जल घटने लगा और जहाज अरारात पर टिक गया
पद 1–51और परमेश्वर ने नूह की, और जितने बनैले पशु, और घरेलू पशु उसके संग जहाज में थे, उन सभों की सुधि ली: और परमेश्वर ने पृथ्वी पर पवन बहाई, और जल घटने लगा। 2और गहिरे समुद्र के सोते और आकाश के झरोखे बंद हो गए; और उससे जो वर्षा होती थी सो भी थम गई। 3और एक सौ पचास दिन के पश्चात जल पृथ्वी पर से लगातार घटने लगा। 4सातवें महीने के सत्तरहवें दिन को, जहाज अरारात नाम पहाड़ पर टिक गया। 5और जल दसवें महीने तक घटता चला गया, और दसवें महीने के पहिले दिन को, पहाड़ों की चोटियाँ दिखलाई दीं।
जलप्रलय के बीच परमेश्वर ने नूह और उसके साथ जहाज में सुरक्षित जीवों को नहीं भुलाया। जल का धीरे-धीरे घटना दिखाता है कि उद्धार के बाद भी नूह को परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा करनी थी।
कौआ और कबूतरी द्वारा भूमि के सूखने का पता
पद 6–126फिर ऐसा हुआ कि चालीस दिन के पश्चात नूह ने अपने बनाए हुए जहाज की खिड़की को खोल कर, एक कौआ उड़ा दिया: 7वह जब तक जल पृथ्वी पर से सूख न गया, तब तक कौआ इधर उधर फिरता रहा। 8फिर उसने अपने पास से एक कबूतरी को उड़ा दिया, कि देखें कि जल भूमि से घट गया कि नहीं। 9उस कबूतरी को अपने पैर के तले टेकने के लिये कोई आधार न मिला, सो वह उसके पास जहाज में लौट आई: क्योंकि सारी पृथ्वी के ऊपर जल ही जल छाया था तब उसने हाथ बढ़ा कर उसे अपने पास जहाज में ले लिया। 10तब और सात दिन तक ठहर कर, उसने उसी कबूतरी को जहाज में से फिर उड़ा दिया। 11और कबूतरी सांझ के समय उसके पास आ गई, तो क्या देखा कि उसकी चोंच में जलपाई का एक नया पत्ता है; इस से नूह ने जान लिया, कि जल पृथ्वी पर घट गया है। 12फिर उसने सात दिन और ठहरकर उसी कबूतरी को उड़ा दिया; और वह उसके पास फिर कभी लौट कर न आई।
नूह ने परिस्थितियों को समझने के लिये धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की और संकेतों को देखकर आगे बढ़ा। यह भाग हमें जल्दबाजी के बजाय परमेश्वर के समय को पहचानने की शिक्षा देता है।
पृथ्वी सूख गई और नूह ने जहाज की छत खोली
पद 13–1413फिर ऐसा हुआ कि छः सौ एक वर्ष के पहिले महीने के पहिले दिन जल पृथ्वी पर से सूख गया। तब नूह ने जहाज की छत खोल कर क्या देखा कि धरती सूख गई है। 14और दूसरे महीने के सताईसवें दिन को पृथ्वी पूरी रीति से सूख गई॥
परमेश्वर की आज्ञा से नूह जहाज से बाहर निकला
पद 15–1915तब परमेश्वर ने, नूह से कहा, 16तू अपने पुत्रों, पत्नी, और बहुओं समेत जहाज में से निकल आ। 17क्या पक्षी, क्या पशु, क्या सब भांति के रेंगने वाले जन्तु जो पृथ्वी पर रेंगते हैं, जितने शरीरधारी जीवजन्तु तेरे संग हैं, उस सब को अपने साथ निकाल ले आ, कि पृथ्वी पर उन से बहुत बच्चे उत्पन्न हों; और वे फूलें-फलें, और पृथ्वी पर फैल जाएं। 18तब नूह, और उसके पुत्र, और पत्नी, और बहुएं, निकल आईं: 19और सब चौपाए, रेंगने वाले जन्तु, और पक्षी, और जितने जीवजन्तु पृथ्वी पर चलते फिरते हैं, सो सब जाति जाति करके जहाज में से निकल आए।
नूह केवल अपने अनुमान से जहाज से बाहर नहीं निकला। उसने परमेश्वर की आज्ञा की प्रतीक्षा की और उसी के कहने पर बाहर आया। अध्याय में आज्ञाकारिता और प्रतीक्षा दोनों साथ दिखाई देती हैं।
नूह की वेदी और पृथ्वी के लिये परमेश्वर की प्रतिज्ञा
पद 20–2220तब नूह ने यहोवा के लिये एक वेदी बनाई; और सब शुद्ध पशुओं, और सब शुद्ध पक्षियों में से, कुछ कुछ ले कर वेदी पर होमबलि चढ़ाया। 21इस पर यहोवा ने सुखदायक सुगन्ध पाकर सोचा, कि मनुष्य के कारण मैं फिर कभी भूमि को शाप न दूंगा, यद्यपि मनुष्य के मन में बचपन से जो कुछ उत्पन्न होता है सो बुरा ही होता है; तौभी जैसा मैं ने सब जीवों को अब मारा है, वैसा उन को फिर कभी न मारूंगा। 22अब से जब तक पृथ्वी बनी रहेगी, तब तक बोने और काटने के समय, ठण्ड और तपन, धूपकाल और शीतकाल, दिन और रात, निरन्तर होते चले जाएंगे॥
जलप्रलय के बाद जीवन फिर से व्यवस्थित होता है। नूह की आराधना के बाद पृथ्वी पर जीवन के नियमित चक्र के बने रहने की घोषणा इस अध्याय को एक नये आरम्भ की ओर ले जाती है।
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