ब्याह के भोज का दृष्टान्त
पद 1–141इस पर यीशु फिर उन से दृष्टान्तों में कहने लगा। 2स्वर्ग का राज्य उस राजा के समान है, जिस ने अपने पुत्र का ब्याह किया। 3और उस ने अपने दासों को भेजा, कि नेवताहारियों को ब्याह के भोज में बुलाएं; परन्तु उन्होंने आना न चाहा। 4फिर उस ने और दासों को यह कहकर भेजा, कि नेवताहारियों से कहो, देखो; मैं भोज तैयार कर चुका हूं, और मेरे बैल और पले हुए पशु मारे गए हैं: और सब कुछ तैयार है; ब्याह के भोज में आओ। 5परन्तु वे बेपरवाई करके चल दिए: कोई अपने खेत को, कोई अपने व्यापार को। 6औरों ने जो बच रहे थे उसके दासों को पकड़कर उन का अनादर किया और मार डाला। 7राजा ने क्रोध किया, और अपनी सेना भेजकर उन हत्यारों को नाश किया, और उन के नगर को फूंक दिया।
8तब उस ने अपने दासों से कहा, ब्याह का भोज तो तैयार है, परन्तु नेवताहारी योग्य न ठहरे। 9इसलिये चौराहों में जाओ, और जितने लोग तुम्हें मिलें, सब को ब्याह के भोज में बुला लाओ। 10सो उन दासों ने सड़कों पर जाकर क्या बुरे, क्या भले, जितने मिले, सब को इकट्ठे किया; और ब्याह का घर जेवनहारों से भर गया। 11जब राजा जेवनहारों के देखने को भीतर आया; तो उस ने वहां एक मनुष्य को देखा, जो ब्याह का वस्त्र नहीं पहिने था। 12उस ने उससे पूछा हे मित्र; तू ब्याह का वस्त्र पहिने बिना यहां क्यों आ गया? उसका मुंह बन्द हो गया। 13तब राजा ने सेवकों से कहा, इस के हाथ पांव बान्धकर उसे बाहर अन्धियारे में डाल दो, वहां रोना, और दांत पीसना होगा। 14क्योंकि बुलाए हुए तो बहुत परन्तु चुने हुए थोड़े हैं॥
क्योंकि बुलाए हुए तो बहुत परन्तु चुने हुए थोड़े हैं॥
दृष्टान्त में भोज तैयार है और निमंत्रण दिया जाता है, लेकिन बुलाए गए लोग उसे हल्के में लेते हैं। यह परमेश्वर के निमंत्रण को केवल सुनने के बजाय उसे स्वीकार करने और उसके अनुरूप जीवन जीने की गंभीरता को सामने रखता है।
कैसर का कर और परमेश्वर का अधिकार
पद 15–2215तब फरीसियों ने जाकर आपस में विचार किया, कि उस को किस प्रकार बातों में फंसाएं। 16सो उन्हों ने अपने चेलों को हेरोदियों के साथ उसके पास यह कहने को भेजा, कि हे गुरू; हम जानते हैं, कि तू सच्चा है; और परमेश्वर का मार्ग सच्चाई से सिखाता है; और किसी की परवा नहीं करता, क्योंकि तू मनुष्यों का मुंह देखकर बातें नहीं करता। 17इस लिये हमें बता तू क्या समझता है? कैसर को कर देना उचित है, कि नहीं। 18यीशु ने उन की दुष्टता जानकर कहा, हे कपटियों; मुझे क्यों परखते हो? 19कर का सिक्का मुझे दिखाओ: तब वे उसके पास एक दीनार ले आए। 20उस ने, उन से पूछा, यह मूर्ति और नाम किस का है?
जो कैसर का है, वह कैसर को; और जो परमेश्वर का है, वह परमेश्वर को दो।
21उन्होंने उस से कहा, कैसर का; तब उस ने, उन से कहा; जो कैसर का है, वह कैसर को; और जो परमेश्वर का है, वह परमेश्वर को दो। 22यह सुनकर उन्होंने अचम्भा किया, और उसे छोड़कर चले गए॥
यीशु ने सांसारिक जिम्मेदारी और परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च उत्तरदायित्व को अलग-अलग स्पष्ट किया। मनुष्य के जीवन में परमेश्वर का अधिकार केवल बाहरी कर्तव्यों तक सीमित नहीं है।
पुनरुत्थान के विषय में सदूकियों का प्रश्न
पद 23–3323उसी दिन सदूकी जो कहते हैं कि मरे हुओं का पुनरुत्थान है ही नहीं उसके पास आए, और उस से पूछा। 24कि हे गुरू; मूसा ने कहा था, कि यदि कोई बिना सन्तान मर जाए, तो उसका भाई उस की पत्नी को ब्याह करके अपने भाई के लिये वंश उत्पन्न करे। 25अब हमारे यहां सात भाई थे; पहिला ब्याह करके मर गया; और सन्तान न होने के कारण अपनी पत्नी को अपने भाई के लिये छोड़ गया। 26इसी प्रकार दूसरे और तीसरे ने भी किया, और सातों तक यही हुआ। 27सब के बाद वह स्त्री भी मर गई। 28सो जी उठने पर, वह उन सातों में से किस की पत्नी होगी? क्योंकि वह सब की पत्नी हो चुकी थी।
29यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, कि तुम पवित्र शास्त्र और परमेश्वर की सामर्थ नहीं जानते; इस कारण भूल में पड़ गए हो। 30क्योंकि जी उठने पर ब्याह शादी न होगी; परन्तु वे स्वर्ग में परमेश्वर के दूतों की नाईं होंगे। 31परन्तु मरे हुओं के जी उठने के विषय में क्या तुम ने यह वचन नहीं पढ़ा जो परमेश्वर ने तुम से कहा। 32कि मैं इब्राहीम का परमेश्वर, और इसहाक का परमेश्वर, और याकूब का परमेश्वर हूं वह तो मरे हुओं का नहीं, परन्तु जीवितों का परमेश्वर है। 33यह सुनकर लोग उसके उपदेश से चकित हुए।
तुम पवित्र शास्त्र और परमेश्वर की सामर्थ नहीं जानते; इस कारण भूल में पड़ गए हो।
यीशु ने सदूकियों की समस्या को केवल उनके प्रश्न के गलत निष्कर्ष तक सीमित नहीं किया। उसने बताया कि वे दो बातों को नहीं समझ रहे थे—पवित्र शास्त्र और परमेश्वर की सामर्थ। पुनरुत्थान को समझने के लिये दोनों आवश्यक हैं।
सबसे बड़ी आज्ञा — परमेश्वर और पड़ोसी से प्रेम
पद 34–4034जब फरीसियों ने सुना, कि उस ने सदूकियों का मुंह बन्द कर दिया; तो वे इकट्ठे हुए। 35और उन में से एक व्यवस्थापक ने परखने के लिये, उस से पूछा। 36हे गुरू; व्यवस्था में कौन सी आज्ञा बड़ी है? 37उस ने उस से कहा, तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। 38बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। 39और उसी के समान यह दूसरी भी है, कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख। 40ये ही दो आज्ञाएं सारी व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं का आधार है॥
तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। … और उसी के समान यह दूसरी भी है, कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।
यीशु ने व्यवस्था की पूरी दिशा को दो महान आज्ञाओं में सामने रखा—परमेश्वर से सम्पूर्ण प्रेम और पड़ोसी से अपने समान प्रेम। यह केवल धार्मिक ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन की दिशा है।
मसीह दाऊद का पुत्र और प्रभु
पद 41–4641जब फरीसी इकट्ठे थे, तो यीशु ने उन से पूछा। 42कि मसीह के विषय में तुम क्या समझते हो? वह किस का सन्तान है? उन्होंने उस से कहा, दाऊद का। 43उस ने उन से पूछा, तो दाऊद आत्मा में होकर उसे प्रभु क्यों कहता है? 44कि प्रभु ने, मेरे प्रभु से कहा; मेरे दाहिने बैठ, जब तक कि मैं तेरे बैरियों को तेरे पांवों के नीचे न कर दूं। 45भला, जब दाऊद उसे प्रभु कहता है, तो वह उसका पुत्र क्योंकर ठहरा? 46उसके उत्तर में कोई भी एक बात न कह सका; परन्तु उस दिन से किसी को फिर उस से कुछ पूछने का हियाव न हुआ॥
भला, जब दाऊद उसे प्रभु कहता है, तो वह उसका पुत्र क्योंकर ठहरा?
अध्याय का अन्त मसीह की पहचान से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रश्न पर होता है। यीशु केवल यह नहीं पूछता कि मसीह किसका पुत्र है, बल्कि दाऊद द्वारा उसे “प्रभु” कहे जाने की ओर ध्यान दिलाता है।
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