यूहन्ना का प्रश्न और यीशु का उत्तर
पद 1–61जब यीशु अपने बारह चेलों को आज्ञा दे चुका, तो वह उन के नगरों में उपदेश और प्रचार करने को वहां से चला गया। 2यूहन्ना ने बन्दीगृह में मसीह के कामों का समाचार सुनकर अपने चेलों को उस से यह पूछने भेजा। 3कि क्या आनेवाला तू ही है: या हम दूसरे की बाट जोहें?
यीशु ने उत्तर दिया, कि जो कुछ तुम सुनते हो और देखते हो, वह सब जाकर यूहन्ना से कह दो। कि अन्धे देखते हैं और लंगड़े चलते फिरते हैं; कोढ़ी शुद्ध किए जाते हैं और बहिरे सुनते हैं, मुर्दे जिलाए जाते हैं; और कंगालों को सुसमाचार सुनाया जाता है।
4यीशु ने उत्तर दिया, कि जो कुछ तुम सुनते हो और देखते हो, वह सब जाकर यूहन्ना से कह दो। 5कि अन्धे देखते हैं और लंगड़े चलते फिरते हैं; कोढ़ी शुद्ध किए जाते हैं और बहिरे सुनते हैं, मुर्दे जिलाए जाते हैं; और कंगालों को सुसमाचार सुनाया जाता है। 6और धन्य है वह, जो मेरे कारण ठोकर न खाए।
यूहन्ना का प्रश्न यीशु की पहचान और उसके मसीही कार्य की पुष्टि से जुड़ा था। यीशु ने केवल दावा करने के बजाय अपने कार्यों की ओर संकेत किया—चंगाई, पुनर्स्थापना और कंगालों को सुसमाचार सुनाया जाना। मसीह की पहचान उसके कार्यों में भी स्पष्ट होती है।
यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला—भविष्यद्वक्ता से भी बड़ा
पद 7–157जब वे वहां से चल दिए, तो यीशु यूहन्ना के विषय में लोगों से कहने लगा; तुम जंगल में क्या देखने गए थे? क्या हवा से हिलते हुए सरकण्डे को? 8फिर तुम क्या देखने गए थे? क्या कोमल वस्त्र पहिने हुए मनुष्य को? देखो, जो कोमल वस्त्र पहिनते हैं, वे राजभवनों में रहते हैं। 9तो फिर क्यों गए थे? क्या किसी भविष्यद्वक्ता को देखने को? हां; मैं तुम से कहता हूं, वरन भविष्यद्वक्ता से भी बड़े को। 10यह वही है, जिस के विषय में लिखा है, कि देख; मैं अपने दूत को तेरे आगे भेजता हूं, जो तेरे आगे तेरा मार्ग तैयार करेगा।
मैं तुम से सच कहता हूं, कि जो स्त्रियों से जन्मे हैं, उन में से यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले से कोई बड़ा नहीं हुआ; पर जो स्वर्ग के राज्य में छोटे से छोटा है वह उस से बड़ा है।
11मैं तुम से सच कहता हूं, कि जो स्त्रियों से जन्मे हैं, उन में से यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले से कोई बड़ा नहीं हुआ; पर जो स्वर्ग के राज्य में छोटे से छोटा है वह उस से बड़ा है। 12यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के दिनों से अब तक स्वर्ग के राज्य पर जोर होता रहा है, और बलवान उसे छीन लेते हैं। 13यूहन्ना तक सारे भविष्यद्वक्ता और व्यवस्था भविष्यद्वाणी करते रहे। 14और चाहो तो मानो, एलिय्याह जो आनेवाला था, वह यही है। 15जिस के सुनने के कान हों, वह सुन ले।
यीशु यूहन्ना को अत्यन्त महत्वपूर्ण भविष्यद्वक्ता के रूप में प्रस्तुत करता है। यूहन्ना की सेवकाई का विशेष कार्य लोगों को आनेवाले मसीह के लिये तैयार करना था। इसलिए यीशु उसके विषय में “भविष्यद्वक्ता से भी बड़े” शब्दों का प्रयोग करता है।
इस पीढ़ी का हठ और यीशु तथा यूहन्ना को अस्वीकार करना
पद 16–1916मैं इस समय के लोगों की उपमा किस से दूं? वे उन बालकों के समान हैं, जो बाजारों में बैठे हुए एक दूसरे से पुकारकर कहते हैं। 17कि हम ने तुम्हारे लिये बांसली बजाई, और तुम न नाचे; हम ने विलाप किया, और तुम ने छाती नहीं पीटी। 18क्योंकि यूहन्ना न खाता आया और न पीता, और वे कहते हैं कि उस में दुष्टात्मा है। 19मनुष्य का पुत्र खाता-पीता आया, और वे कहते हैं कि देखो, पेटू और पियक्कड़ मनुष्य, महसूल लेने वालों और पापियों का मित्र; पर ज्ञान अपने कामों में सच्चा ठहराया गया है।
पर ज्ञान अपने कामों में सच्चा ठहराया गया है।
यहाँ समस्या संदेशवाहक के तरीके में नहीं, बल्कि सुनने वालों के हृदय में दिखाई देती है। यूहन्ना की कठोर जीवन-शैली भी आलोचना का कारण बनी और यीशु का लोगों के बीच रहना भी। जब मनुष्य सत्य को स्वीकार नहीं करना चाहता, तो वह उसके विरुद्ध अलग-अलग बहाने खोज सकता है।
पश्चाताप न करने वाले नगरों को चेतावनी
पद 20–2420तब वह उन नगरों को उलाहना देने लगा, जिन में उस ने बहुतेरे सामर्थ के काम किए थे; क्योंकि उन्होंने अपना मन नहीं फिराया था। 21हाय, खुराजीन; हाय, बैतसैदा; जो सामर्थ के काम तुम में किए गए, यदि वे सूर और सैदा में किए जाते, तो टाट ओढ़कर, और राख में बैठकर, वे कब के मन फिरा लेते। 22परन्तु मैं तुम से कहता हूं; कि न्याय के दिन तुम्हारी दशा से सूर और सैदा की दशा अधिक सहने योग्य होगी।
23और हे कफरनहूम, क्या तू स्वर्ग तक ऊंचा किया जाएगा? तू तो अधोलोक तक नीचे जाएगा; जो सामर्थ के काम तुझ में किए गए हैं, यदि सदोम में किए जाते, तो वह आज तक बना रहता। 24पर मैं तुम से कहता हूं, कि न्याय के दिन तेरी दशा से सदोम के देश की दशा अधिक सहने योग्य होगी।
तब वह उन नगरों को उलाहना देने लगा, जिन में उस ने बहुतेरे सामर्थ के काम किए थे; क्योंकि उन्होंने अपना मन नहीं फिराया था।
यीशु यहाँ केवल सामर्थ के काम देखने की बात नहीं करता, बल्कि उन कामों के प्रति मनुष्य की प्रतिक्रिया को सामने रखता है। अधिक प्रकाश और अधिक प्रमाण के साथ जिम्मेदारी भी बढ़ती है। इस भाग का केंद्र बिन्दु है—सामर्थ के कामों को देखकर भी मन न फिराना।
पिता का धन्यवाद और पुत्र के द्वारा परमेश्वर का प्रगट होना
पद 25–2725उसी समय यीशु ने कहा, हे पिता, स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु; मैं तेरा धन्यवाद करता हूं, कि तू ने इन बातों को ज्ञानियों और समझदारों से छिपा रखा, और बालकों पर प्रगट किया है। 26हां, हे पिता, क्योंकि तुझे यही अच्छा लगा।
मेरे पिता ने मुझे सब कुछ सौंपा है, और कोई पुत्र को नहीं जानता, केवल पिता; और कोई पिता को नहीं जानता, केवल पुत्र और वह जिस पर पुत्र उसे प्रगट करना चाहे।
27मेरे पिता ने मुझे सब कुछ सौंपा है, और कोई पुत्र को नहीं जानता, केवल पिता; और कोई पिता को नहीं जानता, केवल पुत्र और वह जिस पर पुत्र उसे प्रगट करना चाहे।
इस भाग में पिता और पुत्र के बीच अद्वितीय सम्बन्ध को बहुत स्पष्ट रूप से सामने रखा गया है। यीशु परमेश्वर के ज्ञान को केवल मानवीय बुद्धि का विषय नहीं बताता, बल्कि पुत्र के द्वारा प्रगट होने वाली सच्चाई के रूप में प्रस्तुत करता है।
यीशु में विश्राम का निमंत्रण
पद 28–30हे सब परिश्रम करने वालों और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूंगा।
28हे सब परिश्रम करने वालों और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूंगा। 29मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो; और मुझ से सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूं: और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे। 30क्योंकि मेरा जूआ सहज और मेरा बोझ हल्का है।
यीशु केवल बोझ से छुटकारे का निमंत्रण नहीं देता; वह अपने पास आने, उससे सीखने और उसके जूए को उठाने का निमंत्रण देता है। सच्चा विश्राम यीशु से सम्बन्ध और उसकी नम्रता सीखने में पाया जाता है।
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