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उत्पत्ति अध्याय 50 — बाइबल पाठ, व्याख्या और मुख्य शिक्षाएँ

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1

याकूब की मृत्यु और मिस्र का शोक

पद 1–6

1तब यूसुफ अपने पिता के मुंह पर गिरकर रोया और उसे चूमा। 2और यूसुफ ने उन वैद्यों को, जो उसके सेवक थे, आज्ञा दी, कि मेरे पिता की लोथ में सुगन्धद्रव्य भरो; तब वैद्यों ने इस्राएल की लोथ में सुगन्धद्रव्य भर दिए। 3और उसके चालीस दिन पूरे हुए। क्योंकि जिनकी लोथ में सुगन्धद्रव्य भरे जाते हैं, उन को इतने ही दिन पूरे लगते हैं: और मिस्री लोग उसके लिये सत्तर दिन तक विलाप करते रहे।

4जब उसके विलाप के दिन बीत गए, तब यूसुफ फिरौन के घराने के लोगों से कहने लगा, यदि तुम्हारी अनुग्रह की दृष्टि मुझ पर हो तो मेरी यह बिनती फिरौन को सुनाओ, 5कि मेरे पिता ने यह कहकर, कि देख मैं मरने पर हूं, मुझे यह शपथ खिलाई, कि जो कबर तू ने अपने लिये कनान देश में खुदवाई है उसी में मैं तुझे मिट्टी दूंगा इसलिये अब मुझे वहां जा कर अपने पिता को मिट्टी देने की आज्ञा दे, तत्पश्चात् मैं लौट आऊंगा। 6तब फिरौन ने कहा, जा कर अपने पिता की खिलाई हुई शपथ के अनुसार उन को मिट्टी दे।

2

याकूब का कनान में दफन किया जाना

पद 7–14

7सो यूसुफ अपने पिता को मिट्टी देने के लिये चला, और फिरौन के सब कर्मचारी, अर्थात उसके भवन के पुरनिये, और मिस्र देश के सब पुरनिये उसके संग चले। 8और यूसुफ के घर के सब लोग, और उसके भाई, और उसके पिता के घर के सब लोग भी संग गए; पर वे अपने बालबच्चों, और भेड़-बकरियों, और गाय-बैलों को गोशेन देश में छोड़ गए। 9और उसके संग रथ और सवार गए, सो भीड़ बहुत भारी हो गई।

10जब वे आताद के खलिहान तक, जो यरदन नदी के पार है पहुंचे, तब वहां अत्यन्त भारी विलाप किया, और यूसुफ ने अपने पिता के सात दिन का विलाप कराया। 11आताद के खलिहान में के विलाप को देखकर उस देश के निवासी कनानियों ने कहा, यह तो मिस्रियों का कोई भारी विलाप होगा, इसी कारण उस स्थान का नाम आबेलमिस्रैम पड़ा, और वह यरदन के पार है। 12और इस्राएल के पुत्रों ने उससे वही काम किया जिसकी उसने उन को आज्ञा दी थी: 13अर्थात उन्होंने उसको कनान देश में ले जाकर मकपेला की उस भूमिवाली गुफा में, जो मम्रे के साम्हने हैं, मिट्टी दी; जिस को इब्राहीम ने हित्ती एप्रोन के हाथ से इस निमित्त मोल लिया था, कि वह कबरिस्तान के लिये उसकी निज भूमि हो। 14अपने पिता को मिट्टी देकर यूसुफ अपने भाइयों और उन सब समेत, जो उसके पिता को मिट्टी देने के लिये उसके संग गए थे, मिस्र में लौट आया।

3

यूसुफ द्वारा भाइयों को क्षमा और सांत्वना

पद 15–21

15जब यूसुफ के भाइयों ने देखा कि हमारा पिता मर गया है, तब कहने लगे, कदाचित यूसुफ अब हमारे पीछे पड़े, और जितनी बुराई हम ने उससे की थी सब का पूरा पलटा हम से ले। 16इसलिये उन्होंने यूसुफ के पास यह कहला भेजा, कि तेरे पिता ने मरने से पहिले हमें यह आज्ञा दी थी, 17कि तुम लोग यूसुफ से इस प्रकार कहना, कि हम बिनती करते हैं, कि तू अपने भाइयों के अपराध और पाप को क्षमा कर; हम ने तुझ से बुराई तो की थी, पर अब अपने पिता के परमेश्वर के दासों का अपराध क्षमा कर। उनकी ये बातें सुनकर यूसुफ रो पड़ा।

18और उसके भाई आप भी जाकर उसके साम्हने गिर पड़े, और कहा, देख, हम तेरे दास हैं। 19यूसुफ ने उन से कहा, मत डरो, क्या मैं परमेश्वर की जगह पर हूं? 20यद्यपि तुम लोगों ने मेरे लिये बुराई का विचार किया था; परन्तु परमेश्वर ने उसी बात में भलाई का विचार किया, जिस से वह ऐसा करे, जैसा आज के दिन प्रगट है, कि बहुत से लोगों के प्राण बचे हैं। 21सो अब मत डरो: मैं तुम्हारा और तुम्हारे बाल-बच्चों का पालन पोषण करता रहूंगा; इस प्रकार उसने उन को समझा बुझाकर शान्ति दी।

4

यूसुफ का अन्तिम जीवन और परमेश्वर की प्रतिज्ञा

पद 22–25

22और यूसुफ अपने पिता के घराने समेत मिस्र में रहता रहा, और यूसुफ एक सौ दस वर्ष जीवित रहा। 23और यूसुफ एप्रैम के परपोतों तक देखने पाया: और मनश्शे के पोते, जो माकीर के पुत्र थे, वे उत्पन्न हो कर यूसुफ से गोद में लिए गए। 24और यूसुफ ने अपने भाइयों से कहा मैं तो मरने पर हूं; परन्तु परमेश्वर निश्चय तुम्हारी सुधि लेगा, और तुम्हें इस देश से निकाल कर उस देश में पहुंचा देगा, जिसके देने की उसने इब्राहीम, इसहाक, और याकूब से शपथ खाई थी। 25फिर यूसुफ ने इस्राएलियों से यह कहकर, कि परमेश्वर निश्चय तुम्हारी सुधि लेगा, उन को इस विषय की शपथ खिलाई, कि हम तेरी हड्डियों को वहां से उस देश में ले जाएंगे।

5

यूसुफ की मृत्यु और उसकी हड्डियों की प्रतिज्ञा

पद 26

26निदान यूसुफ एक सौ दस वर्ष का हो कर मर गया: और उसकी लोथ में सुगन्धद्रव्य भरे गए, और वह लोथ मिस्र में एक सन्दूक में रखी गई।

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