हेरोदेस और यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले की मृत्यु
पद 1–121उस समय चौथाई देश के राजा हेरोदेस ने यीशु की चर्चा सुनी। 2और अपने सेवकों से कहा, यह यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला है: वह मरे हुओं में से जी उठा है, इसी लिये उस से सामर्थ के काम प्रगट होते हैं। 3क्योंकि हेरोदेस ने अपने भाई फिलेप्पुस की पत्नी हेरोदियास के कारण, यूहन्ना को पकड़कर बान्धा, और जेलखाने में डाल दिया था। 4क्योंकि यूहन्ना ने उस से कहा था, कि इस को रखना तुझे उचित नहीं है। 5और वह उसे मार डालना चाहता था, पर लोगों से डरता था, क्योंकि वे उसे भविष्यद्वक्ता जानते थे। 6पर जब हेरोदेस का जन्म दिन आया, तो हेरोदियास की बेटी ने उत्सव में नाच दिखाकर हेरोदेस को खुश किया। 7इसलिये उस ने शपथ खाकर वचन दिया, कि जो कुछ तू मांगेगी, मैं तुझे दूंगा। 8वह अपनी माता की उक्साई हुई बोली, यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले का सिर थाल में यहीं मुझे मंगवा दे।
“यूहन्ना ने उस से कहा था, कि इस को रखना तुझे उचित नहीं है।” — पद 4
9राजा दुखित हुआ, पर अपनी शपथ के, और साथ बैठने वालों के कारण, आज्ञा दी, कि दे दिया जाए। 10और जेलखाने में लोगों को भेजकर यूहन्ना का सिर कटवा दिया। 11और उसका सिर थाल में लाया गया, और लड़की को दिया गया; और वह उस को अपनी मां के पास ले गई। 12और उसके चेलों ने आकर और उस की लोथ को ले जाकर गाढ़ दिया और जाकर यीशु को समाचार दिया॥
यूहन्ना ने सत्य बोलने से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया। हेरोदेस ने सत्य को जानते हुए भी अपनी प्रतिज्ञा, प्रतिष्ठा और लोगों के भय के कारण गलत निर्णय लिया। यह प्रसंग दिखाता है कि सत्य को जानना और सत्य के अनुसार खड़ा होना दो अलग बातें हैं।
यीशु ने भीड़ पर तरस खाया और बीमारों को चंगा किया
पद 13–1413जब यीशु ने यह सुना, तो नाव पर चढ़कर वहां से किसी सुनसान जगह एकान्त में चला गया; और लोग यह सुनकर नगर नगर से पैदल उसके पीछे हो लिए। 14उस ने निकलकर बड़ी भीड़ देखी; और उन पर तरस खाया; और उस ने उन के बीमारों को चंगा किया।
“उन पर तरस खाया; और उस ने उन के बीमारों को चंगा किया।” — पद 14
यीशु स्वयं एकान्त स्थान में जाना चाहते थे, फिर भी जब उन्होंने आवश्यकता में पड़ी भीड़ को देखा, तो उनका हृदय करुणा से भर गया। सेवकाई केवल कार्यक्रम नहीं, बल्कि लोगों की वास्तविक आवश्यकता को देखकर करुणा से प्रतिक्रिया करना भी है।
पांच रोटियों और दो मछलियों से पांच हजार को भोजन
पद 15–2115जब सांझ हुई, तो उसके चेलों ने उसके पास आकर कहा; यह तो सुनसान जगह है और देर हो रही है, लोगों को विदा किया जाए कि वे बस्तियों में जाकर अपने लिये भोजन मोल लें। 16यीशु ने उन से कहा उन का जाना आवश्यक नहीं! तुम ही इन्हें खाने को दो। 17उन्होंने उस से कहा; यहां हमारे पास पांच रोटी और दो मछलियों को छोड़ और कुछ नहीं है। 18उस ने कहा, उन को यहां मेरे पास ले आओ।
19तब उस ने लोगों को घास पर बैठने को कहा, और उन पांच रोटियों और दो मछलियों को लिया; और स्वर्ग की ओर देखकर धन्यवाद किया और रोटियां तोड़ तोड़कर चेलों को दीं, और चेलों ने लोगों को। 20और सब खाकर तृप्त हो गए, और उन्होंने बचे हुए टुकड़ों से भरी हुई बारह टोकरियां उठाईं। 21और खाने वाले स्त्रियों और बालकों को छोड़कर लगभग पांच हजार पुरुष थे॥
“तुम ही इन्हें खाने को दो।” — पद 16
इस घटना में शिष्यों के पास संसाधन बहुत कम दिखाई दे रहे थे—पांच रोटियां और दो मछलियां। फिर भी यीशु ने उसी छोटी-सी उपलब्धता को लेकर धन्यवाद किया और लोगों की आवश्यकता पूरी हुई। यहाँ ध्यान केवल भोजन की मात्रा पर नहीं, बल्कि यीशु के हाथों में सौंपे गए छोटे साधन पर भी है।
यीशु का प्रार्थना के लिये एकान्त में जाना
पद 22–2322और उस ने तुरन्त अपने चेलों को बरबस नाव पर चढ़ाया, कि वे उस से पहिले पार चले जाएं, जब तक कि वह लोगों को विदा करे। 23वह लोगों को विदा करके, प्रार्थना करने को अलग पहाड़ पर चढ़ गया; और सांझ को वहां अकेला था।
“वह लोगों को विदा करके, प्रार्थना करने को अलग पहाड़ पर चढ़ गया; और सांझ को वहां अकेला था।” — पद 23
बड़ी सेवकाई और भीड़ के बीच भी यीशु ने प्रार्थना के लिये एकान्त समय निकाला। सार्वजनिक सेवकाई के साथ व्यक्तिगत संगति और प्रार्थना का जीवन भी आवश्यक है।
यीशु का पानी पर चलना और पतरस का विश्वास
पद 24–3324उस समय नाव झील के बीच लहरों से डगमगा रही थी, क्योंकि हवा साम्हने की थी। 25और वह रात के चौथे पहर झील पर चलते हुए उन के पास आया। 26चेले उस को झील पर चलते हुए देखकर घबरा गए! और कहने लगे, वह भूत है; और डर के मारे चिल्ला उठे। 27यीशु ने तुरन्त उन से बातें की, और कहा; ढाढ़स बान्धो; मैं हूं; डरो मत।
28पतरस ने उस को उत्तर दिया, हे प्रभु, यदि तू ही है, तो मुझे अपने पास पानी पर चलकर आने की आज्ञा दे। 29उस ने कहा, आ: तब पतरस नाव पर से उतरकर यीशु के पास जाने को पानी पर चलने लगा। 30पर हवा को देखकर डर गया, और जब डूबने लगा, तो चिल्लाकर कहा; हे प्रभु, मुझे बचा। 31यीशु ने तुरन्त हाथ बढ़ाकर उसे थाम लिया, और उस से कहा, हे अल्प-विश्वासी, तू ने क्यों सन्देह किया?
32जब वे नाव पर चढ़ गए, तो हवा थम गई। 33इस पर जो नाव पर थे, उन्होंने उसे दण्डवत करके कहा; सचमुच तू परमेश्वर का पुत्र है॥
“ढाढ़स बान्धो; मैं हूं; डरो मत।” — पद 27
“हे अल्प-विश्वासी, तू ने क्यों सन्देह किया?” — पद 31
पतरस तब तक पानी पर चलता रहा जब तक उसकी दृष्टि यीशु पर थी। जब उसने हवा को देखा, तो डर गया। यह प्रसंग विश्वास और परिस्थितियों के बीच हमारे ध्यान की दिशा को सामने लाता है।
गन्नेसरत में बहुत से बीमारों की चंगाई
पद 34–3634वे पार उतरकर गन्नेसरत देश में पहुंचे। 35और वहां के लोगों ने उसे पहचानकर आस पास के सारे देश में कहला भेजा, और सब बीमारों को उसके पास लाए। 36और उस से बिनती करने लगे, कि वह उन्हें अपने वस्त्र के आंचल ही को छूने दे: और जितनों ने उसे छूआ, वे चंगे हो गए॥
“और जितनों ने उसे छूआ, वे चंगे हो गए॥” — पद 36
मत्ती 14 में यूहन्ना की मृत्यु का दुःख, भीड़ के प्रति यीशु की करुणा, पांच रोटियों और दो मछलियों का चमत्कार, पानी पर चलना, पतरस का विश्वास और गन्नेसरत में चंगाई—इन सभी घटनाओं के बीच यीशु की सामर्थ और करुणा लगातार दिखाई देती है।
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