शास्त्रियों और फरीसियों के कपट से सावधान
पद 1–121तब यीशु ने भीड़ से और अपने चेलों से कहा। 2शास्त्री और फरीसी मूसा की गद्दी पर बैठे हैं। 3इसलिये वे तुम से जो कुछ कहें वह करना, और मानना; परन्तु उन के से काम मत करना; क्योंकि वे कहते तो हैं पर करते नहीं। 4वे एक ऐसे भारी बोझ को जिन को उठाना कठिन है, बान्धकर उन्हें मनुष्यों के कन्धों पर रखते हैं; परन्तु आप उन्हें अपनी उंगली से भी सरकाना नहीं चाहते। 5वे अपने सब काम लोगों को दिखाने के लिये करते हैं: वे अपने तावीजों को चौड़े करते, और अपने वस्त्रों की कोरें बढ़ाते हैं। 6जेवनारों में मुख्य मुख्य जगहें, और सभा में मुख्य मुख्य आसन। 7और बाजारों में नमस्कार और मनुष्य में रब्बी कहलाना उन्हें भाता है।
8परन्तु, तुम रब्बी न कहलाना; क्योंकि तुम्हारा एक ही गुरू है: और तुम सब भाई हो। 9और पृथ्वी पर किसी को अपना पिता न कहना, क्योंकि तुम्हारा एक ही पिता है, जो स्वर्ग में है। 10और स्वामी भी न कहलाना, क्योंकि तुम्हारा एक ही स्वामी है, अर्थात मसीह। 11जो तुम में बड़ा हो, वह तुम्हारा सेवक बने। 12जो कोई अपने आप को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा: और जो कोई अपने आप को छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा॥
जो तुम में बड़ा हो, वह तुम्हारा सेवक बने। जो कोई अपने आप को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा: और जो कोई अपने आप को छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा॥
यीशु धार्मिक नेतृत्व को प्रतिष्ठा और दिखावे से नहीं, बल्कि नम्रता और सेवा से जोड़ता है। परमेश्वर के राज्य में महानता का मार्ग दूसरों पर अधिकार जमाना नहीं, बल्कि सेवक बनना है।
कपटी शास्त्रियों और फरीसियों पर हाय
पद 13–2213हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिये स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो आप ही उस में प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करने वालों को प्रवेश करने देते हो॥ 14हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है, तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो॥ 15हे अन्धे अगुवों, तुम पर हाय, जो कहते हो कि यदि कोई मन्दिर की शपथ खाए तो कुछ नहीं, परन्तु यदि कोई मन्दिर के सोने की सौगन्ध खाए तो उस से बन्ध जाएगा।
16हे मूर्खों, और अन्धों, कौन बड़ा है, सोना या वह मन्दिर जिस से सोना पवित्र होता है? 17फिर कहते हो कि यदि कोई वेदी की शपथ खाए तो कुछ नहीं, परन्तु जो भेंट उस पर है, यदि कोई उस की शपथ खाए तो बन्ध जाएगा। 18हे अन्धों, कौन बड़ा है, भेंट या वेदी: जिस से भेंट पवित्र होता है? 19इसलिये जो वेदी की शपथ खाता है, वह उस की, और जो कुछ उस पर है, उस की भी शपथ खाता है। 20और जो मन्दिर की शपथ खाता है, वह उस की और उस में रहने वालों की भी शपथ खाता है। 21और जो स्वर्ग की शपथ खाता है, वह परमेश्वर के सिंहासन की और उस पर बैठने वाले की भी शपथ खाता है॥
यीशु बार-बार बाहरी धार्मिक नियमों के पीछे छिपे गलत दृष्टिकोण को उजागर करता है। समस्या केवल शपथ के शब्दों की नहीं थी, बल्कि इस बात की थी कि मनुष्य परमेश्वर के सामने वास्तविक सत्यनिष्ठा के बजाय नियमों की तकनीकी व्याख्या पर भरोसा कर रहा था।
न्याय, दया और विश्वास को न छोड़ना
पद 23–2623हे कपटी शास्त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय; तुम पोदीने और सौंफ और जीरे का दसवां अंश देते हो, परन्तु तुम ने व्यवस्था की गम्भीर बातों को अर्थात न्याय, और दया, और विश्वास को छोड़ दिया है; चाहिये था कि इन्हें भी करते रहते, और उन्हें भी न छोड़ते। 24हे अन्धे अगुवों, तुम मच्छर को तो छान डालते हो, परन्तु ऊंट को निगल जाते हो।
तुम ने व्यवस्था की गम्भीर बातों को अर्थात न्याय, और दया, और विश्वास को छोड़ दिया है; चाहिये था कि इन्हें भी करते रहते, और उन्हें भी न छोड़ते।
25हे कपटी शास्त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय, तुम कटोरे और थाली को ऊपर ऊपर से तो मांजते हो परन्तु वे भीतर अन्धेर असंयम से भरे हुए हैं। 26हे अन्धे फरीसी, पहिले कटोरे और थाली को भीतर से मांज कि वे बाहर से भी स्वच्छ हों॥
यीशु बाहरी धार्मिकता को अस्वीकार नहीं करता, बल्कि उसे न्याय, दया और विश्वास जैसे हृदय से जुड़े विषयों से अलग कर देने को गलत ठहराता है। बाहरी शुद्धता के साथ भीतर की शुद्धता भी आवश्यक है।
बाहर से धर्मी, भीतर से कपटी
पद 27–3227हे कपटी शास्त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय; तुम चूना फिरी हुई कब्रों के समान हो जो ऊपर से तो सुन्दर दिखाई देती हैं, परन्तु भीतर मुर्दों की हड्डियों और सब प्रकार की मलिनता से भरी हैं। 28इसी रीति से तुम भी ऊपर से मनुष्यों को धर्मी दिखाई देते हो, परन्तु भीतर कपट और अधर्म से भरे हुए हो॥ 29हे कपटी शास्त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय; तुम भविष्यद्वक्ताओं की कब्रें संवारते और धर्मियों की कब्रें बनाते हो। 30और कहते हो, कि यदि हम अपने बाप-दादों के दिनों में होते तो भविष्यद्वक्ताओं की हत्या में उन के साझी न होते। 31इस से तो तुम अपने पर आप ही गवाही देते हो, कि तुम भविष्यद्वक्ताओं के घातकों की सन्तान हो। 32सो तुम अपने बाप-दादों के पाप का घड़ा भर दो।
तुम भी ऊपर से मनुष्यों को धर्मी दिखाई देते हो, परन्तु भीतर कपट और अधर्म से भरे हुए हो॥
“कब्र” की उपमा बाहरी सुंदरता और भीतरी वास्तविकता के बीच का तीखा विरोध दिखाती है। यीशु के लिये सच्ची धार्मिकता केवल लोगों को दिखाई देने वाली छवि नहीं, बल्कि भीतर के चरित्र की भी बात है।
आने वाले न्याय की गंभीर चेतावनी
पद 33–3633हे सांपो, हे करैतों के बच्चों, तुम नरक के दण्ड से क्योंकर बचोगे? 34इसलिये देखो, मैं तुम्हारे पास भविष्यद्वक्ताओं और बुद्धिमानों और शास्त्रियों को भेजता हूं; और तुम उन में से कितनों को मार डालोगे, और क्रूस पर चढ़ाओगे; और कितनों को अपनी सभाओं में कोड़े मारोगे, और एक नगर से दूसरे नगर में खदेड़ते फिरोगे। 35जिस से धर्मी हाबिल से लेकर बिरिक्याह के पुत्र जकरयाह तक, जिसे तुम ने मन्दिर और वेदी के बीच में मार डाला था, जितने धर्मियों का लोहू पृथ्वी पर बहाया गया है, वह सब तुम्हारे सिर पर पड़ेगा। 36मैं तुम से सच कहता हूं, ये सब बातें इस समय के लोगों पर आ पड़ेंगी॥
हे सांपो, हे करैतों के बच्चों, तुम नरक के दण्ड से क्योंकर बचोगे?
इस भाग में यीशु की भाषा अत्यन्त गंभीर हो जाती है। यह केवल व्यक्तिगत आलोचना नहीं, बल्कि लगातार सत्य का विरोध करने और परमेश्वर के भेजे हुए दूतों को अस्वीकार करने के परिणाम की चेतावनी है।
यरूशलेम के लिये यीशु का विलाप
पद 37–3937हे यरूशलेम, हे यरूशलेम; तू जो भविष्यद्वक्ताओं को मार डालता है, और जो तेरे पास भेजे गए, उन्हें पत्थरवाह करता है, कितनी ही बार मैं ने चाहा कि जैसे मुर्गी अपने बच्चों को अपने पंखों के नीचे इकट्ठे करती है, वैसे ही मैं भी तेरे बालकों को इकट्ठे कर लूं, परन्तु तुम ने न चाहा। 38देखो, तुम्हारा घर तुम्हारे लिये उजाड़ छोड़ा जाता है। 39क्योंकि मैं तुम से कहता हूं, कि अब से जब तक तुम न कहोगे, कि धन्य है वह, जो प्रभु के नाम से आता है, तब तक तुम मुझे फिर कभी न देखोगे॥
कितनी ही बार मैं ने चाहा कि जैसे मुर्गी अपने बच्चों को अपने पंखों के नीचे इकट्ठे करती है, वैसे ही मैं भी तेरे बालकों को इकट्ठे कर लूं, परन्तु तुम ने न चाहा।
अध्याय का अन्त कठोर चेतावनियों के बाद यीशु के गहरे दुःख को प्रकट करता है। न्याय की चेतावनी के साथ-साथ यहाँ परमेश्वर की ओर से सुरक्षा और अपने लोगों को अपने पास इकट्ठा करने की इच्छा भी दिखाई देती है—लेकिन प्रतिक्रिया के लिये मनुष्य की इच्छा और उत्तरदायित्व सामने रहता है।
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