दूसरों पर दोष लगाने वाले का भी न्याय होगा
पद 1–111सो हे दोष लगाने वाले, तू कोई क्यों न हो; तू निरुत्तर है! क्योंकि जिस बात में तू दूसरे पर दोष लगाता है, उसी बात में अपने आप को भी दोषी ठहराता है, इसलिये कि तू जो दोष लगाता है, आप ही वही काम करता है। 2और हम जानते हैं, कि ऐसे ऐसे काम करने वालों पर परमेश्वर की ओर से ठीक ठीक दण्ड की आज्ञा होती है। 3और हे मनुष्य, तू जो ऐसे ऐसे काम करने वालों पर दोष लगाता है, और आप वे ही काम करता है; क्या यह समझता है, कि तू परमेश्वर की दण्ड की आज्ञा से बच जाएगा? 4क्या तू उस की कृपा, और सहनशीलता, और धीरज रूपी धन को तुच्छ जानता है और क्या यह नहीं समझता, कि परमेश्वर की कृपा तुझे मन फिराव को सिखाती है?
5पर अपनी कठोरता और हठीले मन के अनुसार उसके क्रोध के दिन के लिये, जिस में परमेश्वर का सच्चा न्याय प्रगट होगा, अपने निमित क्रोध कमा रहा है। 6वह हर एक को उसके कामों के अनुसार बदला देगा। 7जो सुकर्म में स्थिर रहकर महिमा, और आदर, और अमरता की खोज में है, उन्हें वह अनन्त जीवन देगा। 8पर जो विवादी हैं, और सत्य को नहीं मानते, वरन अधर्म को मानते हैं, उन पर क्रोध और कोप पड़ेगा।
9और क्लेश और संकट हर एक मनुष्य के प्राण पर जो बुरा करता है आएगा, पहिले यहूदी पर फिर यूनानी पर। 10पर महिमा और आदर और कल्याण हर एक को मिलेगा, जो भला करता है, पहिले यहूदी को फिर यूनानी को। 11क्योंकि परमेश्वर किसी का पक्ष नहीं करता।
परमेश्वर का न्याय मनुष्य की पहचान या बाहरी स्थिति के आधार पर नहीं, बल्कि निष्पक्षता से होता है।
इस भाग में पौलुस उस मनुष्य की ओर ध्यान दिलाता है जो दूसरों के पाप को देखकर दोष लगाता है, पर अपने जीवन में उसी बात को करता है। परमेश्वर का न्याय बाहरी धार्मिकता से प्रभावित नहीं होता।
व्यवस्था, अन्यजाति और विवेक की गवाही
पद 12–1612इसलिये कि जिन्हों ने बिना व्यवस्था पाए पाप किया, वे बिना व्यवस्था के नाश भी होंगे, और जिन्हों ने व्यवस्था पाकर पाप किया, उन का दण्ड व्यवस्था के अनुसार होगा। 13क्योंकि परमेश्वर के यहां व्यवस्था के सुनने वाले धर्मी नहीं, पर व्यवस्था पर चलने वाले धर्मी ठहराए जाएंगे। 14फिर जब अन्यजाति लोग जिन के पास व्यवस्था नहीं, स्वभाव ही से व्यवस्था की बातों पर चलते हैं, तो व्यवस्था उन के पास न होने पर भी वे अपने लिये आप ही व्यवस्था हैं।
15वे व्यवस्था की बातें अपने अपने हृदयों में लिखी हुई दिखते हैं और उन के विवेक भी गवाही देते हैं, और उन की चिन्ताएं परस्पर दोष लगाती, या उन्हें निर्दोष ठहराती है। 16जिस दिन परमेश्वर मेरे सुसमाचार के अनुसार यीशु मसीह के द्वारा मनुष्यों की गुप्त बातों का न्याय करेगा॥
मनुष्य के भीतर का विवेक उसके कार्यों के विषय में गवाही देता है और उसके विचार उसे दोषी या निर्दोष ठहरा सकते हैं।
व्यवस्था पर भरोसा और अपने जीवन की परीक्षा
पद 17–2417यदि तू यहूदी कहलाता है, और व्यवस्था पर भरोसा रखता है, और परमेश्वर के विषय में घमण्ड करता है। 18और उस की इच्छा जानता और व्यवस्था की शिक्षा पाकर उत्तम उत्तम बातों को प्रिय जानता है। 19और अपने पर भरोसा रखता है, कि मैं अन्धों का अगुवा, और अन्धकार में पड़े हुओं की ज्योति। 20और बुद्धिहीनों का सिखाने वाला, और बालकों का उपदेशक हूं, और ज्ञान, और सत्य का नमूना, जो व्यवस्था में है, मुझे मिला है।
21सो क्या तू जो औरों को सिखाता है, अपने आप को नहीं सिखाता? क्या तू जो चोरी न करने का उपदेश देता है, आप ही चोरी करता है? 22तू जो कहता है, व्यभिचार न करना, क्या आप ही व्यभिचार करता है? तू जो मूरतों से घृणा करता है, क्या आप ही मन्दिरों को लूटता है। 23तू जो व्यवस्था के विषय में घमण्ड करता है, क्या व्यवस्था न मानकर, परमेश्वर का अनादर करता है? 24क्योंकि तुम्हारे कारण अन्यजातियों में परमेश्वर के नाम की निन्दा की जाती है जैसा लिखा भी है।
दूसरों को सिखाने से पहले मनुष्य को अपने ही जीवन को उसी शिक्षा के प्रकाश में जांचना चाहिए।
पौलुस केवल ज्ञान या व्यवस्था की जानकारी पर प्रश्न नहीं उठाता, बल्कि उस ज्ञान के अनुसार जीवन जीने की बात करता है। बाहरी धार्मिक पहचान तब विरोधाभासी हो जाती है जब जीवन उसी सत्य के विरुद्ध चलता है जिसे मनुष्य दूसरों को सिखाता है।
सच्चा खतना हृदय का है
पद 25–2925यदि तू व्यवस्था पर चले, तो खतने से लाभ तो है, परन्तु यदि तू व्यवस्था को न माने, तो तेरा खतना बिन खतना की दशा ठहरा। 26सो यदि खतना रहित मनुष्य व्यवस्था की विधियों को माना करे, तो क्या उस की बिन खतना की दशा खतने के बराबर न गिनी जाएगी? 27और जो मनुष्य जाति के कारण बिन खतना रहा यदि वह व्यवस्था को पूरा करे, तो क्या तुझे जो लेख पाने और खतना किए जाने पर भी व्यवस्था को माना नहीं करता है, दोषी न ठहराएगा?
28क्योंकि वह यहूदी नहीं, जो प्रगट में यहूदी है और न वह खतना है जो प्रगट में है, और देह में है। 29पर यहूदी वही है, जो मन में है; और खतना वही है, जो हृदय का और आत्मा में है; न कि लेख का: ऐसे की प्रशंसा मनुष्यों की ओर से नहीं, परन्तु परमेश्वर की ओर से होती है॥
सच्ची पहचान केवल बाहरी चिन्ह में नहीं, बल्कि मन, हृदय और आत्मा की वास्तविक अवस्था में दिखाई देती है।
अध्याय का यह निष्कर्ष बाहरी धार्मिक पहचान और भीतर की वास्तविकता के बीच अंतर को सामने रखता है। पौलुस के अनुसार परमेश्वर की ओर से मिलने वाली प्रशंसा बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि हृदय की वास्तविक अवस्था से संबंधित है।
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