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रोमियों अध्याय 5 — बाइबल पाठ, व्याख्या और मुख्य शिक्षाएँ

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1

विश्वास से धार्मिक ठहरना और परमेश्वर से मेल

पद 1–5

1सो जब हम विश्वास से धर्मी ठहरे, तो अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ मेल रखें। 2जिस के द्वारा विश्वास के कारण उस अनुग्रह तक, जिस में हम बने हैं, हमारी पहुंच भी हुई, और परमेश्वर की महिमा की आशा पर घमण्ड करें। 3केवल यही नहीं, वरन हम क्लेशों में भी घमण्ड करें, यही जानकर कि क्लेश से धीरज। 4और धीरज से खरा निकलना, और खरे निकलने से आशा उत्पन्न होती है। 5और आशा से लज्ज़ा नहीं होती, क्योंकि पवित्र आत्मा जो हमें दिया गया है उसके द्वारा परमेश्वर का प्रेम हमारे मन में डाला गया है।

✝️ विश्वास से मिलने वाला परिणाम
विश्वास के द्वारा परमेश्वर से मेल, अनुग्रह में पहुंच और उसकी महिमा की आशा मिलती है। यहां तक कि क्लेश भी धीरज, खरे निकलने और आशा की ओर ले जा सकते हैं।
2

पापियों के लिये मसीह की मृत्यु और परमेश्वर का प्रेम

पद 6–11

6क्योंकि जब हम निर्बल ही थे, तो मसीह ठीक समय पर भक्तिहीनों के लिये मरा। 7किसी धर्मी जन के लिये कोई मरे, यह तो दुर्लभ है, परन्तु क्या जाने किसी भले मनुष्य के लिये कोई मरने का भी हियाव करे। 8परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा। 9सो जब कि हम, अब उसके लोहू के कारण धर्मी ठहरे, तो उसके द्वारा क्रोध से क्यों न बचेंगे? 10क्योंकि बैरी होने की दशा में तो उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएंगे? 11और केवल यही नहीं, परन्तु हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा जिस के द्वारा हमारा मेल हुआ है, परमेश्वर के विषय में घमण्ड भी करते हैं॥

❤️ परमेश्वर का प्रेम
मसीह ने उस समय हमारे लिये प्राण दिए जब हम अभी पापी और परमेश्वर से दूर थे। यही परमेश्वर के प्रेम की गहराई को प्रकट करता है।
सीखने योग्य बात
मेल केवल हमारी ओर से परमेश्वर की ओर लौटना नहीं है; रोमियों 5 मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ हुए मेल और उसके जीवन के द्वारा मिलने वाले उद्धार को सामने रखता है।
3

आदम के द्वारा मृत्यु, मसीह के द्वारा जीवन

पद 12–17

12इसलिये जैसा एक मनुष्य के द्वारा पाप जगत में आया, और पाप के द्वारा मृत्यु आई, और इस रीति से मृत्यु सब मनुष्यों में फैल गई, इसलिये कि सब ने पाप किया। 13क्योंकि व्यवस्था के दिए जाने तक पाप जगत में तो था, परन्तु जहां व्यवस्था नहीं, वहां पाप गिना नहीं जाता। 14तौभी आदम से लेकर मूसा तक मृत्यु ने उन लोगों पर भी राज्य किया, जिन्हों ने उस आदम के अपराध की नाईं जो उस आने वाले का चिन्ह है, पाप न किया।

15पर जैसा अपराध की दशा है, वैसी अनुग्रह के वरदान की नहीं, क्योंकि जब एक मनुष्य के अपराध से बहुत लोग मरे, तो परमेश्वर का अनुग्रह और उसका जो दान एक मनुष्य के, अर्थात यीशु मसीह के अनुग्रह से हुआ बहुतेरे लोगों पर अवश्य ही अधिकाई से हुआ। 16और जैसा एक मनुष्य के पाप करने का फल हुआ, वैसा ही दान की दशा नहीं, क्योंकि एक ही के कारण दण्ड की आज्ञा का फैसला हुआ, परन्तु बहुतेरे अपराधों से ऐसा वरदान उत्पन्न हुआ, कि लोग धर्मी ठहरे। 17क्योंकि जब एक मनुष्य के अपराध के कारण मृत्यु ने उस एक ही के द्वारा राज्य किया, तो जो लोग अनुग्रह और धर्म रूपी वरदान बहुतायत से पाते हैं वे एक मनुष्य के, अर्थात यीशु मसीह के द्वारा अवश्य ही अनन्त जीवन में राज्य करेंगे।

🔥 दो विपरीत परिणाम
एक मनुष्य के अपराध के द्वारा मृत्यु ने राज्य किया, लेकिन यीशु मसीह के द्वारा अनुग्रह और धर्म का वरदान जीवन की ओर ले जाता है।
4

एक के अपराध से मृत्यु, एक के धर्मी काम से जीवन

पद 18–21

18इसलिये जैसा एक अपराध सब मनुष्यों के लिये दण्ड की आज्ञा का कारण हुआ, वैसा ही एक धर्म का काम भी सब मनुष्यों के लिये जीवन के निमित्त धर्मी ठहराए जाने का कारण हुआ। 19क्योंकि जैसा एक मनुष्य के आज्ञा न मानने से बहुत लोग पापी ठहरे, वैसे ही एक मनुष्य के आज्ञा मानने से बहुत लोग धर्मी ठहरेंगे। 20और व्यवस्था बीच में आ गई, कि अपराध बहुत हो, परन्तु जहां पाप बहुत हुआ, वहां अनुग्रह उस से भी कहीं अधिक हुआ। 21कि जैसा पाप ने मृत्यु फैलाते हुए राज्य किया, वैसा ही हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा अनुग्रह भी अनन्त जीवन के लिये धर्मी ठहराते हुए राज्य करे॥

✝️ जहां पाप बहुत हुआ, वहां अनुग्रह और भी अधिक हुआ
अध्याय का अंतिम विचार पाप और अनुग्रह के बीच का विरोध दिखाता है—पाप ने मृत्यु की ओर राज्य किया, जबकि यीशु मसीह के द्वारा अनुग्रह अनन्त जीवन की ओर राज्य करता है।
रोमियों 5 का सार
विश्वास से धर्मी ठहराए गए मनुष्य को परमेश्वर के साथ मेल, अनुग्रह, आशा और परमेश्वर के प्रेम का अनुभव मिलता है। अध्याय आगे आदम और मसीह की तुलना करता है—आदम के अपराध से मृत्यु आई, जबकि यीशु मसीह के द्वारा अनुग्रह, धार्मिकता और अनन्त जीवन का मार्ग प्रकट हुआ।
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