बोने वाले का दृष्टान्त
पद 1–91उसी दिन यीशु घर से निकलकर झील के किनारे जा बैठा। 2और उसके पास ऐसी बड़ी भीड़ इकट्ठी हुई कि वह नाव पर चढ़ गया, और सारी भीड़ किनारे पर खड़ी रही। 3और उस ने उन से दृष्टान्तों में बहुत सी बातें कही, कि देखो, एक बोने वाला बीज बोने निकला। 4बोते समय कुछ बीज मार्ग के किनारे गिरे और पक्षियों ने आकर उन्हें चुग लिया। 5कुछ पत्थरीली भूमि पर गिरे, जहां उन्हें बहुत मिट्टी न मिली और गहरी मिट्टी न मिलने के कारण वे जल्द उग आए।
6पर सूरज निकलने पर वे जल गए, और जड़ न पकड़ने से सूख गए। 7कुछ झाड़ियों में गिरे, और झाड़ियों ने बढ़कर उन्हें दबा डाला। 8पर कुछ अच्छी भूमि पर गिरे, और फल लाए, कोई सौ गुना, कोई साठ गुना, कोई तीस गुना।
जिस के कान हों वह सुन ले।
9जिस के कान हों वह सुन ले।
इस दृष्टान्त में एक ही बीज अलग-अलग प्रकार की भूमि पर पड़ता है, लेकिन परिणाम अलग-अलग होते हैं। आगे यीशु स्वयं इस दृष्टान्त का अर्थ समझाता है—मुख्य प्रश्न बीज का नहीं, बल्कि उसे ग्रहण करने वाले हृदय की स्थिति का है।
दृष्टान्तों का उद्देश्य और सुनने वालों की जिम्मेदारी
पद 10–1710और चेलों ने पास आकर उस से कहा, तू उन से दृष्टान्तों में क्यों बातें करता है? 11उस ने उत्तर दिया, कि तुम को स्वर्ग के राज्य के भेदों की समझ दी गई है, पर उन को नहीं। 12क्योंकि जिस के पास है, उसे दिया जाएगा; और उसके पास बहुत हो जाएगा; पर जिस के पास कुछ नहीं है, उस से जो कुछ उसके पास है, वह भी ले लिया जाएगा।
13मैं उन से दृष्टान्तों में इसलिये बातें करता हूं, कि वे देखते हुए नहीं देखते; और सुनते हुए नहीं सुनते; और नहीं समझते। 14और उन के विषय में यशायाह की यह भविष्यद्वाणी पूरी होती है, कि तुम कानों से तो सुनोगे, पर समझोगे नहीं; और आंखों से तो देखोगे, पर तुम्हें न सूझेगा। 15क्योंकि इन लोगों का मन मोटा हो गया है, और वे कानों से ऊंचा सुनते हैं और उन्होंने अपनी आंखें मूंद ली हैं; कहीं ऐसा न हो कि वे आंखों से देखें, और कानों से सुनें और मन से समझें, और फिर जाएं, और मैं उन्हें चंगा करूं।
पर धन्य है तुम्हारी आंखें, कि वे देखती हैं; और तुम्हारे कान, कि वे सुनते हैं।
16पर धन्य है तुम्हारी आंखें, कि वे देखती हैं; और तुम्हारे कान, कि वे सुनते हैं। 17क्योंकि मैं तुम से सच कहता हूं, कि बहुत से भविष्यद्वक्ताओं ने और धर्मियों ने चाहा कि जो बातें तुम देखते हो, देखें पर न देखीं; और जो बातें तुम सुनते हो, सुनें, पर न सुनीं।
यीशु के अनुसार सुनना और देखना अपने आप में पर्याप्त नहीं है। परमेश्वर के वचन को समझने और उसके प्रति सही प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता है। इसलिए दृष्टान्त केवल जानकारी देने के लिये नहीं, बल्कि सुनने वाले के हृदय को प्रकट करने के लिये भी हैं।
बोने वाले के दृष्टान्त का अर्थ
पद 18–2318सो तुम बोने वाले का दृष्टान्त सुनो। 19जो कोई राज्य का वचन सुनकर नहीं समझता, उसके मन में जो कुछ बोया गया था, उसे वह दुष्ट आकर छीन ले जाता है; यह वही है, जो मार्ग के किनारे बोया गया था। 20और जो पत्थरीली भूमि पर बोया गया, यह वह है, जो वचन सुनकर तुरन्त आनन्द के साथ मान लेता है। 21पर अपने में जड़ न रखने के कारण वह थोड़े ही दिन का है, और जब वचन के कारण क्लेश या उपद्रव होता है, तो तुरन्त ठोकर खाता है।
जो झाड़ियों में बोया गया, यह वह है, जो वचन को सुनता है, पर इस संसार की चिन्ता और धन का धोखा वचन को दबाता है, और वह फल नहीं लाता।
22जो झाड़ियों में बोया गया, यह वह है, जो वचन को सुनता है, पर इस संसार की चिन्ता और धन का धोखा वचन को दबाता है, और वह फल नहीं लाता। 23जो अच्छी भूमि में बोया गया, यह वह है, जो वचन को सुनकर समझता है, और फल लाता है कोई सौ गुना, कोई साठ गुना, कोई तीस गुना।
इस दृष्टान्त में तीन बड़ी रुकावटें दिखाई देती हैं—वचन को न समझना, कठिनाई आने पर जड़ न होना, और संसार की चिन्ता तथा धन का धोखा। इसके विपरीत अच्छी भूमि वचन को सुनती, समझती और फल लाती है।
गेहूं और जंगली दाने का दृष्टान्त
पद 24–3024उस ने उन्हें एक और दृष्टान्त दिया कि स्वर्ग का राज्य उस मनुष्य के समान है जिस ने अपने खेत में अच्छा बीज बोया। 25पर जब लोग सो रहे थे तो उसका बैरी आकर गेहूं के बीच जंगली बीज बोकर चला गया। 26जब अंकुर निकले और बालें लगीं, तो जंगली दाने भी दिखाई दिए। 27इस पर गृहस्थ के दासों ने आकर उस से कहा, हे स्वामी, क्या तू ने अपने खेत में अच्छा बीज न बोया था फिर जंगली दाने के पौधे उस में कहां से आए? 28उस ने उन से कहा, यह किसी बैरी का काम है। दासों ने उस से कहा क्या तेरी इच्छा है, कि हम जाकर उन को बटोर लें?
29उस ने कहा, ऐसा नहीं, न हो कि जंगली दाने के पौधे बटोरते हुए उन के साथ गेहूं भी उखाड़ लो। 30कटनी तक दोनों को एक साथ बढ़ने दो, और कटनी के समय मैं काटने वालों से कहूंगा; पहिले जंगली दाने के पौधे बटोरकर जलाने के लिये उन के गट्ठे बान्ध लो, और गेहूं को मेरे खत्ते में इकट्ठा करो।
इस दृष्टान्त में अच्छा बीज और जंगली दाने दोनों के बढ़ने की बात आती है। तत्काल सब कुछ अलग करने के बजाय कटनी तक प्रतीक्षा करने की बात कही गई है। आगे यीशु स्वयं इस दृष्टान्त का अर्थ स्पष्ट करता है और अन्तिम न्याय की ओर संकेत करता है।
राई के दाने और खमीर के दृष्टान्त
पद 31–3531उस ने उन्हें एक और दृष्टान्त दिया; कि स्वर्ग का राज्य राई के एक दाने के समान है, जिसे किसी मनुष्य ने लेकर अपने खेत में बो दिया। 32वह सब बीजों से छोटा तो है पर जब बढ़ जाता है तब सब साग पात से बड़ा होता है; और ऐसा पेड़ हो जाता है, कि आकाश के पक्षी आकर उस की डालियों पर बसेरा करते हैं। 33उस ने एक और दृष्टान्त उन्हें सुनाया; कि स्वर्ग का राज्य खमीर के समान है जिस को किसी स्त्री ने लेकर तीन पसेरी आटे में मिला दिया और होते होते वह सब खमीर हो गया।
स्वर्ग का राज्य राई के एक दाने के समान है… और स्वर्ग का राज्य खमीर के समान है।
34ये सब बातें यीशु ने दृष्टान्तों में लोगों से कहीं, और बिना दृष्टान्त वह उन से कुछ न कहता था। 35कि जो वचन भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा गया था, वह पूरा हो कि मैं दृष्टान्त कहने को अपना मुंह खोलूंगा: मैं उन बातों को जो जगत की उत्पत्ति से गुप्त रही हैं प्रगट करूंगा।
राई के दाने और खमीर के दृष्टान्त स्वर्ग के राज्य की बढ़ती हुई प्रभावशीलता को समझाने के लिये दिए गए हैं। एक बहुत छोटे आरम्भ और भीतर से होने वाले प्रभाव के माध्यम से यीशु राज्य की कार्यवाही की तस्वीर देता है।
जंगली दाने के दृष्टान्त का अर्थ
पद 36–4336तब वह भीड़ को छोड़ कर घर में आया, और उसके चेलों ने उसके पास आकर कहा, खेत के जंगली दाने का दृष्टान्त हमें समझा दे। 37उस ने उन को उत्तर दिया, कि अच्छे बीज का बोने वाला मनुष्य का पुत्र है। 38खेत संसार है, अच्छा बीज राज्य के सन्तान, और जंगली बीज दुष्ट के सन्तान हैं। 39जिस बैरी ने उन को बोया वह शैतान है; कटनी जगत का अन्त है: और काटने वाले स्वर्गदूत हैं।
40सो जैसे जंगली दाने बटोरे जाते और जलाए जाते हैं वैसा ही जगत के अन्त में होगा। 41मनुष्य का पुत्र अपने स्वर्गदूतों को भेजेगा, और वे उसके राज्य में से सब ठोकर के कारणों को और कुकर्म करने वालों को इकट्ठा करेंगे। 42और उन्हें आग के कुंड में डालेंगे, वहां रोना और दांत पीसना होगा।
उस समय धर्मी अपने पिता के राज्य में सूर्य की नाईं चमकेंगे; जिस के कान हों वह सुन ले।
43उस समय धर्मी अपने पिता के राज्य में सूर्य की नाईं चमकेंगे; जिस के कान हों वह सुन ले।
यीशु स्वयं दृष्टान्त के प्रतीकों को स्पष्ट करता है—खेत संसार है, अच्छा बीज राज्य के सन्तान हैं, बैरी शैतान है, कटनी जगत का अन्त है और काटने वाले स्वर्गदूत हैं। दृष्टान्त का अन्तिम भाग न्याय और धर्मियों की महिमा दोनों को सामने रखता है।
छिपा हुआ धन और बहुमूल्य मोती
पद 44–4644स्वर्ग का राज्य खेत में छिपे हुए धन के समान है, जिसे किसी मनुष्य ने पाकर छिपा दिया, और मारे आनन्द के जाकर और अपना सब कुछ बेचकर उस खेत को मोल लिया। 45फिर स्वर्ग का राज्य एक व्यापारी के समान है जो अच्छे मोतियों की खोज में था।
जब उसे एक बहुमूल्य मोती मिला तो उस ने जाकर अपना सब कुछ बेच डाला और उसे मोल ले लिया।
46जब उसे एक बहुमूल्य मोती मिला तो उस ने जाकर अपना सब कुछ बेच डाला और उसे मोल ले लिया।
दोनों दृष्टान्त स्वर्ग के राज्य के अत्यन्त मूल्यवान होने को सामने रखते हैं। जिस व्यक्ति को उसका वास्तविक मूल्य समझ में आता है, वह उसे प्राप्त करने के लिये सब कुछ छोड़ने को तैयार होता है। यहाँ प्राथमिकता और मूल्य की बात प्रमुख है।
बड़े जाल का दृष्टान्त और अन्तिम अलगाव
पद 47–5047फिर स्वर्ग का राज्य उस बड़े जाल के समान है, जो समुद्र में डाला गया, और हर प्रकार की मछलियों को समेट लाया। 48और जब भर गया, तो उस को किनारे पर खींच लाए, और बैठकर अच्छी अच्छी तो बरतनों में इकट्ठा किया और निकम्मी फेंक दी। 49जगत के अन्त में ऐसा ही होगा: स्वर्गदूत आकर दुष्टों को धर्मियों से अलग करेंगे, और उन्हें आग के कुंड में डालेंगे। 50वहां रोना और दांत पीसना होगा।
जाल के दृष्टान्त में अन्तिम अलगाव की तस्वीर दी गई है। अभी विभिन्न प्रकार के लोग एक साथ दिखाई दे सकते हैं, लेकिन यीशु जगत के अन्त में होने वाले न्याय और धर्मियों तथा दुष्टों के अलग किए जाने की बात स्पष्ट करता है।
स्वर्ग के राज्य का शिष्य और नई-पुरानी वस्तुएं
पद 51–53इसलिये हर एक शास्त्री जो स्वर्ग के राज्य का चेला बना है, उस गृहस्थ के समान है जो अपने भण्डार से नई और पुरानी वस्तुएं निकालता है।
51क्या तुम ने ये सब बातें समझीं? उन्होंने उस से कहा, हां। 52उस ने उन से कहा, इसलिये हर एक शास्त्री जो स्वर्ग के राज्य का चेला बना है, उस गृहस्थ के समान है जो अपने भण्डार से नई और पुरानी वस्तुएं निकालता है। 53जब यीशु ये सब दृष्टान्त कह चुका, तो वहां से चला गया।
यीशु अपने चेलों से केवल सुनने की नहीं, समझने की अपेक्षा करता है। स्वर्ग के राज्य का चेला उस गृहस्थ के समान बताया गया है जिसके भण्डार में पुरानी और नई दोनों वस्तुएं हैं—अर्थात वह प्राप्त सत्य को समझकर उपयोग में लाने वाला व्यक्ति है।
अपने देश में यीशु का अस्वीकार किया जाना
पद 54–5854और अपने देश में आकर उन की सभा में उन्हें ऐसा उपदेश देने लगा; कि वे चकित होकर कहने लगे; कि इस को यह ज्ञान और सामर्थ के काम कहां से मिले? 55क्या यह बढ़ई का बेटा नहीं? और क्या इस की माता का नाम मरियम और इस के भाइयों के नाम याकूब और यूसुफ और शमौन और यहूदा नहीं? 56और क्या इस की सब बहिनें हमारे बीच में नहीं रहतीं? फिर इस को यह सब कहां से मिला?
सो उन्होंने उसके कारण ठोकर खाई, पर यीशु ने उन से कहा, भविष्यद्वक्ता अपने देश और अपने घर को छोड़ और कहीं निरादर नहीं होता।
57सो उन्होंने उसके कारण ठोकर खाई, पर यीशु ने उन से कहा, भविष्यद्वक्ता अपने देश और अपने घर को छोड़ और कहीं निरादर नहीं होता। 58और उस ने वहां उन के अविश्वास के कारण बहुत सामर्थ के काम नहीं किए।
लोगों ने यीशु की बुद्धि और सामर्थ के कामों को देखकर आश्चर्य किया, लेकिन परिचित होने के कारण ठोकर खाई। यह भाग दिखाता है कि केवल यीशु के बारे में जानना और उसके कार्यों को देखना पर्याप्त नहीं; विश्वास की प्रतिक्रिया भी आवश्यक है।
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