अभिवादन और परमेश्वर की शान्ति
पद 1–71पौलुस की ओर से जो परमेश्वर की इच्छा से मसीह यीशु का प्रेरित है, और भाई तीमुथियुस की ओर से परमेश्वर की उस कलीसिया के नाम जो कुरिन्थुस में है; और सारे अखया के सब पवित्र लोगों के नाम॥ 2हमारे पिता परमेश्वर और प्रभु यीशु मसीह की ओर से तुम्हें अनुग्रह और शान्ति मिलती रहे॥
3हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर, और पिता का धन्यवाद हो, जो दया का पिता, और सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर है। 4वह हमारे सब क्लेशों में शान्ति देता है; ताकि हम उस शान्ति के कारण जो परमेश्वर हमें देता है, उन्हें भी शान्ति दे सकें, जो किसी प्रकार के क्लेश में हों। 5क्योंकि जैसे मसीह के दुख हम को अधिक होते हैं, वैसे ही हमारी शान्ति भी मसीह के द्वारा अधिक होती है।
6यदि हम क्लेश पाते हैं, तो यह तुम्हारी शान्ति और उद्धार के लिये है और यदि शान्ति पाते हैं, तो यह तुम्हारी शान्ति के लिये है; जिस के प्रभाव से तुम धीरज के साथ उन क्लेशों को सह लेते हो, जिन्हें हम भी सहते हैं। 7और हमारी आशा तुम्हारे विषय में दृढ़ है; क्योंकि हम जानते हैं, कि तुम जैसे दुखों के वैसे ही शान्ति के भी सहभागी हो।
पौलुस परमेश्वर को दया और शान्ति का परमेश्वर बताता है। यहाँ एक महत्वपूर्ण आत्मिक सिद्धान्त सामने आता है—परमेश्वर हमें हमारे क्लेशों में शान्ति देता है, ताकि हम भी उसी शान्ति के द्वारा क्लेश में पड़े लोगों की सहायता कर सकें।
आसिया का क्लेश और परमेश्वर का छुटकारा
पद 8–118हे भाइयों, हम नहीं चाहते कि तुम हमारे उस क्लेश से अनजान रहो, जो आसिया में हम पर पड़ा, कि ऐसे भारी बोझ से दब गए थे, जो हमारी सामर्थ से बाहर था, यहां तक कि हम जीवन से भी हाथ धो बैठे थे। 9वरन हम ने अपने मन में समझ लिया था, कि हम पर मृत्यु की आज्ञा हो चुकी है कि हम अपना भरोसा न रखें, वरन परमेश्वर का जो मरे हुओं को जिलाता है।
10उसी ने हमें ऐसी बड़ी मृत्यु से बचाया, और बचाएगा; और उस से हमारी यह आशा है, कि वह आगे को भी बचाता रहेगा। 11और तुम भी मिलकर प्रार्थना के द्वारा हमारी सहायता करोगे, कि जो वरदान बहुतों के द्वारा हमें मिला, उसके कारण बहुत लोग हमारी ओर से धन्यवाद करें॥
पौलुस अपने अत्यन्त कठिन अनुभव को छिपाता नहीं है। वह बताता है कि ऐसी स्थिति आई जिसमें मानवीय सामर्थ पर भरोसा करना असम्भव था। उसी परिस्थिति में उसका भरोसा उस परमेश्वर पर गया जो मरे हुओं को जिलाता है। साथ ही, वह विश्वासियों की प्रार्थना को भी सहायता का महत्वपूर्ण माध्यम मानता है।
पौलुस का चरित्र और विश्वासियों के साथ उसका भरोसा
पद 12–1412क्योंकि हम अपने विवेक की इस गवाही पर घमण्ड करते हैं, कि जगत में और विशेष करके तुम्हारे बीच हमारा चरित्र परमेश्वर के योग्य ऐसी पवित्रता और सच्चाई सहित था, जो शारीरिक ज्ञान से नहीं, परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह के साथ था। 13हम तुम्हें और कुछ नहीं लिखते, केवल वह जो तुम पढ़ते या मानते भी हो, और मुझे आशा है, कि अन्त तक भी मानते रहोगे।
14जैसा तुम में से कितनों ने मान लिया है, कि हम तुम्हारे घमण्ड का कारण है; वैसे तुम भी प्रभु यीशु के दिन हमारे लिये घमण्ड का कारण ठहरोगे॥
पौलुस अपने जीवन और सेवकाई का आधार शारीरिक बुद्धि नहीं, बल्कि परमेश्वर का अनुग्रह और पवित्रता बताता है। यह भाग सेवकाई में बाहरी प्रभाव से अधिक चरित्र और परमेश्वर के अनुग्रह की आवश्यकता पर ध्यान दिलाता है।
पौलुस की यात्रा की योजना
पद 15–1715और इस भरोसे से मैं चाहता था कि पहिले तुम्हारे पास आऊं; कि तुम्हें एक और दान मिले। 16और तुम्हारे पास से होकर मकिदुनिया को जाऊं और फिर मकिदूनिया से तुम्हारे पास आऊँ, और तुम मुझे यहूदिया की ओर कुछ दूर तक पहुंचाओ। 17इसलिये मैं ने जो यह इच्छा की थी तो क्या मैं ने चंचलता दिखाई? या जो करना चाहता हूं क्या शरीर के अनुसार करना चाहता हूं, कि मैं बात में हां, हां भी करूं; और नहीं, नहीं भी करूं?
यहाँ पौलुस अपनी यात्रा की योजना और उसके विषय में उठे प्रश्नों का उत्तर दे रहा है। अगले भाग में वह अपने निर्णय को परमेश्वर की विश्वासयोग्यता के संदर्भ में स्पष्ट करता है।
परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं में हाँ और आमीन
पद 18–2218परमेश्वर सच्चा गवाह है, कि हमारे उस वचन में जो तुम से कहा हां और नहीं दोनों पाई नहीं जातीं। 19क्योंकि परमेश्वर का पुत्र यीशु मसीह जिसका हमारे द्वारा अर्थात मेरे और सिलवानुस और तीमुथियुस के द्वारा तुम्हारे बीच में प्रचार हुआ; उस में हां और नहीं दोनों न थीं; परन्तु, उस में हां ही हां हुई।
20क्योंकि परमेश्वर की जितनी प्रतिज्ञाएं हैं, वे सब उसी में हां के साथ हैं: इसलिये उसके द्वारा आमीन भी हुई, कि हमारे द्वारा परमेश्वर की महिमा हो। 21और जो हमें तुम्हारे साथ मसीह में दृढ़ करता है, और जिस ने हमें अभिषेक किया वही परमेश्वर है।
22जिस ने हम पर छाप भी कर दी है और बयाने में आत्मा को हमारे मनों में दिया॥
इस भाग का केन्द्र परमेश्वर की विश्वासयोग्यता है। मनुष्य की योजनाओं और परिस्थितियों में परिवर्तन हो सकता है, लेकिन पौलुस परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को मसीह में “हाँ” के रूप में प्रस्तुत करता है। इसी कारण परमेश्वर की महिमा के लिये “आमीन” कहा जाता है।
पौलुस ने कुरिन्थुस क्यों नहीं आया
पद 23–2423मैं परमेश्वर को गवाह करता हूं, कि मैं अब तक कुरिन्थुस में इसलिये नहीं आया, कि मुझे तुम पर तरस आता था। 24यह नहीं, कि हम विश्वास के विषय में तुम पर प्रभुता जताना चाहते हैं; परन्तु तुम्हारे आनन्द में सहायक हैं क्योंकि तुम विश्वास ही से स्थिर रहते हो।
पौलुस विश्वासियों पर प्रभुता जताने के बजाय उनके आनन्द में सहायक बनने की बात करता है। यहाँ सेवकाई को नियंत्रण के रूप में नहीं, बल्कि विश्वास में स्थिर रहने में सहायता करने के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
परमेश्वर के वचन को और लोगों तक पहुँचाएँ
यदि इस सेवकाई के द्वारा आपको परमेश्वर के वचन से आशीष मिली है, तो आपका सहयोग इस संदेश को और लोगों तक पहुँचाने में सहायता कर सकता है।
सेवकाई में सहयोग करें

किसी भी UPI ऐप से QR स्कैन करके सहयोग करें।
0 टिप्पणियाँ