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उत्पति अध्याय 11 — बाइबल पाठ, व्याख्या और मुख्य शिक्षाएँ

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1

एक भाषा और बाबेल का गुम्मट

पद 1–4

1सारी पृथ्वी पर एक ही भाषा, और एक ही बोली थी। 2उस समय लोग पूर्व की और चलते चलते शिनार देश में एक मैदान पाकर उस में बस गए। 3तब वे आपस में कहने लगे, कि आओ; हम ईंटें बना बना के भली भाँति आग में पकाएं, और उन्होंने पत्थर के स्थान में ईंट से, और चूने के स्थान में मिट्टी के गारे से काम लिया। 4फिर उन्होंने कहा, आओ, हम एक नगर और एक गुम्मट बना लें, जिसकी चोटी आकाश से बातें करे, इस प्रकार से हम अपना नाम करें ऐसा न हो कि हम को सारी पृथ्वी पर फैलना पड़े।

मुख्य विचार

मनुष्य एकता और सामूहिक सामर्थ्य के साथ एक ऐसा निर्माण करना चाहता था जिसका उद्देश्य केवल नगर बनाना नहीं, बल्कि अपने लिये नाम करना और पृथ्वी पर फैलने से बचना था।

2

यहोवा ने उनकी भाषा में गड़बड़ी डाली

पद 5–9

5जब लोग नगर और गुम्मट बनाने लगे; तब इन्हें देखने के लिये यहोवा उतर आया। 6और यहोवा ने कहा, मैं क्या देखता हूं, कि सब एक ही दल के हैं और भाषा भी उन सब की एक ही है, और उन्होंने ऐसा ही काम भी आरम्भ किया; और अब जितना वे करने का यत्न करेंगे, उस में से कुछ उनके लिये अनहोना न होगा। 7इसलिये आओ, हम उतर के उनकी भाषा में बड़ी गड़बड़ी डालें, कि वे एक दूसरे की बोली को न समझ सकें। 8इस प्रकार यहोवा ने उन को, वहां से सारी पृथ्वी के ऊपर फैला दिया; और उन्होंने उस नगर का बनाना छोड़ दिया। 9इस कारण उस नगर को नाम बाबुल पड़ा; क्योंकि सारी पृथ्वी की भाषा में जो गड़बड़ी है, सो यहोवा ने वहीं डाली, और वहीं से यहोवा ने मनुष्यों को सारी पृथ्वी के ऊपर फैला दिया॥

बाबेल का अर्थ

इस घटना में मनुष्य की एकता और उसकी योजनाओं के सामने परमेश्वर का हस्तक्षेप दिखाई देता है। भाषा के अलग हो जाने के बाद वे उस निर्माण को पूरा नहीं कर सके और अलग-अलग स्थानों में फैल गए।

3

शेम से एबेर तक की वंशावली

पद 10–17

10शेम की वंशावली यह है। जल प्रलय के दो वर्ष पश्चात जब शेम एक सौ वर्ष का हुआ, तब उसने अर्पक्षद को जन्म दिया। 11और अर्पक्षद ने जन्म के पश्चात शेम पांच सौ वर्ष जीवित रहा; और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई॥ 12जब अर्पक्षद पैंतीस वर्ष का हुआ, तब उसने शेलह को जन्म दिया। 13और शेलह के जन्म के पश्चात अर्पक्षद चार सौ तीन वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुईं॥ 14जब शेलह तीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा एबेर को जन्म हुआ। 15और एबेर के जन्म के पश्चात शेलह चार सौ तीन वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुईं॥ 16जब एबेर चौंतीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा पेलेग का जन्म हुआ। 17और पेलेग के जन्म के पश्चात एबेर चार सौ तीस वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुईं॥

4

पेलेग से तेरह तक की वंशावली

पद 18–26

18जब पेलेग तीस वर्ष को हुआ, तब उसके द्वारा रू का जन्म हुआ। 19और रू के जन्म के पश्चात पेलेग दो सौ नौ वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई॥ 20जब रू बत्तीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा सरूग का जन्म हुआ। 21और सरूग के जन्म के पश्चात रू दो सौ सात वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुईं॥ 22जब सरूग तीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा नाहोर का जन्म हुआ। 23और नाहोर के जन्म के पश्चात सरूग दो सौ वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुईं॥ 24जब नाहोर उनतीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा तेरह का जन्म हुआ। 25और तेरह के जन्म के पश्चात नाहोर एक सौ उन्नीस वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुईं॥ 26जब तेरह सत्तर वर्ष का हुआ, तब तक उसके द्वारा अब्राम, और नाहोर, और हारान उत्पन्न हुए॥

वंशावली का महत्वपूर्ण मोड़

इस वंशावली का प्रवाह तेरह तक पहुँचता है, जिसके तीन पुत्र अब्राम, नाहोर और हारान हैं। आगे की कथा में इन्हीं परिवारों के माध्यम से उत्पत्ति का वर्णन एक नये प्रमुख चरण में प्रवेश करता है।

5

तेरह का परिवार और ऊर से प्रस्थान

पद 27–31

27तेरह की यह वंशावली है। तेरह ने अब्राम, और नाहोर, और हारान को जन्म दिया; और हारान ने लूत को जन्म दिया। 28और हारान अपने पिता के साम्हने ही, कस्दियों के ऊर नाम नगर में, जो उसकी जन्म भूमि थी, मर गया। 29अब्राम और नाहोर ने स्त्रियां ब्याह लीं: अब्राम की पत्नी का नाम तो सारै, और नाहोर की पत्नी का नाम मिल्का था, यह उस हारान की बेटी थी, जो मिल्का और यिस्का दोनों का पिता था। 30सारै तो बांझ थी; उसके संतान न हुई। 31और तेरह अपना पुत्र अब्राम, और अपना पोता लूत जो हारान का पुत्र था, और अपनी बहू सारै, जो उसके पुत्र अब्राम की पत्नी थी इन सभों को ले कर कस्दियों के ऊर नगर से निकल कनान देश जाने को चला; पर हारान नाम देश में पहुंचकर वहीं रहने लगा।

आगे की कथा की भूमिका

तेरह का परिवार ऊर से निकलकर कनान की ओर चल पड़ता है, लेकिन यात्रा हारान में रुक जाती है। इसी परिवार के भीतर अब्राम, सारै और लूत की कथा आगे विकसित होती है।

6

तेरह की मृत्यु

पद 32

32जब तेरह दो सौ पांच वर्ष का हुआ, तब वह हारान देश में मर गया॥

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