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2-कुरिन्थियों अध्याय 6 — बाइबल पाठ, व्याख्या और मुख्य शिक्षाएँ

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01

परमेश्वर के अनुग्रह को व्यर्थ न रहने देना

पद 1–3
और हम जो उसके सहकर्मी हैं यह भी समझाते हैं, कि परमेश्वर का अनुग्रह जो तुम पर हुआ, व्यर्थ न रहने दो। 2 क्योंकि वह तो कहता है, कि अपनी प्रसन्नता के समय मैं ने तेरी सुन ली, और उद्धार के दिन मैं ने तेरी सहायता की: देखो, अभी वह प्रसन्नता का समय है; देखो, अभी उद्धार का दिन है। 3 हम किसी बात में ठोकर खाने का कोई भी अवसर नहीं देते, कि हमारी सेवा पर कोई दोष न आए।
मुख्य विचार

परमेश्वर का अनुग्रह केवल प्राप्त करने की वस्तु नहीं, बल्कि ऐसा वरदान है जिसे जीवन और सेवा में व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए।

02

सेवकाई में धैर्य और परमेश्वर की सामर्थ

पद 4–10
4 परन्तु हर बात से परमेश्वर के सेवकों की नाईं अपने सद्गुणों को प्रगट करते हैं, बड़े धैर्य से, क्लेशों से, दिरद्रता से, संकटों से। 5 कोड़े खाने से, कैद होने से, हुल्लड़ों से, परिश्रम से, जागते रहने से, उपवास करने से। 6 पवित्रता से, ज्ञान से, धीरज से, कृपालुता से, पवित्र आत्मा से। 7 सच्चे प्रेम से, सत्य के वचन से, परमेश्वर की सामर्थ से; धार्मिकता के हथियारों से जो दाहिने, बाएं हैं।
8 आदर और निरादर से, दुरनाम और सुनाम से, यद्यपि भरमाने वालों के जैसे मालूम होते हैं तौभी सच्चे हैं। 9 अनजानों के सदृश्य हैं; तौभी प्रसिद्ध हैं; मरते हुओं के जैसे हैं और देखो जीवित हैं; मार खाने वालों के सदृश हैं परन्तु प्राण से मारे नहीं जाते। 10 शोक करने वालों के समान हैं, परन्तु सर्वदा आनन्द करते हैं, कंगालों के जैसे हैं, परन्तु बहुतों को धनवान बना देते हैं; ऐसे हैं जैसे हमारे पास कुछ नहीं तौभी सब कुछ रखते हैं।
संदर्भित शिक्षा

पौलुस सेवकाई की वास्तविकता को विरोधी परिस्थितियों के बीच दिखाता है—क्लेश के साथ धैर्य, अभाव के साथ आत्मिक समृद्धि और दुःख के बीच आनन्द।

03

खुले हृदय से प्रेम और सहभागिता

पद 11–13
11 हे कुरिन्थियों, हम ने खुल कर तुम से बातें की हैं, हमारा हृदय तुम्हारी ओर खुला हुआ है। 12 तुम्हारे लिये हमारे मन में कुछ सकेती नहीं, पर तुम्हारे ही मनों में सकेती है। 13 पर अपने लड़के-बाले जानकर तुम से कहता हूं, कि तुम भी उसके बदले में अपना हृदय खोल दो॥
मुख्य विचार

सच्ची आत्मिक संगति में हृदय खुला रहता है; पौलुस कुरिन्थियों से भी उसी प्रेम और खुलेपन के साथ अपने हृदय खोलने का आग्रह करता है।

04

अविश्वासियों से अलग और परमेश्वर का मन्दिर

पद 14–18
14 अविश्वासियों के साथ असमान जूए में न जुतो, क्योंकि धार्मिकता और अधर्म का क्या मेल जोल? या ज्योति और अन्धकार की क्या संगति? 15 और मसीह का बलियाल के साथ क्या लगाव? या विश्वासी के साथ अविश्वासी का क्या नाता? 16 और मूरतों के साथ परमेश्वर के मन्दिर का क्या सम्बन्ध? क्योंकि हम तो जीवते परमेश्वर का मन्दिर हैं; जैसा परमेश्वर ने कहा है कि मैं उन में बसूंगा और उन में चला फिरा करूंगा; और मैं उन का परमेश्वर हूंगा, और वे मेरे लोग होंगे।
17 इसलिये प्रभु कहता है, कि उन के बीच में से निकलो और अलग रहो; और अशुद्ध वस्तु को मत छूओ, तो मैं तुम्हें ग्रहण करूंगा। 18 और तुम्हारा पिता हूंगा, और तुम मेरे बेटे और बेटियां होगे: यह सर्वशक्तिमान प्रभु परमेश्वर का वचन है॥
मुख्य विचार

विश्वासी जीवते परमेश्वर का मन्दिर हैं; इसलिए उनका जीवन परमेश्वर के साथ सम्बन्ध और पवित्र अलगाव को प्रगट करने वाला होना चाहिए।

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