यहूदी का लाभ और परमेश्वर की सच्चाई
पद 1–81सो यहूदी की क्या बड़ाई, या खतने का क्या लाभ? 2हर प्रकार से बहुत कुछ। पहिले तो यह कि परमेश्वर के वचन उन को सौंपे गए। 3यदि कितने विश्वासघाती निकले भी तो क्या हुआ? क्या उनके विश्वासघाती होने से परमेश्वर की सच्चाई व्यर्थ ठहरेगी? 4कदापि नहीं, वरन परमेश्वर सच्चा और हर एक मनुष्य झूठा ठहरे, जैसा लिखा है, कि जिस से तू अपनी बातों में धर्मी ठहरे और न्याय करते समय तू जय पाए।
5सो यदि हमारा अधर्म परमेश्वर की धार्मिकता ठहरा देता है, तो हम क्या कहें? क्या यह कि परमेश्वर जो क्रोध करता है अन्यायी है? यह तो मैं मनुष्य की रीति पर कहता हूं। 6कदापि नहीं, नहीं तो परमेश्वर क्योंकर जगत का न्याय करेगा? 7यदि मेरे झूठ के कारण परमेश्वर की सच्चाई उस को महिमा के लिये अधिक करके प्रगट हुई, तो फिर क्यों पापी की नाईं मैं दण्ड के योग्य ठहराया जाता हूं? 8और हम क्यों बुराई न करें, कि भलाई निकले जब हम पर यही दोष लगाया भी जाता है, और कितने कहते हैं कि इन का यही कहना है: परन्तु ऐसों का दोषी ठहराना ठीक है॥
मनुष्य की अविश्वसनीयता परमेश्वर की सच्चाई को बदल नहीं सकती। परमेश्वर अपने न्याय में सदा सच्चा ठहरता है।
सब मनुष्य पाप के अधीन हैं
पद 9–209तो फिर क्या हुआ? क्या हम उन से अच्छे हैं? कभी नहीं; क्योंकि हम यहूदियों और यूनानियों दोनों पर यह दोष लगा चुके हैं कि वे सब के सब पाप के वश में हैं। 10जैसा लिखा है, कि कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं। 11कोई समझदार नहीं, कोई परमेश्वर का खोजने वाला नहीं। 12सब भटक गए हैं, सब के सब निकम्मे बन गए, कोई भलाई करने वाला नहीं, एक भी नहीं।
13उन का गला खुली हुई कब्र है: उन्होंने अपनी जीभों से छल किया है: उन के होठों में साँपों का विष है। 14और उन का मुंह श्राप और कड़वाहट से भरा है। 15उन के पांव लोहू बहाने को फुर्तीले हैं। 16उन के मार्गों में नाश और क्लेश हैं। 17उन्होंने कुशल का मार्ग नहीं जाना। 18उन की आंखों के साम्हने परमेश्वर का भय नहीं।
19हम जानते हैं, कि व्यवस्था जो कुछ कहती है उन्हीं से कहती है, जो व्यवस्था के आधीन हैं: इसलिये कि हर एक मुंह बन्द किया जाए, और सारा संसार परमेश्वर के दण्ड के योग्य ठहरे। 20क्योंकि व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी उसके साम्हने धर्मी नहीं ठहरेगा, इसलिये कि व्यवस्था के द्वारा पाप की पहिचान होती है।
पौलुस यहाँ यहूदियों और यूनानियों दोनों को एक ही निष्कर्ष के सामने खड़ा करता है—मनुष्य अपने आप में पाप से मुक्त नहीं है।
व्यवस्था मनुष्य को धर्मी बनाने का साधन नहीं, बल्कि पाप की पहचान कराने वाली है। इसलिए व्यवस्था के सामने मनुष्य अपने पाप को पहचानता है और अपने स्वयं के धर्मी होने का दावा नहीं कर सकता।
विश्वास के द्वारा परमेश्वर की धार्मिकता
पद 21–2621पर अब बिना व्यवस्था परमेश्वर की वह धार्मिकता प्रगट हुई है, जिस की गवाही व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता देते हैं। 22अर्थात परमेश्वर की वह धार्मिकता, जो यीशु मसीह पर विश्वास करने से सब विश्वास करने वालों के लिये है; क्योंकि कुछ भेद नहीं। 23इसलिये कि सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं।
24परन्तु उसके अनुग्रह से उस छुटकारे के द्वारा जो मसीह यीशु में है, सेंत-मेंत धर्मी ठहराए जाते हैं। 25उसे परमेश्वर ने उसके लोहू के कारण एक ऐसा प्रायश्चित्त ठहराया, जो विश्वास करने से कार्यकारी होता है, कि जो पाप पहिले किए गए, और जिन की परमेश्वर ने अपनी सहनशीलता से आनाकानी की; उन के विषय में वह अपनी धार्मिकता प्रगट करे। 26वरन इसी समय उस की धार्मिकता प्रगट हो; कि जिस से वह आप ही धर्मी ठहरे, और जो यीशु पर विश्वास करे, उसका भी धर्मी ठहराने वाला हो।
पाप की सार्वभौमिक समस्या के सामने परमेश्वर का अनुग्रह मसीह यीशु में मिलने वाले छुटकारे का मार्ग खोलता है।
पद 21 से पौलुस के तर्क में निर्णायक मोड़ आता है। मनुष्य की अपनी धार्मिकता के स्थान पर परमेश्वर की धार्मिकता सामने आती है, जिसकी गवाही व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता देते हैं और जो यीशु मसीह पर विश्वास करने वालों के लिये प्रगट होती है।
विश्वास द्वारा धर्मी ठहरना और घमण्ड का अंत
पद 27–3127तो घमण्ड करना कहां रहा उस की तो जगह ही नहीं: कौन सी व्यवस्था के कारण से? क्या कर्मों की व्यवस्था से? नहीं, वरन विश्वास की व्यवस्था के कारण। 28इसलिये हम इस परिणाम पर पहुंचते हैं, कि मनुष्य व्यवस्था के कामों के बिना विश्वास के द्वारा धर्मी ठहरता है। 29क्या परमेश्वर केवल यहूदियों ही का है? क्या अन्यजातियों का नहीं? हां, अन्यजातियों का भी है। 30क्योंकि एक ही परमेश्वर है, जो खतना वालों को विश्वास से और खतना रहितों को भी विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराएगा। 31तो क्या हम व्यवस्था को विश्वास के द्वारा व्यर्थ ठहराते हैं? कदापि नहीं; वरन व्यवस्था को स्थिर करते हैं॥
जब धार्मिकता विश्वास के द्वारा है, तब मनुष्य के लिये अपने कर्मों या धार्मिक पहचान के आधार पर घमण्ड करने की कोई जगह नहीं रहती।
अध्याय का निष्कर्ष यह स्पष्ट करता है कि विश्वास व्यवस्था को नष्ट नहीं करता। इसके विपरीत, पौलुस कहता है कि विश्वास के द्वारा व्यवस्था को स्थिर किया जाता है। एक ही परमेश्वर यहूदियों और अन्यजातियों दोनों के लिये है।
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