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रोमियों अध्याय 10 — बाइबल पाठ, व्याख्या और मुख्य शिक्षाएँ

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01

इस्राएल के लिये पौलुस की प्रार्थना और मसीह में धार्मिकता

पद 1–4

1 हे भाइयो, मेरे मन की अभिलाषा और उन के लिये परमेश्वर से मेरी प्रार्थना है, कि वे उद्धार पाएं। 2 क्योंकि मैं उन की गवाही देता हूं, कि उन को परमेश्वर के लिये धुन रहती है, परन्तु बुद्धिमानी के साथ नहीं। 3 क्योंकि वे परमेश्वर की धार्मिकता से अनजान होकर, और अपनी धार्मिकता स्थापन करने का यत्न करके, परमेश्वर की धार्मिकता के आधीन न हुए। 4 क्योंकि हर एक विश्वास करने वाले के लिये धार्मिकता के निमित्त मसीह व्यवस्था का अन्त है।

समस्या कहाँ थी?
पौलुस इस्राएल के लिये प्रार्थना करता है, क्योंकि परमेश्वर के लिये उनकी धुन तो थी, परन्तु वे परमेश्वर की धार्मिकता के बजाय अपनी धार्मिकता स्थापित करने का यत्न कर रहे थे।
02

विश्वास की धार्मिकता और उद्धार का वचन

पद 5–13

5 क्योंकि मूसा ने यह लिखा है, कि जो मनुष्य उस धार्मिकता पर जो व्यवस्था से है, चलता है, वह इसी कारण जीवित रहेगा। 6 परन्तु जो धार्मिकता विश्वास से है, वह यों कहती है, कि तू अपने मन में यह न कहना कि स्वर्ग पर कौन चढ़ेगा? अर्थात मसीह को उतार लाने के लिये! 7 या गहिराव में कौन उतरेगा? अर्थात मसीह को मरे हुओं में से जिलाकर ऊपर लाने के लिये! 8 परन्तु वह क्या कहती है? यह, कि वचन तेरे निकट है, तेरे मुंह में और तेरे मन में है; यह वही विश्वास का वचन है, जो हम प्रचार करते हैं।

विश्वास का वचन
पौलुस धार्मिकता को किसी दूर या मनुष्य की पहुंच से बाहर की वस्तु के रूप में नहीं रखता; वह उस विश्वास के वचन की ओर संकेत करता है जिसका प्रचार किया जा रहा है।

9 कि यदि तू अपने मुंह से यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार करे और अपने मन से विश्वास करे, कि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, तो तू निश्चय उद्धार पाएगा। 10 क्योंकि धार्मिकता के लिये मन से विश्वास किया जाता है, और उद्धार के लिये मुंह से अंगीकार किया जाता है। 11 क्योंकि पवित्र शास्त्र यह कहता है कि जो कोई उस पर विश्वास करेगा, वह लज्जित न होगा। 12 यहूदियों और यूनानियों में कुछ भेद नहीं, इसलिये कि वह सब का प्रभु है; और अपने सब नाम लेने वालों के लिये उदार है। 13 क्योंकि जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा।

उद्धार का खुला निमन्त्रण
यहाँ दायरा किसी एक जाति तक सीमित नहीं रहता—“जो कोई” प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा।
03

सुनना, विश्वास करना और सुसमाचार का प्रचार

पद 14–18

14 फिर जिस पर उन्होंने विश्वास नहीं किया, वे उसका नाम क्योंकर लें? और जिस की नहीं सुनी उस पर क्योंकर विश्वास करें? 15 और प्रचारक बिना क्योंकर सुनें? और यदि भेजे न जाएं, तो क्योंकर प्रचार करें? जैसा लिखा है, कि उन के पांव क्या ही सुहावने हैं, जो अच्छी बातों का सुसमाचार सुनाते हैं। 16 परन्तु सब ने उस सुसमाचार पर कान न लगाया: यशायाह कहता है, कि हे प्रभु, किस ने हमारे समाचार की प्रतीति की है? 17 सो विश्वास सुनने से, और सुनना मसीह के वचन से होता है। 18 परन्तु मैं कहता हूं, क्या उन्होंने नहीं सुना? सुना तो सही क्योंकि लिखा है कि उन के स्वर सारी पृथ्वी पर, और उन के वचन जगत की छोर तक पहुंच गए हैं।

सुसमाचार की धारा
इस भाग में एक स्पष्ट क्रम दिखाई देता है—प्रचारक भेजे जाते हैं, सुसमाचार सुनाया जाता है, लोग सुनते हैं और सुनने के द्वारा विश्वास उत्पन्न होता है।
पढ़ते समय ध्यान दें
पद 14–15 में लगातार प्रश्नों के द्वारा पौलुस यह दिखाता है कि सुसमाचार के प्रचार और उसके सुने जाने की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है।
04

इस्राएल ने सुना, फिर भी आज्ञा नहीं मानी

पद 19–21

19 फिर मैं कहता हूं। क्या इस्त्राएली नहीं जानते थे? पहिले तो मूसा कहता है, कि मैं उन के द्वारा जो जाति नहीं, तुम्हारे मन में जलन उपजाऊंगा, मैं एक मूढ़ जाति के द्वारा तुम्हें रिस दिलाऊंगा। 20 फिर यशायाह बड़े हियाव के साथ कहता है, कि जो मुझे नहीं ढूंढ़ते थे, उन्होंने मुझे पा लिया: और जो मुझे पूछते भी न थे, उन पर मैं प्रगट हो गया। 21 परन्तु इस्त्राएल के विषय में वह यह कहता है कि मैं सारे दिन अपने हाथ एक आज्ञा न मानने वाली और विवाद करने वाली प्रजा की ओर पसारे रहा॥

अध्याय का निष्कर्ष
अध्याय का अंत एक गंभीर contrast के साथ होता है: अन्यजातियों के विषय में कहा गया कि उन्होंने परमेश्वर को पाया, जबकि इस्त्राएल के विषय में आज्ञा न मानने और विवाद करने वाली प्रजा की तस्वीर सामने आती है।
अध्याय 9 से अध्याय 10 तक
अध्याय 9 में धार्मिकता के विषय में इस्राएल और अन्यजातियों का contrast सामने आया था। अध्याय 10 उसी बात को और स्पष्ट करता है—समस्या परमेश्वर की धार्मिकता की उपलब्धता नहीं, बल्कि उसे विश्वास से स्वीकार करने की बात है।
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