तुम भलाई करो, चाहे हम निकम्मे ही ठहरें। 8क्योंकि हम सत्य के विरोध में कुछ नहीं कर सकते, पर सत्य के लिये कर सकते हैं। 9जब हम निर्बल हैं, और तुम बलवन्त हो, तो हम आनन्दित होते हैं, और यह प्रार्थना भी करते हैं, कि तुम सिद्ध हो जाओ। 10इस कारण मैं तुम्हारे पीठ पीछे ये बातें लिखता हूं, कि उपस्थित होकर मुझे उस अधिकार के अनुसार जिसे प्रभु ने बिगाड़ने के लिये नहीं पर बनाने के लिये मुझे दिया है, कड़ाई से कुछ करना न पड़े॥

अध्याय का आत्मिक संकेत: पौलुस का उद्देश्य केवल दोष दिखाना नहीं, बल्कि कुरिन्थियों को आत्मिक रूप से ठीक और सिद्ध देखना है। सुधार का लक्ष्य विनाश नहीं, बल्कि निर्माण है।
03अन्तिम प्रोत्साहन और मसीही संगति (पद 11–13)

11निदान, हे भाइयो, आनन्दित रहो; सिद्ध बनते जाओ; ढाढ़स रखो; एक ही मन रखो; मेल से रहो, और प्रेम और शान्ति का दाता परमेश्वर तुम्हारे साथ होगा। 12एक दूसरे को पवित्र चुम्बन से नमस्कार करो। 13सब पवित्र लोग तुम्हें नमस्कार करते हैं।

04अनुग्रह, प्रेम और पवित्र आत्मा की सहभागिता (पद 14)

14प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह और परमेश्वर का प्रेम और पवित्र आत्मा की सहभागिता तुम सब के साथ होती रहे॥

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