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परमेश्वर का भवन बनाने का अर्थ क्या है? | बाइबल अध्ययन

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परमेश्वर का भवन बनाने का क्या अर्थ है — बाइबल अध्ययन

जब हम कहते हैं कि हम परमेश्वर का भवन बनाना चाहते हैं, तो इसका वास्तविक अर्थ क्या है? क्या परमेश्वर को रहने के लिए ईंट, पत्थर, सीमेंट और छत से बनी किसी इमारत की आवश्यकता है? यदि परमेश्वर आकाश और पृथ्वी के सृष्टिकर्ता हैं, तो क्या कोई भवन उन्हें अपने भीतर समेट सकता है? बाइबल इन प्रश्नों का उत्तर देती है। साथ ही, वह हमें यह भी समझाती है कि विश्वासियों के एकत्र होने, प्रार्थना करने, वचन सीखने और एक-दूसरे को प्रोत्साहित करने के लिए एक स्थान क्यों उपयोगी हो सकता है।

इस लेख का मुख्य विचार: परमेश्वर किसी मानवीय इमारत में सीमित नहीं हैं। फिर भी, यदि कोई स्थान विश्वासियों की संगति, बाइबल की शिक्षा, प्रार्थना, आत्मिक उन्नति और सेवकाई के लिए समर्पित किया जाता है, तो वह परमेश्वर की महिमा के लिए उपयोगी हो सकता है। भवन स्वयं लक्ष्य नहीं है; उसके माध्यम से होने वाली सेवकाई महत्वपूर्ण है।
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क्या परमेश्वर मनुष्यों के बनाए भवनों में रहते हैं?

प्रेरितों के काम 7:48–50 • 17:24–25

बाइबल स्पष्ट करती है कि परमप्रधान परमेश्वर मनुष्यों के हाथों से बनाए गए भवनों में सीमित नहीं हैं। प्रेरितों के काम 7 में स्तिफनुस बताता है कि परमेश्वर मनुष्यों के बनाए घरों में सीमित नहीं हैं। इसी प्रकार प्रेरित पौलुस ने एथेंस में समझाया कि संसार और उसमें की सब वस्तुओं को बनाने वाला परमेश्वर हाथों से बनाए हुए मंदिरों में नहीं रहता, मानो उसे किसी वस्तु की आवश्यकता हो।

इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर की उपस्थिति को किसी विशेष इमारत तक सीमित नहीं किया जा सकता। वह सृष्टि का प्रभु है। आकाश और पृथ्वी उसी के हैं। कोई भवन उसकी महानता को अपने भीतर समेट नहीं सकता और न ही परमेश्वर की आराधना केवल एक इमारत तक सीमित है।

इसलिए जब हम “परमेश्वर का भवन” कहते हैं, तो हमें इस अभिव्यक्ति का अर्थ सही ढंग से समझना चाहिए। हमारा आशय यह नहीं कि परमेश्वर को रहने के लिए एक घर चाहिए। हमारा आशय ऐसे स्थान से है जिसे विश्वासियों की संगति और परमेश्वर की सेवकाई के लिए उपयोग किया जा सके।

ध्यान देने योग्य सत्य:
हम परमेश्वर को किसी इमारत में बंद नहीं कर सकते। लेकिन हम किसी इमारत का उपयोग परमेश्वर के वचन को सीखने, प्रार्थना करने, संगति करने और लोगों की आत्मिक उन्नति के लिए कर सकते हैं।
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बाइबल में मंदिर का निर्माण हुआ, फिर भी परमेश्वर उससे बड़े हैं

1 राजा 8:27–30 • 2 इतिहास 6:18

पुराने नियम में राजा सुलैमान ने यरूशलेम में परमेश्वर के नाम के लिए मंदिर बनवाया। यह इस्राएलियों के लिए आराधना और प्रार्थना का एक महत्वपूर्ण स्थान था। मंदिर के समर्पण के समय सुलैमान ने स्वीकार किया कि आकाश और आकाशों का आकाश भी परमेश्वर को समा नहीं सकता, तो फिर उसके द्वारा बनाया गया यह भवन कैसे उसे समा सकता है?

यह उदाहरण हमें एक महत्वपूर्ण संतुलन सिखाता है। सुलैमान ने मंदिर बनाया, लेकिन वह यह नहीं मानता था कि परमेश्वर उस भवन के भीतर सीमित हो गए हैं। भवन परमेश्वर की महानता से बड़ा नहीं था। उसका उद्देश्य परमेश्वर के नाम के लिए एक स्थान समर्पित करना और लोगों की प्रार्थनाओं के लिए एक केंद्र उपलब्ध कराना था।

इससे हम सीखते हैं कि किसी स्थान को परमेश्वर की सेवकाई के लिए समर्पित करना और यह मानना कि परमेश्वर केवल उसी स्थान में रहते हैं—दो अलग बातें हैं। भवन का महत्व उसके उद्देश्य और उपयोग से जुड़ा है, न कि इस विचार से कि परमेश्वर उसके भीतर कैद हैं।

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नए नियम में परमेश्वर का भवन कौन है?

1 कुरिन्थियों 3:16–17 • इफिसियों 2:19–22

नए नियम में परमेश्वर के भवन की एक गहरी आत्मिक तस्वीर दिखाई देती है। पौलुस कुरिन्थुस की कलीसिया को बताता है कि वे परमेश्वर का मंदिर हैं और परमेश्वर का आत्मा उनमें निवास करता है। इफिसियों 2 में विश्वासियों को एक ऐसे आत्मिक भवन के रूप में चित्रित किया गया है, जिसकी नींव प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा है और जिसका कोने का मुख्य पत्थर स्वयं यीशु मसीह हैं।

इसका अर्थ है कि कलीसिया केवल कोई इमारत या संगठन नहीं है। कलीसिया उन लोगों का समुदाय है जो यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं और उसके पीछे चलने के लिए बुलाए गए हैं। विश्वासियों का प्रेम, एकता, पवित्र जीवन और एक-दूसरे की सेवा कलीसिया की आत्मिक पहचान के महत्वपूर्ण भाग हैं।

इसलिए यदि कोई सुंदर भवन बन जाए, लेकिन वहाँ प्रेम, सत्य, प्रार्थना और विश्वासियों की उन्नति न हो, तो केवल इमारत बन जाना सेवकाई के पूरे उद्देश्य को पूरा नहीं करता। दूसरी ओर, एक साधारण स्थान पर एकत्र होने वाले विश्वासी भी परमेश्वर की महिमा कर सकते हैं, जब वे उसके वचन के अनुसार जीवन जीते हैं।

जीवते पत्थरों का आत्मिक अर्थ

1 पतरस 2:5 में विश्वासियों को “जीवते पत्थर” के समान आत्मिक भवन बनाए जाने की तस्वीर से समझाया गया है। इस चित्र में मुख्य जोर ईंट-पत्थर की इमारत पर नहीं, बल्कि उन लोगों पर है जो मसीह में मिलकर परमेश्वर की सेवा करते हैं।

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पहली कलीसिया कहाँ एकत्र होती थी?

प्रेरितों के काम 2:42–47 • रोमियों 16:3–5 • कुलुस्सियों 4:15

प्रेरितों के काम 2 में हम पहली कलीसिया के विश्वासियों को प्रेरितों की शिक्षा सुनते, संगति करते, रोटी तोड़ते और प्रार्थना करते हुए देखते हैं। वे एक-दूसरे की सहायता भी करते थे। उनके विश्वास का जीवन केवल व्यक्तिगत आराधना तक सीमित नहीं था; वे मिलकर सीखते और एक-दूसरे के साथ जीवन बाँटते थे।

नए नियम में घरों में एकत्र होने वाली कलीसियाओं का भी उल्लेख मिलता है। रोमियों 16:5 में प्रिस्किल्ला और अक्विला के घर में एकत्र होने वाली कलीसिया का अभिवादन किया गया है। कुलुस्सियों 4:15 में भी घर में एकत्र होने वाले विश्वासियों का उल्लेख है।

इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि आरंभिक मसीही संगति के लिए हमेशा किसी बड़ी या विशेष इमारत पर निर्भर नहीं थे। जहाँ विश्वासी एकत्र हो सकते थे, वहाँ वे वचन, प्रार्थना और संगति में भाग लेते थे। घर उनका स्थान था; मुख्य बात वहाँ होने वाली आत्मिक गतिविधियाँ थीं।

आज भी परिस्थितियों के अनुसार घर, किराए का कमरा, कोई साधारण हॉल या समर्पित भवन—इनमें से कोई भी स्थान विश्वासियों की संगति के लिए उपयोगी हो सकता है। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि उपलब्ध स्थान का उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा है।

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विश्वासियों के एकत्र होने के लिए स्थान क्यों उपयोगी है?

इब्रानियों 10:24–25 • प्रेरितों के काम 2:42

इब्रानियों 10:24–25 विश्वासियों को एक-दूसरे के प्रति प्रेम और भले कामों के लिए उभारने तथा एकत्र होना न छोड़ने की शिक्षा देता है। इसका उद्देश्य केवल एक बैठक में उपस्थित होना नहीं, बल्कि एक-दूसरे को विश्वास में मजबूत करना और अच्छे कार्यों के लिए प्रोत्साहित करना है।

जब विश्वासी एक स्थान पर एकत्र होते हैं, तो वे परमेश्वर का वचन सुन सकते हैं, मिलकर प्रार्थना कर सकते हैं, अपने प्रश्न पूछ सकते हैं, कठिन समय में एक-दूसरे का सहारा बन सकते हैं और बच्चों तथा नए विश्वासियों को बाइबल की शिक्षा दे सकते हैं। जरूरतमंद लोगों की पहचान करना और व्यावहारिक सहायता के अवसर तलाशना भी ऐसी संगति का हिस्सा हो सकता है।

विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ एकत्र होने के लिए सुविधाजनक स्थान उपलब्ध नहीं है, एक उपयुक्त भवन या हॉल संगति को व्यवस्थित करने में मदद कर सकता है। लेकिन किसी क्षेत्र में वास्तव में ऐसी आवश्यकता कितनी है, इसे स्थानीय लोगों की परिस्थितियों और उपलब्ध विकल्पों को समझकर ही तय करना चाहिए।

एकत्र होने का उद्देश्य संभावित लाभ
बाइबल की शिक्षा विश्वासी वचन सीख सकते हैं और अपने प्रश्नों पर चर्चा कर सकते हैं।
प्रार्थना और आराधना लोग मिलकर प्रार्थना और आराधना में भाग ले सकते हैं।
संगति और प्रोत्साहन विश्वासी एक-दूसरे का हाल जान सकते हैं और कठिन समय में सहारा दे सकते हैं।
बच्चों और नए विश्वासियों की शिक्षा उचित व्यवस्था होने पर नियमित बाइबल अध्ययन और शिक्षण किया जा सकता है।
सेवा और सहायता स्थानीय आवश्यकताओं को पहचानने और सहायता के अवसर व्यवस्थित करने में सुविधा हो सकती है।
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क्या एक साधारण स्थान भी परमेश्वर की महिमा कर सकता है?

मत्ती 18:20 • प्रेरितों के काम 16:13–15

यीशु ने मत्ती 18:20 में अपने नाम में एकत्र होने वालों के बीच अपनी उपस्थिति के विषय में शिक्षा दी। इस वचन का संदर्भ आपसी संबंधों और समुदाय में शिष्यों के जीवन से जुड़ा है। यह हमें याद दिलाता है कि मसीही संगति का मूल्य किसी भवन की भव्यता से निर्धारित नहीं होता।

प्रेरितों के काम 16 में हम फिलिप्पी में प्रार्थना के लिए एक स्थान पर एकत्र लोगों के विषय में पढ़ते हैं। वहाँ पौलुस और उसके साथियों ने लोगों से बात की और लुदिया ने सुसमाचार का संदेश स्वीकार किया। यह उदाहरण दिखाता है कि परमेश्वर का संदेश पहुँचाने और लोगों के साथ संगति करने के लिए कोई भव्य इमारत ही आवश्यक नहीं है।

इसलिए किसी भवन का निर्माण करना अपने-आप में परमेश्वर की महिमा की गारंटी नहीं है। लेकिन यदि एक उचित स्थान विश्वासियों को एकत्र होने, बाइबल सीखने, प्रार्थना करने और दूसरों की सेवा करने में सहायता देता है, तो उसका उपयोग परमेश्वर की महिमा के लिए हो सकता है।

याद रखें:
भवन साधन है, अंतिम लक्ष्य नहीं। लक्ष्य है कि लोग परमेश्वर को जानें, मसीह में बढ़ें, एक-दूसरे से प्रेम करें और अपने जीवन के द्वारा परमेश्वर की महिमा करें।
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परमेश्वर के कार्य में सहयोग देने के बारे में बाइबल क्या कहती है?

निर्गमन 35:20–29 • 2 कुरिन्थियों 9:7

निर्गमन 35 में हम देखते हैं कि निवासस्थान के निर्माण के लिए इस्राएलियों ने अपनी इच्छा से भेंट दी। पाठ में उन लोगों का वर्णन है जिनका मन उदार था और जिन्होंने परमेश्वर के कार्य के लिए सामग्री दी। यह उदाहरण दिखाता है कि समुदाय के लोग मिलकर किसी साझा धार्मिक कार्य में योगदान दे सकते हैं।

नए नियम में 2 कुरिन्थियों 9:7 पौलुस की उस शिक्षा का हिस्सा है जिसमें वह दान देने के मनोभाव पर जोर देता है। वह सिखाता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने मन में ठानकर दे, न कि अनिच्छा या दबाव में, क्योंकि परमेश्वर हर्ष से देने वाले से प्रेम रखता है।

इन वचनों के प्रकाश में किसी सेवकाई या भवन-परियोजना के लिए आर्थिक सहयोग देना एक व्यक्तिगत और स्वैच्छिक निर्णय होना चाहिए। लोगों को उद्देश्य, अनुमानित लागत, धन के उपयोग, वर्तमान स्थिति और उपलब्ध दस्तावेजों की स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए। किसी को शर्मिंदा करके, डर पैदा करके या परमेश्वर से निश्चित आशीष पाने का वादा करके दान के लिए दबाव डालना उचित नहीं है।

दान के विषय में महत्वपूर्ण बात:
किसी परियोजना में योगदान देना प्रत्येक व्यक्ति का स्वैच्छिक निर्णय है। सहयोग करने से पहले परियोजना की जानकारी पढ़ें, अपने प्रश्न पूछें और अपनी क्षमता के अनुसार निर्णय लें। दान की राशि से किसी व्यक्ति के विश्वास या परमेश्वर के प्रति प्रेम को नहीं आँका जाना चाहिए।
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मुनेठ, देवप्रयाग, उत्तराखंड में प्रस्तावित परमेश्वर का भवन

इब्रानियों 10:24–25 • मत्ती 5:16

इन्हीं बाइबल सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, मुनेठ, देवप्रयाग, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड में एक सामुदायिक आराधना और संगति-स्थल बनाने की प्रस्तावित परियोजना पर काम किया जा रहा है। इस पहल का उद्देश्य एक ऐसे स्थान की संभावना तलाशना है जहाँ स्थानीय विश्वासी एकत्र हो सकें, परमेश्वर का वचन सीख सकें, प्रार्थना कर सकें और एक-दूसरे को विश्वास में प्रोत्साहित कर सकें।

इस प्रस्तावित पहल की पृष्ठभूमि, सामुदायिक केंद्र की योजना और उसके उद्देश्य को विस्तार से समझने के लिए हमारा लेख मुनेठ, देवप्रयाग में सामुदायिक केंद्र की प्रस्तावित योजना पढ़ें। इससे पाठकों को इस पहल के बारे में अधिक जानकारी मिलेगी और वे समझ सकेंगे कि एक उपयुक्त स्थान स्थानीय संगति और सेवकाई के लिए किस प्रकार उपयोगी हो सकता है।

पहाड़ी क्षेत्र में किसी भी निर्माण-परियोजना की योजना बनाते समय स्थानीय जरूरतों, भूमि और निर्माण से संबंधित अधिकारों, आवश्यक अनुमतियों, सुरक्षा, अनुमानित लागत और भविष्य में भवन के रखरखाव जैसे विषयों पर ध्यान देना जरूरी है। इसलिए इस परियोजना की वास्तविक प्रगति, उपलब्ध संसाधनों और आगे की योजना के बारे में स्पष्ट जानकारी साझा करना हमारी जिम्मेदारी है।

हमारा विश्वास है कि यदि इस स्थान का निर्माण संभव होता है और इसका उपयोग बाइबल की शिक्षा, संगति, प्रार्थना तथा लोगों की सेवा के लिए किया जाता है, तो यह स्थानीय समुदाय के लिए उपयोगी हो सकता है और परमेश्वर की महिमा का माध्यम बन सकता है। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए प्रार्थना, विचारशील योजना और जिम्मेदार सहयोग महत्वपूर्ण हैं।

मत्ती 5:16 में यीशु अपने चेलों को अपने उजियाले को लोगों के सामने चमकने देने की शिक्षा देते हैं, ताकि लोग उनके भले कामों को देखकर स्वर्गीय पिता की महिमा करें। इस शिक्षा का केंद्र केवल कोई भवन बनाना नहीं, बल्कि ऐसा जीवन और ऐसी सेवकाई है जिसके द्वारा परमेश्वर की महिमा हो।

मुनेठ में प्रस्तावित सामुदायिक केंद्र के बारे में जानें

परमेश्वर का भवन बनाने का उद्देश्य केवल एक इमारत खड़ी करना नहीं, बल्कि ऐसा स्थान उपलब्ध कराने की संभावना को आगे बढ़ाना है जहाँ विश्वासी एकत्र हो सकें, बाइबल सीख सकें, प्रार्थना कर सकें और एक-दूसरे को प्रोत्साहित कर सकें।

मुनेठ, देवप्रयाग, उत्तराखंड में प्रस्तावित सामुदायिक केंद्र की योजना, उद्देश्य और उपलब्ध जानकारी को विस्तार से पढ़ें।

सामुदायिक केंद्र की पूरी जानकारी पढ़ें

यदि आप परियोजना के लिए प्रार्थना करना या स्वेच्छा से आर्थिक सहयोग देना चाहते हैं, तो सहयोग से संबंधित विवरण यहाँ देखें।

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भवन से भी अधिक महत्वपूर्ण है उसमें होने वाला कार्य

गलातियों 5:13 • 1 पतरस 4:10

जब हम परमेश्वर के भवन के विषय में सोचते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि इमारत बनाना सेवकाई का केवल एक संभावित हिस्सा है। एक स्थान तभी अपने उद्देश्य को पूरा कर पाएगा जब उसका उपयोग लोगों के आत्मिक विकास और भलाई के लिए जिम्मेदारी से किया जाए।

यदि वहाँ बाइबल सिखाई जाती है, तो शिक्षा परमेश्वर के वचन के प्रति विश्वासयोग्य होनी चाहिए। यदि वहाँ संगति होती है, तो लोगों के साथ प्रेम और सम्मान से व्यवहार किया जाना चाहिए। यदि जरूरतमंद लोगों की सहायता की जाती है, तो सहायता ईमानदारी और विवेक से होनी चाहिए। और यदि लोग वहाँ प्रार्थना करने आते हैं, तो उन्हें ऐसा वातावरण मिलना चाहिए जहाँ वे शांति से एकत्र हो सकें।

1 पतरस 4:10 विश्वासियों को प्राप्त वरदानों के द्वारा एक-दूसरे की सेवा करने की शिक्षा देता है। इसलिए परमेश्वर के कार्य में योगदान केवल आर्थिक नहीं होता। कोई व्यक्ति प्रार्थना, समय, कौशल, श्रम, सलाह या अन्य उपयुक्त सहायता के द्वारा भी योगदान दे सकता है।

निष्कर्ष: परमेश्वर का भवन बनाने का वास्तविक अर्थ

परमेश्वर का भवन बनाने का अर्थ यह नहीं कि परमेश्वर को रहने के लिए ईंट-पत्थरों से बना घर चाहिए। बाइबल सिखाती है कि वह किसी मानवीय इमारत में सीमित नहीं हैं और मसीह में विश्वास करने वाले लोग स्वयं एक आत्मिक भवन के रूप में चित्रित किए गए हैं।

फिर भी, बाइबल में मंदिर के निर्माण, घरों में एकत्र होने वाली कलीसियाओं, सामूहिक प्रार्थना और विश्वासियों की संगति के उदाहरण मिलते हैं। इन उदाहरणों से हम समझ सकते हैं कि एक उपयुक्त स्थान लोगों को एकत्र होने, वचन सीखने, प्रार्थना करने और एक-दूसरे को प्रोत्साहित करने में सहायता दे सकता है।

इसलिए यदि हम किसी भवन का निर्माण करने की योजना बनाते हैं, तो हमें केवल उसकी दीवारों, आकार या सुंदरता पर ध्यान नहीं देना चाहिए। हमें यह भी विचार करना चाहिए कि उसका उद्देश्य क्या होगा, उससे लोगों को कैसे लाभ होगा और उसका उपयोग किस प्रकार परमेश्वर की महिमा के लिए किया जा सकता है।

परमेश्वर की महिमा केवल एक इमारत से नहीं होती, बल्कि उन विश्वासियों के जीवन, प्रेम, विश्वास और सेवकाई से प्रकट होती है जो उस स्थान का उपयोग करते हैं। यही वह दृष्टिकोण है जिसके साथ मुनेठ, देवप्रयाग में प्रस्तावित भवन की योजना को समझना और उसका मूल्यांकन करना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. क्या परमेश्वर मनुष्यों के बनाए भवनों में रहते हैं?

प्रेरितों के काम 7:48–50 और 17:24–25 बताते हैं कि परमेश्वर हाथों से बनाए गए भवनों में सीमित नहीं हैं। कोई इमारत उन्हें अपने भीतर समेट नहीं सकती।

2. यदि परमेश्वर भवनों में सीमित नहीं हैं, तो कलीसिया के लिए भवन क्यों बनाते हैं?

भवन विश्वासियों के एकत्र होने, बाइबल सीखने, प्रार्थना करने और संगति करने के लिए उपयोगी स्थान हो सकता है। उसका मूल्य उसके उद्देश्य और उपयोग से जुड़ा है।

3. क्या पहली कलीसिया के पास बड़े भवन थे?

नए नियम में घरों में एकत्र होने वाली कलीसियाओं का उल्लेख मिलता है, जैसे रोमियों 16:5 और कुलुस्सियों 4:15। इससे पता चलता है कि आरंभिक विश्वासियों की संगति के लिए घर भी उपयोग किए जाते थे।

4. क्या परमेश्वर के भवन के निर्माण के लिए दान देना जरूरी है?

बाइबल स्वैच्छिक और हर्ष से दिए जाने वाले दान की शिक्षा देती है (2 कुरिन्थियों 9:7)। किसी परियोजना में आर्थिक सहयोग व्यक्तिगत निर्णय है; किसी को दबाव में दान देने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।

5. मुनेठ, देवप्रयाग में प्रस्तावित भवन का उद्देश्य क्या है?

प्रस्तावित परियोजना का उद्देश्य स्थानीय विश्वासियों के एकत्र होने, बाइबल की शिक्षा, प्रार्थना और संगति के लिए एक उपयुक्त स्थान उपलब्ध कराने की संभावना को आगे बढ़ाना है। योजना की विस्तृत जानकारी यहाँ पढ़ें ।

6. क्या परमेश्वर की महिमा के लिए केवल भवन बनाना पर्याप्त है?

नहीं। भवन एक साधन हो सकता है। परमेश्वर की महिमा विश्वासियों के प्रेम, भले कामों, विश्वासयोग्यता और सेवा के द्वारा भी प्रकट होती है (मत्ती 5:16; 1 पतरस 4:10)।

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