पाठ 03
बाइबल की पुस्तकों का परिचय: सभी 66 पुस्तकों को समझें
बाइबल की हर पुस्तक किस बारे में है, उसे क्यों लिखा गया और उसे पढ़ते समय किन बातों पर ध्यान देना चाहिए — आसान हिंदी में जानें।
बाइबल में सामान्य प्रोटेस्टेंट बाइबल के अनुसार 66 पुस्तकें हैं। इनमें 39 पुराने नियम में और 27 नए नियम में हैं। हर पुस्तक का अपना विषय, उद्देश्य और संदेश है।
कुछ पुस्तकें इतिहास बताती हैं, कुछ प्रार्थना और बुद्धि सिखाती हैं, कुछ भविष्यवक्ताओं के संदेश देती हैं और कुछ यीशु मसीह तथा आरंभिक कलीसिया के बारे में बताती हैं।
पुराने और नए नियम की सभी पुस्तकों का परिचय, उनके मुख्य विषय, पाँच-पाँच समूहों का महत्व और बाइबल को सही तरीके से पढ़ने का तरीका।
1. बाइबल में इतनी सारी पुस्तकें क्यों हैं?
जब हम बाइबल खोलते हैं, तो हमें अलग-अलग नामों वाली अनेक पुस्तकें दिखाई देती हैं। कोई पुस्तक इतिहास बताती है, कोई कविता और प्रार्थना सिखाती है, कोई भविष्यवाणी करती है और कोई यीशु मसीह की शिक्षाओं के बारे में बताती है।
इसका कारण यह है कि परमेश्वर के कार्यों, मनुष्य के जीवन, इस्राएल के इतिहास और यीशु मसीह के संदेश को अलग-अलग समय और परिस्थितियों में लिखा गया। इसलिए बाइबल एक ही प्रकार की पुस्तक नहीं, बल्कि अलग-अलग प्रकार के लेखों का संग्रह है।
इन सभी पुस्तकों को समझने का एक अच्छा तरीका है कि हम उन्हें उनके विषय और उद्देश्य के अनुसार समूहों में बाँटकर पढ़ें।
बाइबल की हर पुस्तक को पढ़ते समय तीन प्रश्न पूछें: यह पुस्तक किस बारे में है? इसे किस उद्देश्य से लिखा गया? इससे हमें क्या सीख मिलती है?
2. बाइबल की 66 पुस्तकों का परिचय: एक नज़र में
पुराने नियम में सृष्टि से लेकर इस्राएल के इतिहास, व्यवस्था, आराधना, बुद्धि और भविष्यवक्ताओं के संदेश मिलते हैं। नए नियम में यीशु मसीह का जीवन, उनकी शिक्षा, मृत्यु और पुनरुत्थान तथा आरंभिक कलीसिया का इतिहास मिलता है।
अब हम एक-एक समूह की पुस्तकों को समझेंगे।
3. पुराने नियम की 39 पुस्तकें
पुराने नियम की पुस्तकें हमें सृष्टि की शुरुआत, मनुष्य के जीवन, इस्राएल के इतिहास, परमेश्वर की व्यवस्था और भविष्यवक्ताओं के संदेशों से परिचित कराती हैं। इन्हें पाँच समूहों में समझना आसान है।
1. व्यवस्था की पुस्तकें (5 पुस्तकें)
इन पुस्तकों में सृष्टि की शुरुआत, इस्राएल के पूर्वजों का जीवन, मिस्र से निकलने की घटना और परमेश्वर की व्यवस्था का वर्णन मिलता है।
1. उत्पत्ति — संसार और मनुष्य की सृष्टि, आदम और हव्वा, नूह, अब्राहम, इसहाक, याकूब और यूसुफ का इतिहास।
2. निर्गमन — इस्राएलियों की मिस्र की गुलामी से मुक्ति, मूसा की अगुवाई और परमेश्वर की व्यवस्था।
3. लैव्यव्यवस्था — याजकों, बलिदानों, पवित्रता और आराधना से संबंधित नियम।
4. गिनती — जंगल में इस्राएलियों की यात्रा, उनकी परीक्षाएँ, गलतियाँ और परमेश्वर की अगुवाई।
5. व्यवस्थाविवरण — मूसा द्वारा इस्राएलियों को व्यवस्था और परमेश्वर के साथ अपनी वाचा याद दिलाना।
पढ़ते समय ध्यान दें: परमेश्वर ने इस्राएल को कैसे चुना, उसकी अगुवाई कैसे की और लोगों ने उसकी आज्ञाओं पर कैसी प्रतिक्रिया दी।
2. ऐतिहासिक पुस्तकें (12 पुस्तकें)
इन पुस्तकों में इस्राएलियों का कनान देश में प्रवेश, न्यायियों का समय, राजाओं का शासन, राज्य का विभाजन, बंदी बनाया जाना और वापसी का इतिहास मिलता है।
1. यहोशू — यहोशू की अगुवाई में इस्राएलियों का कनान देश में प्रवेश।
2. न्यायियों — इस्राएल में न्यायियों का समय और लोगों का बार-बार परमेश्वर से दूर जाना।
3. रूत — रूत की विश्वासयोग्यता, प्रेम और परमेश्वर की योजना में उसके परिवार का स्थान।
4. 1 शमूएल — शमूएल का जीवन, शाऊल का राजा बनना और दाऊद का आरंभिक जीवन।
5. 2 शमूएल — दाऊद का शासन, उसकी सफलताएँ और उसके जीवन की गलतियाँ।
6. 1 राजा — सुलैमान का शासन, मंदिर का निर्माण और राज्य का विभाजन।
7. 2 राजा — इस्राएल और यहूदा के राजाओं का इतिहास तथा दोनों राज्यों का पतन।
8. 1 इतिहास — दाऊद के परिवार और उसके शासन से जुड़ी घटनाएँ।
9. 2 इतिहास — सुलैमान, मंदिर और यहूदा के राजाओं का इतिहास।
10. एज्रा — बंदी बनाए जाने के बाद लोगों की वापसी और मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य।
11. नहेमायाह — यरूशलेम की दीवारों का पुनर्निर्माण और लोगों का आत्मिक सुधार।
12. एस्तेर — एस्तेर की कहानी और फारस में यहूदी लोगों की रक्षा।
पढ़ते समय ध्यान दें: राजाओं और लोगों के फैसलों के परिणाम, विश्वासयोग्यता, नेतृत्व और परमेश्वर पर निर्भरता को समझें।
3. काव्य और ज्ञान की पुस्तकें (5 पुस्तकें)
इन पुस्तकों में मनुष्य के दुख, सुख, प्रार्थना, आराधना, जीवन के अनुभव और बुद्धिमानी से जीने की शिक्षा मिलती है।
1. अय्यूब — दुख और पीड़ा के बीच विश्वास, धीरज और परमेश्वर की महानता।
2. भजन संहिता — प्रार्थनाएँ, स्तुतियाँ, धन्यवाद, दुख और परमेश्वर पर भरोसा।
3. नीतिवचन — बुद्धिमानी, अनुशासन, सही निर्णय और अच्छे चरित्र की शिक्षा।
4. सभोपदेशक — जीवन की वास्तविकता, समय, परिश्रम और परमेश्वर का आदर करने की शिक्षा।
5. श्रेष्ठगीत — प्रेम और वैवाहिक संबंध की सुंदरता को काव्य के रूप में प्रस्तुत करने वाली पुस्तक।
पढ़ते समय ध्यान दें: प्रार्थना करना, दुख में परमेश्वर पर भरोसा रखना, बुद्धिमानी से निर्णय लेना और अच्छे चरित्र का निर्माण करना सीखें।
4. बड़े भविष्यवक्ता (5 पुस्तकें)
इन पुस्तकों को बड़े भविष्यवक्ता इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये सामान्यतः आकार में बड़ी हैं। इनके संदेशों में चेतावनी, न्याय, पश्चाताप और आशा की बातें मिलती हैं।
1. यशायाह — परमेश्वर का न्याय, उद्धार की आशा और आने वाले मसीह से संबंधित महत्वपूर्ण भविष्यवाणियाँ।
2. यिर्मयाह — लोगों को पश्चाताप की चेतावनी और नई वाचा की प्रतिज्ञा।
3. विलापगीत — यरूशलेम के विनाश पर दुख और परमेश्वर की दया में आशा।
4. यहेजकेल — बंदी जीवन के दौरान दर्शन, चेतावनी और इस्राएल की पुनर्स्थापना की आशा।
5. दानिय्येल — विदेशी राज्यों में विश्वासयोग्यता, दर्शन और परमेश्वर की सर्वोच्च सत्ता।
पढ़ते समय ध्यान दें: भविष्यवक्ताओं ने लोगों को किन गलतियों से सावधान किया और उन्हें परमेश्वर की ओर लौटने के लिए कैसे बुलाया।
5. छोटे भविष्यवक्ता (12 पुस्तकें)
इन पुस्तकों को छोटा भविष्यवक्ता कहा जाता है क्योंकि इनका आकार अपेक्षाकृत छोटा है। इनके संदेश भी न्याय, पश्चाताप, दया और आशा से जुड़े हैं।
1. होशे — इस्राएल की विश्वासघात की स्थिति और परमेश्वर का प्रेम।
2. योएल — पश्चाताप का आह्वान और परमेश्वर के आत्मा के उंडेले जाने की प्रतिज्ञा।
3. आमोस — अन्याय, अत्याचार और झूठी धार्मिकता के विरुद्ध संदेश।
4. ओबद्याह — एदोम के घमंड और उसके विरुद्ध परमेश्वर के न्याय का संदेश।
5. योना — नीनवे के लोगों के लिए चेतावनी और परमेश्वर की दया।
6. मीका — न्याय, दया और नम्रता से परमेश्वर के साथ चलने की शिक्षा।
7. नहूम — नीनवे के विरुद्ध न्याय की घोषणा।
8. हबक्कूक — बुराई और अन्याय के बीच विश्वास बनाए रखने का संदेश।
9. सपन्याह — परमेश्वर के न्याय और नम्र लोगों के लिए आशा।
10. हाग्गै — मंदिर के पुनर्निर्माण और परमेश्वर के कार्य को प्राथमिकता देने का संदेश।
11. जकर्याह — दर्शन, मंदिर के पुनर्निर्माण और भविष्य की आशा।
12. मलाकी — लोगों को परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य रहने और सच्ची आराधना करने की शिक्षा।
पढ़ते समय ध्यान दें: परमेश्वर अन्याय और बुराई को गंभीरता से लेता है, लेकिन पश्चाताप करने वालों के लिए दया और आशा भी रखता है।
5 + 12 + 5 + 5 + 12 = 39 पुस्तकें।
व्यवस्था 5, इतिहास 12, काव्य और ज्ञान 5, बड़े भविष्यवक्ता 5 और छोटे भविष्यवक्ता 12।
4. नए नियम की 27 पुस्तकें
नया नियम यीशु मसीह के जीवन, उनकी शिक्षाओं, मृत्यु और पुनरुत्थान से शुरू होता है। इसके बाद आरंभिक कलीसिया का इतिहास और अलग-अलग कलीसियाओं तथा विश्वासियों को लिखे गए पत्र आते हैं।
1. सुसमाचार की पुस्तकें (4 पुस्तकें)
चारों सुसमाचार यीशु मसीह के जीवन, शिक्षाओं, कार्यों, मृत्यु और पुनरुत्थान का वर्णन करते हैं। प्रत्येक लेखक ने अपने लेखन में अलग-अलग बातों पर विशेष ध्यान दिया है।
1. मत्ती — यीशु की शिक्षाएँ, उनके कार्य और यहूदी श्रोताओं के संदर्भ में मसीहा के रूप में उनका परिचय।
2. मरकुस — यीशु के कार्यों, सामर्थ्य, सेवा और दुख उठाने पर विशेष ध्यान।
3. लूका — यीशु का जीवन, उनकी दया, प्रार्थना और सभी प्रकार के लोगों के प्रति उनका व्यवहार।
4. यूहन्ना — यीशु की पहचान, उनके चिन्ह और उन पर विश्वास करने के महत्व का वर्णन।
पढ़ते समय ध्यान दें: यीशु कौन हैं, उन्होंने क्या सिखाया और उन्होंने लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया।
2. इतिहास की पुस्तक (1 पुस्तक)
नए नियम में एक ऐतिहासिक पुस्तक है, जो यीशु के स्वर्गारोहण के बाद आरंभिक कलीसिया के फैलने का वर्णन करती है।
1. प्रेरितों के काम — पवित्र आत्मा के कार्य, पिन्तेकुस्त की घटना, आरंभिक कलीसिया और प्रेरितों द्वारा सुसमाचार का प्रचार।
पढ़ते समय ध्यान दें: आरंभिक विश्वासियों ने कैसे प्रार्थना की, एक-दूसरे की सहायता की और अलग-अलग स्थानों तक सुसमाचार पहुँचाया।
3. पौलुस के पत्र (13 पुस्तकें)
ये पत्र प्रेरित पौलुस से जुड़े हैं। इनमें कलीसियाओं और व्यक्तियों को विश्वास, उद्धार, मसीही जीवन, प्रेम और कलीसिया के व्यवहार के बारे में शिक्षा दी गई है।
1. रोमियों — पाप, विश्वास, अनुग्रह, उद्धार और धार्मिकता की शिक्षा।
2. 1 कुरिन्थियों — कलीसिया की समस्याएँ, एकता, प्रेम और आत्मिक वरदान।
3. 2 कुरिन्थियों — पौलुस की सेवकाई, कठिनाइयाँ और परमेश्वर की सामर्थ्य।
4. गलतियों — विश्वास और अनुग्रह का महत्व तथा व्यवस्था के विषय में शिक्षा।
5. इफिसियों — मसीह में नई पहचान, कलीसिया की एकता और आत्मिक जीवन।
6. फिलिप्पियों — आनंद, नम्रता और मसीह के समान जीवन जीने की शिक्षा।
7. कुलुस्सियों — यीशु मसीह की महानता और उनमें विश्वास की पूर्णता।
8. 1 थिस्सलुनीकियों — विश्वास, प्रेम, पवित्र जीवन और मसीह के दोबारा आने की आशा।
9. 2 थिस्सलुनीकियों — प्रभु के दिन और विश्वास में स्थिर रहने की शिक्षा।
10. 1 तीमुथियुस — कलीसिया की व्यवस्था, सही शिक्षा और सेवकाई की जिम्मेदारियाँ।
11. 2 तीमुथियुस — विश्वासयोग्य बने रहने और परमेश्वर के वचन की शिक्षा देने का प्रोत्साहन।
12. तीतुस — कलीसिया के नेतृत्व, अच्छे चरित्र और भले कामों की शिक्षा।
13. फिलेमोन — क्षमा, प्रेम और मसीही भाईचारे का संदेश।
पढ़ते समय ध्यान दें: विश्वास केवल मानने की बात नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार, प्रेम और जीवन में भी दिखाई देना चाहिए।
4. सामान्य पत्र (8 पुस्तकें)
इन पत्रों में विश्वासियों को धीरज, प्रेम, सच्चाई, आज्ञाकारिता और कठिन परिस्थितियों में विश्वास बनाए रखने की शिक्षा दी गई है।
1. इब्रानियों — यीशु मसीह की महानता और विश्वास में स्थिर रहने का संदेश।
2. याकूब — विश्वास के साथ अच्छे काम, वाणी पर नियंत्रण और बुद्धिमानी से जीवन जीने की शिक्षा।
3. 1 पतरस — दुख और परीक्षाओं के बीच आशा और विश्वास बनाए रखना।
4. 2 पतरस — सही शिक्षा में बढ़ना और झूठे शिक्षकों से सावधान रहना।
5. 1 यूहन्ना — प्रेम, आज्ञाकारिता और यीशु पर सच्चे विश्वास की पहचान।
6. 2 यूहन्ना — सत्य और प्रेम में बने रहना तथा गलत शिक्षा से सावधान रहना।
7. 3 यूहन्ना — विश्वासयोग्यता, सेवा और अतिथियों की सहायता का महत्व।
8. यहूदा — विश्वास की रक्षा करना और गलत शिक्षा से सावधान रहना।
पढ़ते समय ध्यान दें: सच्चा विश्वास हमारे प्रेम, व्यवहार, धीरज और सत्य के प्रति निष्ठा में दिखाई देता है।
5. भविष्यवाणी की पुस्तक (1 पुस्तक)
नए नियम की अंतिम पुस्तक दर्शन और भविष्य से संबंधित संदेश प्रस्तुत करती है। इसमें विश्वासियों के लिए आशा और परमेश्वर की अंतिम विजय का वर्णन मिलता है।
1. प्रकाशितवाक्य — यूहन्ना को दिए गए दर्शन, कलीसियाओं के लिए संदेश, न्याय और परमेश्वर की अंतिम विजय का वर्णन।
पढ़ते समय ध्यान दें: इस पुस्तक के प्रतीकों और दर्शनों को समझने में जल्दबाजी न करें। इसके संदेश, मूल संदर्भ और विश्वासियों के लिए दी गई आशा पर ध्यान दें।
4 + 1 + 13 + 8 + 1 = 27 पुस्तकें।
सुसमाचार 4, इतिहास 1, पौलुस के पत्र 13, सामान्य पत्र 8 और प्रकाशितवाक्य 1।
5. बाइबल की पुस्तकों को पढ़ने का सही तरीका
अब आपने सभी पुस्तकों का परिचय जान लिया है। लेकिन केवल पुस्तकों के नाम याद कर लेना पर्याप्त नहीं है। हमें यह भी सीखना चाहिए कि किसी पुस्तक को पढ़ते समय उसकी बातों को सही तरीके से कैसे समझें।
पुस्तक का परिचय जानें
सबसे पहले समझें कि यह पुस्तक किस प्रकार की है — इतिहास, कविता, भविष्यवाणी, सुसमाचार या पत्र।
लेखन की परिस्थिति समझें
पुस्तक में किस समय, किन लोगों और किन परिस्थितियों की बात हो रही है, यह जानने की कोशिश करें।
अध्याय को पूरा पढ़ें
किसी एक वचन को उसके आसपास के वचनों से अलग करके न समझें। पूरे अध्याय का संदर्भ देखें।
मुख्य संदेश पहचानें
लेखक क्या समझाना चाहता है? उस अध्याय का मुख्य विषय क्या है?
जीवन में लागू करें
जो सीख मिली है, उसे अपने व्यवहार, सोच, संबंधों और विश्वास में कैसे लागू कर सकते हैं?
यदि आप भजन संहिता 23 पढ़ रहे हैं, तो याद रखें कि यह काव्य और आराधना की पुस्तक का हिस्सा है। इसमें परमेश्वर को चरवाहे के रूप में दिखाया गया है, जो अपने लोगों की देखभाल और अगुवाई करता है। इस संदेश को समझते समय पूरे भजन को पढ़ें, केवल एक वचन को नहीं।
6. बाइबल की पुस्तकों को समझने में मदद करने वाले महत्वपूर्ण वचन
2 तीमुथियुस 3:16–17
यह वचन बताता है कि पवित्रशास्त्र शिक्षा, समझाने, सुधारने और धार्मिकता की शिक्षा देने के लिए उपयोगी है।
बाइबल संदर्भ: 2 तीमुथियुस 3:16–17
लूका 24:27
यीशु ने मूसा और भविष्यवक्ताओं की पुस्तकों से उन बातों को समझाया जो शास्त्रों में उनके विषय में लिखी थीं।
बाइबल संदर्भ: लूका 24:27
भजन संहिता 119:105
इस वचन में परमेश्वर के वचन को पैरों के लिए दीपक और मार्ग के लिए प्रकाश बताया गया है।
बाइबल संदर्भ: भजन संहिता 119:105
प्रेरितों के काम 17:11
बिरीया के लोगों ने सुनी हुई बातों को जाँचने के लिए प्रतिदिन शास्त्रों को देखा। यह हमें भी वचनों को ध्यान से जाँचने की शिक्षा देता है।
बाइबल संदर्भ: प्रेरितों के काम 17:11
7. बाइबल पढ़ते समय होने वाली कुछ सामान्य गलतियाँ
- केवल वचनों को याद करना: वचन याद करना अच्छा है, लेकिन उनके संदर्भ और अर्थ को समझना भी जरूरी है।
- हर पुस्तक को एक जैसा समझना: इतिहास, कविता, भविष्यवाणी और पत्र पढ़ने का तरीका अलग-अलग हो सकता है।
- एक वचन से पूरा निष्कर्ष निकालना: किसी भी शिक्षा को समझने के लिए उसके पूरे अध्याय और संबंधित संदर्भ को देखना चाहिए।
- अपनी सोच को पहले से सही मान लेना: हमें अपने विचारों को जाँचने के लिए भी बाइबल का अध्ययन करना चाहिए।
- कठिन पुस्तकें छोड़ देना: यदि कोई पुस्तक समझ में नहीं आती, तो उसका परिचय पढ़ें और धीरे-धीरे अध्ययन करें।
8. इस ज्ञान का जीवन में क्या उपयोग है?
बाइबल की पुस्तकों का परिचय जानने से हमारा अध्ययन व्यवस्थित हो जाता है। अब हमें पता होता है कि किसी विशेष विषय को समझने के लिए किस प्रकार की पुस्तक पढ़नी चाहिए।
- यदि आपको यीशु के जीवन और शिक्षाओं को जानना है, तो सुसमाचार पढ़ें।
- यदि आपको आरंभिक कलीसिया का इतिहास जानना है, तो प्रेरितों के काम पढ़ें।
- यदि आपको प्रार्थना और आराधना के शब्द चाहिए, तो भजन संहिता पढ़ें।
- यदि आपको बुद्धिमानी और अच्छे निर्णयों की शिक्षा चाहिए, तो नीतिवचन पढ़ें।
- यदि आपको विश्वास और मसीही जीवन की शिक्षा चाहिए, तो नए नियम के पत्र पढ़ें।
- यदि आपको परमेश्वर की चेतावनियों और आशा के संदेशों को समझना है, तो भविष्यवक्ताओं की पुस्तकें पढ़ें।
याद रखने योग्य वचनप्रेरितों के काम 17:11 हमें सिखाता है कि सुनी हुई बातों को भी शास्त्रों के आधार पर जाँचना चाहिए।
प्रेरितों के काम 17:11
इस पाठ में दी गई 66 पुस्तकों की सूची सामान्य प्रोटेस्टेंट बाइबल के अनुसार है। कैथोलिक और कुछ अन्य मसीही परंपराओं में अतिरिक्त पुस्तकें भी शामिल हैं। अलग-अलग परंपराओं में पुस्तकों की सूची और वर्गीकरण में अंतर हो सकता है।
पुस्तकों के समूह समझने की सुविधा के लिए बनाए गए हैं। कुछ पुस्तकों को अलग परंपराओं में अलग तरीके से वर्गीकृत किया जा सकता है।
आज आपने क्या सीखा?
- बाइबल अलग-अलग प्रकार की पुस्तकों का संग्रह है।
- सामान्य प्रोटेस्टेंट बाइबल में कुल 66 पुस्तकें हैं।
- पुराने नियम में 39 पुस्तकें और पाँच समूह हैं।
- नए नियम में 27 पुस्तकें और पाँच समूह हैं।
- हर पुस्तक का अपना विषय और उद्देश्य है।
- बाइबल को समझने के लिए उसके संदर्भ और मुख्य संदेश पर ध्यान देना चाहिए।
- परमेश्वर के वचन को अपने जीवन में लागू करना भी जरूरी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
बाइबल में कुल कितनी पुस्तकें हैं?
सामान्य प्रोटेस्टेंट बाइबल में कुल 66 पुस्तकें हैं। इनमें 39 पुराने नियम और 27 नए नियम में हैं।
पुराने नियम की पहली पुस्तक कौन-सी है?
पुराने नियम की पहली पुस्तक उत्पत्ति है। इसमें सृष्टि और मनुष्य के आरंभिक इतिहास का वर्णन मिलता है।
नए नियम की पहली पुस्तक कौन-सी है?
नए नियम की पहली पुस्तक मत्ती है। यह यीशु मसीह के जीवन और शिक्षाओं का वर्णन करने वाली चार सुसमाचार पुस्तकों में से एक है।
बाइबल की सबसे छोटी पुस्तक कौन-सी है?
अध्यायों की संख्या के अनुसार नए नियम की 2 यूहन्ना, 3 यूहन्ना और यहूदा में से प्रत्येक में एक अध्याय है। शब्दों की संख्या के आधार पर सबसे छोटी पुस्तक का उत्तर अनुवाद के अनुसार बदल सकता है।
बाइबल पढ़ना कहाँ से शुरू करना चाहिए?
नए पाठक यूहन्ना या मरकुस के सुसमाचार से शुरुआत कर सकते हैं। इसके बाद उत्पत्ति और प्रेरितों के काम पढ़ना उपयोगी हो सकता है।
क्या सभी बाइबल में 66 पुस्तकें होती हैं?
नहीं। 66 पुस्तकों की गिनती सामान्य प्रोटेस्टेंट बाइबल के अनुसार है। कैथोलिक और कुछ अन्य मसीही परंपराओं में पुस्तकों की संख्या अलग होती है।
क्या बाइबल की सभी पुस्तकों को एक ही तरीके से पढ़ना चाहिए?
नहीं। इतिहास, कविता, भविष्यवाणी, सुसमाचार और पत्रों को समझने के लिए उनके प्रकार और संदर्भ पर ध्यान देना चाहिए।
क्या बाइबल की हर पुस्तक यीशु के बारे में है?
मसीही विश्वास के अनुसार पूरी बाइबल की बड़ी कहानी यीशु मसीह और परमेश्वर की उद्धार योजना से जुड़ी है। लेकिन हर पुस्तक का अपना विशेष विषय और ऐतिहासिक संदर्भ भी है।
अपनी समझ जाँचें
क्या आपको बाइबल की पुस्तकों के नाम, उनके समूह और मुख्य विषय समझ में आ गए हैं? अब इस पाठ से संबंधित प्रश्नों के उत्तर देकर अपनी समझ जाँचें।
पाठ 03 का क्विज़ शुरू करें →अध्ययन संदर्भ: 2 तीमुथियुस 3:16–17; लूका 24:27; भजन संहिता 119:105; प्रेरितों के काम 17:11। पुस्तकों के परिचय उनके मुख्य विषयों का संक्षिप्त सार हैं। अलग-अलग हिंदी बाइबल अनुवादों में पुस्तकों के नामों की वर्तनी में थोड़ा अंतर हो सकता है।
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यदि इस सेवकाई के द्वारा आपको परमेश्वर के वचन से आशीष मिली है, तो आपका सहयोग इस संदेश को और लोगों तक पहुँचाने में सहायता कर सकता है।
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