मैंने अपने मन में यही ठान लिया था कि फिर तुम्हारे पास उदास होकर न आऊं। 2क्योंकि यदि मैं तुम्हें उदास करूं, तो मुझे आनन्द देने वाला कौन होगा, केवल वही जिस को मैं ने उदास किया? 3और मैं ने यही बात तुम्हें इसलिये लिखी, कि कहीं ऐसा न हो, कि मेरे आने पर जिन से आनन्द मिलना चाहिए, मैं उन से उदास होऊं; क्योंकि मुझे तुम सब पर इस बात का भरोसा है, कि जो मेरा आनन्द है, वही तुम सब का भी है। 4बड़े क्लेश, और मन के कष्ट से, मैं ने बहुत से आंसु बहा बहाकर तुम्हें लिखा, इसलिये नहीं, कि तुम उदास हो, परन्तु इसलिये कि तुम उस बड़े प्रेम को जान लो, जो मुझे तुम से है॥
संदर्भ
इन पदों में पौलुस की कठोरता के पीछे छिपे प्रेम को देखा जा सकता है। उसकी चिंता केवल अनुशासन की नहीं, बल्कि विश्वासियों के साथ संबंध और उनके आनन्द की भी है।
और यदि किसी ने उदास किया है, तो मुझे ही नहीं वरन (कि उसके साथ बहुत कड़ाई न करूं) कुछ कुछ तुम सब को भी उदास किया है। 6ऐसे जन के लिये यह दण्ड जो भाइयों में से बहुतों ने दिया, बहुत है। 7इसलिये इस से यह भला है कि उसका अपराध क्षमा करो; और शान्ति दो, न हो कि ऐसा मनुष्य उदासी में डूब जाए। 8इस कारण मैं तुम से बिनती करता हूं, कि उस को अपने प्रेम का प्रमाण दो। 9क्योंकि मैं ने इसलिये भी लिखा था, कि तुम्हें परख लूं, कि सब बातों के मानने के लिये तैयार हो, कि नहीं। 10जिस का तुम कुछ क्षमा करते हो उस मैं भी क्षमा करता हूं, क्योंकि मैं ने भी जो कुछ क्षमा किया है, यदि किया हो, तो तुम्हारे कारण मसीह की जगह में होकर क्षमा किया है। 11कि शैतान का हम पर दांव न चले, क्योंकि हम उस की युक्तियों से अनजान नहीं।
मुख्य शिक्षा
अनुशासन का उद्देश्य केवल दण्ड देना नहीं, बल्कि सही समय पर क्षमा, शान्ति और प्रेम के द्वारा व्यक्ति को फिर से सम्भालना भी है।
और जब मैं मसीह का सुसमाचार, सुनाने को त्रोआस में आया, और प्रभु ने मेरे लिये एक द्वार खोल दिया। 13तो मेरे मन में चैन न मिला, इसलिये कि मैं ने अपने भाई तितुस को नहीं पाया; सो उन से विदा होकर मैं मकिदुनिया को चला गया।
परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, जो मसीह में सदा हम को जय के उत्सव में लिये फिरता है, और अपने ज्ञान का सुगन्ध हमारे द्वारा हर जगह फैलाता है। 15क्योंकि हम परमेश्वर के निकट उद्धार पाने वालों, और नाश होने वालों, दोनों के लिये मसीह के सुगन्ध हैं। 16कितनों के लिये तो मरने के निमित्त मृत्यु की गन्ध, और कितनों के लिये जीवन के निमित्त जीवन की सुगन्ध, और इन बातों के योग्य कौन है? 17क्योंकि हम उन बहुतों के समान नहीं, जो परमेश्वर के वचन में मिलावट करते हैं; परन्तु मन की सच्चाई से, और परमेश्वर की ओर से परमेश्वर को उपस्थित जानकर मसीह में बोलते हैं॥
मुख्य शिक्षा
मसीह में सेवा केवल शब्दों का काम नहीं है; विश्वासी का जीवन और उसकी सच्चाई भी परमेश्वर के ज्ञान की सुगन्ध को लोगों तक पहुँचाती है।
अध्याय का सार
अध्याय 2 में पौलुस के दुःख और प्रेम, क्षमा की आवश्यकता, तितुस के प्रति उसकी चिंता और मसीह में सेवकाई की सच्चाई एक साथ दिखाई देती है। अन्त में उसका ध्यान इस बात पर जाता है कि परमेश्वर के वचन को मिलावट के बिना सच्चाई से बोलना चाहिए।
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