यीशु की जंगल में परीक्षा
पद 1–111तब उस समय आत्मा यीशु को जंगल में ले गया ताकि इब्लीस से उस की परीक्षा हो। 2वह चालीस दिन, और चालीस रात, निराहार रहा, अन्त में उसे भूख लगी। 3तब परखने वाले ने पास आकर उस से कहा, यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियां बन जाएं।
उस ने उत्तर दिया; कि लिखा है कि मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है जीवित रहेगा।
4उस ने उत्तर दिया; कि लिखा है कि मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है जीवित रहेगा। 5तब इब्लीस उसे पवित्र नगर में ले गया और मन्दिर के कंगूरे पर खड़ा किया। 6और उस से कहा यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो अपने आप को नीचे गिरा दे; क्योंकि लिखा है, कि वह तेरे विषय में अपने स्वर्गदूतों को आज्ञा देगा; और वे तुझे हाथों हाथ उठा लेंगे; कहीं ऐसा न हो कि तेरे पांवों में पत्थर से ठेस लगे।
यीशु ने उस से कहा; यह भी लिखा है, कि तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर।
7यीशु ने उस से कहा; यह भी लिखा है, कि तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर। 8फिर शैतान उसे एक बहुत ऊंचे पहाड़ पर ले गया और सारे जगत के राज्य और उसका विभव दिखाकर 9उस से कहा, कि यदि तू गिरकर मुझे प्रणाम करे, तो मैं यह सब कुछ तुझे दे दूंगा।
तब यीशु ने उस से कहा; हे शैतान दूर हो जा, क्योंकि लिखा है, कि तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रणाम कर, और केवल उसी की उपासना कर।
10तब यीशु ने उस से कहा; हे शैतान दूर हो जा, क्योंकि लिखा है, कि तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रणाम कर, और केवल उसी की उपासना कर। 11तब शैतान उसके पास से चला गया, और देखो, स्वर्गदूत आकर उस की सेवा करने लगे॥
इस पूरे प्रसंग में यीशु हर परीक्षा का उत्तर परमेश्वर के वचन के आधार पर देता है। अध्याय में तीनों परीक्षाओं के बीच एक स्पष्ट बात दिखाई देती है—यीशु परमेश्वर की इच्छा और उपासना से समझौता नहीं करता।
गलील में यीशु का प्रचार आरम्भ
पद 12–1712जब उस ने यह सुना कि यूहन्ना पकड़वा दिया गया, तो वह गलील को चला गया। 13और नासरत को छोड़कर कफरनहूम में जो झील के किनारे जबूलून और नपताली के देश में है जाकर रहने लगा। 14ताकि जो यशायाह भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा गया था, वह पूरा हो।
15कि जबूलून और नपताली के देश, झील के मार्ग से यरदन के पार अन्यजातियों का गलील। 16जो लोग अन्धकार में बैठे थे उन्होंने बड़ी ज्योति देखी; और जो मृत्यु के देश और छाया में बैठे थे, उन पर ज्योति चमकी॥
जो लोग अन्धकार में बैठे थे उन्होंने बड़ी ज्योति देखी; और जो मृत्यु के देश और छाया में बैठे थे, उन पर ज्योति चमकी॥
17उस समय से यीशु प्रचार करना और यह कहना आरम्भ किया, कि मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है।
यूहन्ना के संदेश की तरह यीशु के प्रचार का आरम्भ भी “मन फिराओ” के संदेश से होता है। साथ ही, इस भाग में यीशु के गलील में रहने और सेवा करने को यशायाह के द्वारा कहे गए वचन से जोड़ा गया है।
पहले शिष्यों को बुलाना
पद 18–2218उस ने गलील की झील के किनारे फिरते हुए दो भाइयों अर्थात शमौन को जो पतरस कहलाता है, और उसके भाई अन्द्रियास को झील में जाल डालते देखा; क्योंकि वे मछवे थे। 19और उन से कहा, मेरे पीछे चले आओ, तो मैं तुम को मनुष्यों के पकड़ने वाले बनाऊंगा। 20वे तुरन्त जालों को छोड़कर उसके पीछे हो लिए।
और उन से कहा, मेरे पीछे चले आओ, तो मैं तुम को मनुष्यों के पकड़ने वाले बनाऊंगा।
21और वहां से आगे बढ़कर, उस ने और दो भाइयों अर्थात जब्दी के पुत्र याकूब और उसके भाई यूहन्ना को अपने पिता जब्दी के साथ नाव पर अपने जालों को सुधारते देखा; और उन्हें भी बुलाया 22वे तुरन्त नाव और अपने पिता को छोड़कर उसके पीछे हो लिए॥
पद 20 और 22 में “तुरन्त” शब्द उनकी प्रतिक्रिया को सामने लाता है। बुलाहट सुनने के बाद उन्होंने अपने जाल, नाव और पिता को छोड़कर यीशु के पीछे चलना स्वीकार किया।
यीशु की शिक्षा, सुसमाचार और चंगाई की सेवकाई
पद 23–25और यीशु सारे गलील में फिरता हुआ उन की सभाओं में उपदेश करता और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और दुर्बल्ता को दूर करता रहा।
23और यीशु सारे गलील में फिरता हुआ उन की सभाओं में उपदेश करता और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और दुर्बल्ता को दूर करता रहा।
24और सारे सूरिया में उसका यश फैल गया; और लोग सब बीमारों को, जो नाना प्रकार की बीमारियों और दुखों में जकड़े हुए थे, और जिन में दुष्टात्माएं थीं और मिर्गी वालों और झोले के मारे हुओं को उसके पास लाए और उस ने उन्हें चंगा किया। 25और गलील और दिकापुलिस और यरूशलेम और यहूदिया से और यरदन के पार से भीड़ की भीड़ उसके पीछे हो ली॥
पद 23 में यीशु की सेवकाई के तीन प्रमुख पहलू एक साथ दिखाई देते हैं—उपदेश करना, राज्य का सुसमाचार प्रचार करना और लोगों की बीमारियों तथा दुर्बलताओं को दूर करना। इसके बाद पद 24–25 में बताया गया है कि उसका यश दूर-दूर तक फैल गया और बड़ी भीड़ उसके पीछे हो ली।
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