यीशु की मृत्यु की भविष्यवाणी और उसे मार डालने की योजना
पद 1–51जब यीशु ये सब बातें कह चुका, तो अपने चेलों से कहने लगा। 2तुम जानते हो, कि दो दिन के बाद फसह का पर्व होगा; और मनुष्य का पुत्र क्रूस पर चढ़ाए जाने के लिये पकड़वाया जाएगा। 3तब महायाजक और प्रजा के पुरनिए काइफा नाम महायाजक के आंगन में इकट्ठे हुए। 4और आपस में विचार करने लगे कि यीशु को छल से पकड़कर मार डालें। 5परन्तु वे कहते थे, कि पर्व के समय नहीं; कहीं ऐसा न हो कि लोगों में बलवा मच जाए।
मनुष्य का पुत्र क्रूस पर चढ़ाए जाने के लिये पकड़वाया जाएगा।
अध्याय की शुरुआत ही यीशु की मृत्यु की स्पष्ट भविष्यवाणी से होती है। आगे आने वाली घटनाएं अचानक घटित नहीं होतीं; यीशु पहले से जानता है कि क्या होने वाला है।
बैतनिय्याह में यीशु का अभिषेक और स्त्री का प्रेम
पद 6–136जब यीशु बैतनिय्याह में शमौन कोढ़ी के घर में था। 7तो एक स्त्री संगमरमर के पात्र में बहुमोल इत्र लेकर उसके पास आई, और जब वह भोजन करने बैठा था, तो उसके सिर पर उण्डेल दिया। 8यह देखकर, उसके चेले रिसयाए और कहने लगे, इस का क्यों सत्यानाश किया गया? 9यह तो अच्छे दाम पर बिक कर कंगालों को बांटा जा सकता था। 10यह जानकर यीशु ने उन से कहा, स्त्री को क्यों सताते हो? उस ने मेरे साथ भलाई की है। 11कंगाल तुम्हारे साथ सदा रहते हैं, परन्तु मैं तुम्हारे साथ सदैव न रहूंगा।
12उस ने मेरी देह पर जो यह इत्र उण्डेला है, वह मेरे गाढ़े जाने के लिये किया है। 13मैं तुम से सच कहता हूं, कि सारे जगत में जहां कहीं यह सुसमाचार प्रचार किया जाएगा, वहां उसके इस काम का वर्णन भी उसके स्मरण में किया जाएगा।
उस ने मेरे साथ भलाई की है।
शिष्यों ने इस स्त्री के कार्य को व्यर्थ खर्च समझा, लेकिन यीशु ने उसके कार्य को प्रेम और भलाई के रूप में देखा। परमेश्वर के लिये किया गया सच्चा प्रेम कभी व्यर्थ नहीं जाता।
यहूदा का यीशु को पकड़वाने का समझौता
पद 14–1614तब यहूदा इस्करियोती नाम बारह चेलों में से एक ने महायाजकों के पास जाकर कहा। 15यदि मैं उसे तुम्हारे हाथ पकड़वा दूं, तो मुझे क्या दोगे? उन्होंने उसे तीस चांदी के सिक्के तौलकर दे दिए। 16और वह उसी समय से उसे पकड़वाने का अवसर ढूंढ़ने लगा॥
यीशु के साथ विश्वासघात किसी बाहरी शत्रु से नहीं, बल्कि उसके बारह चेलों में से एक के द्वारा होने वाला था। यह अध्याय के आगे के घटनाक्रम को और अधिक गंभीर बना देता है।
फसह का भोजन और विश्वासघात की घोषणा
पद 17–2517अखमीरी रोटी के पर्व के पहिले दिन, चेले यीशु के पास आकर पूछने लगे; तू कहां चाहता है कि हम तेरे लिये फसह खाने की तैयारी करें? 18उस ने कहा, नगर में फलाने के पास जाकर उस से कहो, कि गुरू कहता है, कि मेरा समय निकट है, मैं अपने चेलों के साथ तेरे यहां पर्व मनाऊंगा। 19सो चेलों ने यीशु की आज्ञा मानी, और फसह तैयार किया। 20जब सांझ हुई, तो वह बारहों के साथ भोजन करने के लिये बैठा। 21जब वे खा रहे थे, तो उस ने कहा, मैं तुम से सच कहता हूं, कि तुम में से एक मुझे पकड़वाएगा। 22इस पर वे बहुत उदास हुए, और हर एक उस से पूछने लगा, हे गुरू, क्या वह मैं हूं? 23उस ने उत्तर दिया, कि जिस ने मेरे साथ थाली में हाथ डाला है, वही मुझे पकड़वाएगा। 24मनुष्य का पुत्र तो जैसा उसके विषय में लिखा है, जाता ही है; परन्तु उस मनुष्य के लिये शोक है जिस के द्वारा मनुष्य का पुत्र पकड़वाया जाता है: यदि उस मनुष्य का जन्म न होता, तो उसके लिये भला होता। 25तब उसके पकड़वाने वाले यहूदा ने कहा कि हे रब्बी, क्या वह मैं हूं?
परन्तु उस मनुष्य के लिये शोक है जिस के द्वारा मनुष्य का पुत्र पकड़वाया जाता है।
प्रभु भोज की स्थापना
पद 26–3026उस ने उस से कहा, तू कह चुका: जब वे खा रहे थे, तो यीशु ने रोटी ली, और आशीष मांग कर तोड़ी, और चेलों को देकर कहा, लो, खाओ; यह मेरी देह है। 27फिर उस ने कटोरा लेकर, धन्यवाद किया, और उन्हें देकर कहा, तुम सब इस में से पीओ। 28क्योंकि यह वाचा का मेरा वह लोहू है, जो बहुतों के लिये पापों की क्षमा के निमित्त बहाया जाता है। 29मैं तुम से कहता हूं, कि दाख का यह रस उस दिन तक कभी न पीऊंगा, जब तक तुम्हारे साथ अपने पिता के राज्य में नया न पीऊं॥ 30फिर वे भजन गाकर जैतून पहाड़ पर गए॥
क्योंकि यह वाचा का मेरा वह लोहू है, जो बहुतों के लिये पापों की क्षमा के निमित्त बहाया जाता है।
इस भोजन में रोटी और दाख के रस को यीशु अपनी देह और वाचा के लोहू के साथ जोड़ता है। यह आगे चलकर मसीही विश्वास में प्रभु भोज की मूल घटना के रूप में स्मरण किया जाता है।
चेलों का ठोकर खाना और पतरस का इन्कार
पद 31–3531तब यीशु ने उन से कहा; तुम सब आज ही रात को मेरे विषय में ठोकर खाओगे; क्योंकि लिखा है, कि मैं चरवाहे को मारूंगा; और झुण्ड की भेड़ें तित्तर बित्तर हो जाएंगी। 32परन्तु मैं अपने जी उठने के बाद तुम से पहले गलील को जाऊंगा। 33इस पर पतरस ने उस से कहा, यदि सब तेरे विषय में ठोकर खाएं तो खाएं, परन्तु मैं कभी भी ठोकर न खाऊंगा। 34यीशु ने उस से कहा, मैं तुम से सच कहता हूं, कि आज ही रात को मुर्गे के बांग देने से पहिले, तू तीन बार मुझ से मुकर जाएगा। 35पतरस ने उस से कहा, यदि मुझे तेरे साथ मरना भी हो, तौभी, मैं तुझ से कभी न मुकरूंगा: और ऐसा ही सब चेलों ने भी कहा॥
आज ही रात को मुर्गे के बांग देने से पहिले, तू तीन बार मुझ से मुकर जाएगा।
पतरस का आत्मविश्वास बहुत दृढ़ था, लेकिन यीशु उसके आने वाले इन्कार को पहले से जानता था। अपने सामर्थ पर भरोसा करने के बजाय जागते और प्रार्थना करते रहना इस अध्याय की महत्वपूर्ण शिक्षा है।
गतसमनी में यीशु की प्रार्थना
पद 36–4636तब यीशु ने अपने चेलों के साथ गतसमनी नाम एक स्थान में आया और अपने चेलों से कहने लगा कि यहीं बैठे रहना, जब तक कि मैं वहां जाकर प्रार्थना करूं। 37और वह पतरस और जब्दी के दोनों पुत्रों को साथ ले गया, और उदास और व्याकुल होने लगा। 38तब उस ने उन से कहा; मेरा जी बहुत उदास है, यहां तक कि मेरे प्राण निकला चाहते: तुम यहीं ठहरो, और मेरे साथ जागते रहो। 39फिर वह थोड़ा और आगे बढ़कर मुंह के बल गिरा, और यह प्रार्थना करने लगा, कि हे मेरे पिता, यदि हो सके, तो यह कटोरा मुझ से टल जाए; तौभी जैसा मैं चाहता हूं वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो।
40फिर चेलों के पास आकर उन्हें सोते पाया, और पतरस से कहा; क्या तुम मेरे साथ एक घड़ी भी न जाग सके? 41जागते रहो, और प्रार्थना करते रहो, कि तुम परीक्षा में न पड़ो: आत्मा तो तैयार है, परन्तु शरीर दुर्बल है। 42फिर उस ने दूसरी बार जाकर यह प्रार्थना की; कि हे मेरे पिता, यदि यह मेरे पीए बिना नहीं हट सकता तो तेरी इच्छा पूरी हो। 43तब उस ने आकर उन्हें फिर सोते पाया, क्योंकि उन की आंखें नींद से भरी थीं। 44और उन्हें छोड़कर फिर चला गया, और वही बात फिर कहकर, तीसरी बार प्रार्थना की। 45तब उस ने चेलों के पास आकर उन से कहा; अब सोते रहो, और विश्राम करो: देखो, घड़ी आ पहुंची है, और मनुष्य का पुत्र पापियों के हाथ पकड़वाया जाता है। 46उठो, चलें; देखो, मेरा पकड़वाने वाला निकट आ पहुंचा है॥
जागते रहो, और प्रार्थना करते रहो, कि तुम परीक्षा में न पड़ो: आत्मा तो तैयार है, परन्तु शरीर दुर्बल है।
गतसमनी में यीशु की प्रार्थना उसके गहरे दुःख को प्रकट करती है, लेकिन साथ ही उसकी पूर्ण समर्पण-भावना भी दिखाई देती है: “जैसा मैं चाहता हूं वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो।”
यीशु की गिरफ्तारी और चेलों का भाग जाना
पद 47–5647वह यह कह ही रहा था, कि देखो यहूदा जो बारहों में से एक था, आया, और उसके साथ महायाजकों और लोगों के पुरनियों की ओर से बड़ी भीड़, तलवारें और लाठियां लिए हुए आई। 48उसके पकड़वाने वाले ने उन्हें यह पता दिया था कि जिस को मैं चूम लूं वही है; उसे पकड़ लेना। 49और तुरन्त यीशु के पास आकर कहा; हे रब्बी नमस्कार; और उस को बहुत चूमा। 50यीशु ने उस से कहा; हे मित्र, जिस काम के लिये तू आया है, उसे कर ले। तब उन्होंने पास आकर यीशु पर हाथ डाले, और उसे पकड़ लिया। 51और देखो, यीशु के साथियों में से एक ने हाथ बढ़ाकर अपनी तलवार खींच ली और महायाजक के दास पर चलाकर उस का कान उड़ा दिया। 52तब यीशु ने उस से कहा; अपनी तलवार म्यान में रख ले क्योंकि जो तलवार चलाते हैं, वे सब तलवार से नाश किए जाएंगे।
53क्या तू नहीं समझता, कि मैं अपने पिता से बिनती कर सकता हूं, और वह स्वर्गदूतों की बारह पलटन से अधिक मेरे पास अभी उपस्थित कर देगा? 54परन्तु पवित्र शास्त्र की वे बातें कि ऐसा ही होना अवश्य है, क्योंकर पूरी होंगी? 55उसी घड़ी यीशु ने भीड़ से कहा; क्या तुम तलवारें और लाठियां लेकर मुझे डाकू के समान पकड़ने के लिये निकले हो? मैं हर दिन मन्दिर में बैठकर उपदेश दिया करता था, और तुम ने मुझे नहीं पकड़ा। 56परन्तु यह सब इसलिये हुआ है, कि भविष्यद्वक्ताओं के वचन के पूरे हों: तब सब चेले उसे छोड़कर भाग गए॥
परन्तु पवित्र शास्त्र की वे बातें कि ऐसा ही होना अवश्य है, क्योंकर पूरी होंगी?
यीशु गिरफ्तारी से बचने में असमर्थ नहीं था। वह स्वयं अपने पिता से स्वर्गदूतों की सहायता मांग सकता था, फिर भी वह पवित्र शास्त्र के पूरा होने के मार्ग को स्वीकार करता है।
महायाजक के सामने यीशु की सुनवाई
पद 57–6857और यीशु के पकड़ने वाले उस को काइफा नाम महायाजक के पास ले गए, जहां शास्त्री और पुरनिए इकट्ठे हुए थे। 58और पतरस दूर से उसके पीछे पीछे महायाजक के आंगन तक गया, और भीतर जाकर अन्त देखने को प्यादों के साथ बैठ गया। 59महायाजक और सारी महासभा यीशु को मार डालने के लिये उसके विरोध में झूठी गवाही की खोज में थे। 60परन्तु बहुत से झूठे गवाहों के आने पर भी न पाई। 61अन्त में दो जनों ने आकर कहा, कि उस ने कहा है; कि मैं परमेश्वर के मन्दिर को ढा सकता हूं और उसे तीन दिन में बना सकता हूं। 62तब महायाजक ने खड़े होकर उस से कहा, क्या तू कोई उत्तर नहीं देता? ये लोग तेरे विरोध में क्या गवाही देते हैं? परन्तु यीशु चुप रहा।
63महायाजक ने उस से कहा। मैं तुझे जीवते परमेश्वर की शपथ देता हूं, कि यदि तू परमेश्वर का पुत्र मसीह है, तो हम से कह दे। 64यीशु ने उस से कहा; तू ने आप ही कह दिया: वरन मैं तुम से यह भी कहता हूं, कि अब से तुम मनुष्य के पुत्र को सर्वशक्तिमान की दाहिनी ओर बैठे, और आकाश के बादलों पर आते देखोगे। 65तब महायाजक ने अपने वस्त्र फाड़कर कहा, इस ने परमेश्वर की निन्दा की है, अब हमें गवाहों का क्या प्रयोजन? 66देखो, तुम ने अभी यह निन्दा सुनी है! तुम क्या समझते हो? उन्होंने उत्तर दिया, यह वध होने के योग्य है। 67तब उन्होंने उस के मुंह पर थूका, और उसे घूंसे मारे, औरों ने थप्पड़ मार के कहा। 68हे मसीह, हम से भविष्यद्वाणी करके कह: कि किस ने तुझे मारा?
अब से तुम मनुष्य के पुत्र को सर्वशक्तिमान की दाहिनी ओर बैठे, और आकाश के बादलों पर आते देखोगे।
यहाँ यीशु अपने विषय में एक अत्यन्त महत्वपूर्ण घोषणा करता है। उसके उत्तर के बाद महायाजक उसकी बात को परमेश्वर की निन्दा मानता है और सभा उसके लिये मृत्यु-दण्ड योग्य होने का निर्णय देती है।
पतरस का यीशु से तीन बार इन्कार
पद 69–7569और पतरस बाहर आंगन में बैठा हुआ था: कि एक लौंडी ने उसके पास आकर कहा; तू भी यीशु गलीली के साथ था। 70उस ने सब के साम्हने यह कह कर इन्कार किया और कहा, मैं नहीं जानता तू क्या कह रही है। 71जब वह बाहर डेवढ़ी में चला गया, तो दूसरी ने उसे देखकर उन से जो वहां थे कहा; यह भी तो यीशु नासरी के साथ था। 72उस ने शपथ खाकर फिर इन्कार किया कि मैं उस मनुष्य को नहीं जानता। 73थोड़ी देर के बाद, जो वहां खड़े थे, उन्होंने पतरस के पास आकर उस से कहा, सचमुच तू भी उन में से एक है; क्योंकि तेरी बोली तेरा भेद खोल देती है।
74तब वह धिक्कार देने और शपथ खाने लगा, कि मैं उस मनुष्य को नहीं जानता; और तुरन्त मुर्ग ने बांग दी। 75तब पतरस को यीशु की कही हुई बात स्मरण आई कि मुर्ग के बांग देने से पहिले तू तीन बार मेरा इन्कार करेगा और वह बाहर जाकर फूट फूट कर रोने लगा॥
तब पतरस को यीशु की कही हुई बात स्मरण आई कि मुर्ग के बांग देने से पहिले तू तीन बार मेरा इन्कार करेगा और वह बाहर जाकर फूट फूट कर रोने लगा॥
पतरस का इन्कार उसकी पहले की प्रतिज्ञाओं के बिल्कुल विपरीत था। लेकिन उसकी प्रतिक्रिया—यीशु की बात स्मरण करके फूट-फूट कर रोना—उसके भीतर हुए गहरे पश्चाताप को दिखाती है।
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