मनुष्यों की रीतियों के कारण परमेश्वर की आज्ञा को टालना
पद 1–91तब यरूशलेम से कितने फरीसी और शास्त्री यीशु के पास आकर कहने लगे। 2तेरे चेले पुरनियों की रीतों को क्यों टालते हैं, कि बिना हाथ धोए रोटी खाते हैं? 3उस ने उन को उत्तर दिया, कि तुम भी अपनी रीतों के कारण क्यों परमेश्वर की आज्ञा टालते हो? 4क्योंकि परमेश्वर ने कहा था, कि अपने पिता और अपनी माता का आदर करना: और जो कोई पिता या माता को बुरा कहे, वह मार डाला जाए। 5पर तुम कहते हो, कि यदि कोई अपने पिता या माता से कहे, कि जो कुछ तुझे मुझ से लाभ पहुंच सकता था, वह परमेश्वर को भेंट चढ़ाई जा चुकी। 6तो वह अपने पिता का आदर न करे, सो तुम ने अपनी रीतों के कारण परमेश्वर का वचन टाल दिया।
7हे कपटियों, यशायाह ने तुम्हारे विषय में यह भविष्यद्वाणी ठीक की। 8कि ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उन का मन मुझ से दूर रहता है। 9और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की विधियों को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं।
“पर उन का मन मुझ से दूर रहता है।” — पद 8
यीशु यहां बाहरी धार्मिक परम्परा और हृदय से परमेश्वर की आज्ञाकारिता के बीच का अंतर स्पष्ट करते हैं। केवल होंठों से आदर करना पर्याप्त नहीं; परमेश्वर मन की सच्चाई और आज्ञाकारिता को देखता है।
जो मुंह से निकलता है वही मनुष्य को अशुद्ध करता है
पद 10–2010और उस ने लोगों को अपने पास बुलाकर उन से कहा, सुनो; और समझो। 11जो मुंह में जाता है, वह मनुष्य को अशुद्ध नहीं करता, पर जो मुंह से निकलता है, वही मनुष्य को अशुद्ध करता है। 12तब चेलों ने आकर उस से कहा, क्या तू जानता है कि फरीसियों ने यह वचन सुनकर ठोकर खाई? 13उस ने उत्तर दिया, हर पौधा जो मेरे स्वर्गीय पिता ने नहीं लगाया, उखाड़ा जाएगा। 14उन को जाने दो; वे अन्धे मार्ग दिखाने वाले हैं: और अन्धा यदि अन्धे को मार्ग दिखाए, तो दोनों गड़हे में गिर पड़ेंगे। 15यह सुनकर, पतरस ने उस से कहा, यह दृष्टान्त हमें समझा दे। 16उस ने कहा, क्या तुम भी अब तक ना समझ हो?
17क्या नहीं समझते, कि जो कुछ मुंह में जाता, वह पेट में पड़ता है, और सण्डास में निकल जाता है? 18पर जो कुछ मुंह से निकलता है, वह मन से निकलता है, और वही मनुष्य को अशुद्ध करता है। 19क्योंकि कुचिन्ता, हत्या, पर स्त्रीगमन, व्यभिचार, चोरी, झूठी गवाही और निन्दा मन ही से निकलतीं है। 20यही हैं जो मनुष्य को अशुद्ध करती हैं, परन्तु हाथ बिना धोए भोजन करना मनुष्य को अशुद्ध नहीं करता॥
“पर जो मुंह से निकलता है, वही मनुष्य को अशुद्ध करता है।” — पद 11
यीशु का ध्यान केवल बाहरी व्यवहार पर नहीं, बल्कि मन की स्थिति पर है। मनुष्य के शब्द और उसके कार्य उसके भीतर की दशा को प्रकट करते हैं। इसलिए वास्तविक शुद्धता केवल बाहरी रीति निभाने से नहीं, बल्कि हृदय के परिवर्तन से जुड़ी है।
कनानी स्त्री का महान विश्वास
पद 21–2821यीशु वहां से निकलकर, सूर और सैदा के देशों की ओर चला गया। 22और देखो, उस देश से एक कनानी स्त्री निकली, और चिल्लाकर कहने लगी; हे प्रभु दाऊद के सन्तान, मुझ पर दया कर, मेरी बेटी को दुष्टात्मा बहुत सता रहा है। 23पर उस ने उसे कुछ उत्तर न दिया, और उसके चेलों ने आकर उस से बिनती कर कहा; इसे विदा कर; क्योंकि वह हमारे पीछे चिल्लाती आती है। 24उस ने उत्तर दिया, कि इस्राएल के घराने की खोई हुई भेड़ों को छोड़ मैं किसी के पास नहीं भेजा गया। 25पर वह आई, और उसे प्रणाम करके कहने लगी; हे प्रभु, मेरी सहायता कर। 26उस ने उत्तर दिया, कि लड़कों की रोटी लेकर कुत्तों के आगे डालना अच्छा नहीं।
27उस ने कहा, सत्य है प्रभु; पर कुत्ते भी वह चूरचार खाते हैं, जो उन के स्वामियों की मेज से गिरते हैं। 28इस पर यीशु ने उस को उत्तर देकर कहा, कि हे स्त्री, तेरा विश्वास बड़ा है: जैसा तू चाहती है, तेरे लिये वैसा ही हो; और उस की बेटी उसी घड़ी से चंगी हो गई॥
“हे स्त्री, तेरा विश्वास बड़ा है: जैसा तू चाहती है, तेरे लिये वैसा ही हो।” — पद 28
कनानी स्त्री बार-बार यीशु के पास आती रही और अपनी बेटी के लिये दया की विनती करती रही। उसकी परिस्थिति, उसकी पहचान और सामने आई कठिनाई उसके विश्वास को रोक नहीं सकी। अन्त में यीशु ने उसके विश्वास को “बड़ा” कहा और उसकी बेटी उसी घड़ी चंगी हो गई।
यीशु ने बहुत से बीमारों को चंगा किया
पद 29–3129यीशु वहां से चलकर, गलील की झील के पास आया, और पहाड़ पर चढ़कर वहां बैठ गया। 30और भीड़ पर भीड़ लंगड़ों, अन्धों, गूंगों, टुण्डों, और बहुत औरों को लेकर उसके पास आए; और उन्हें उस के पांवों पर डाल दिया, और उस ने उन्हें चंगा किया। 31सो जब लोगों ने देखा, कि गूंगे बोलते और टुण्डे चंगे होते और लंगड़े चलते और अन्धे देखते हैं, तो अचम्भा करके इस्राएल के परमेश्वर की बड़ाई की॥
“तो अचम्भा करके इस्राएल के परमेश्वर की बड़ाई की॥” — पद 31
यीशु की चंगाई केवल शारीरिक आवश्यकता को पूरा करने तक सीमित नहीं रही; लोगों की प्रतिक्रिया परमेश्वर की बड़ाई करने की थी। चंगाई और सामर्थ के कार्य लोगों को परमेश्वर की ओर संकेत करते हैं।
सात रोटियों से चार हजार लोगों को भोजन
पद 32–3932यीशु ने अपने चेलों को बुलाकर कहा, मुझे इस भीड़ पर तरस आता है; क्योंकि वे तीन दिन से मेरे साथ हैं और उन के पास कुछ खाने को नहीं; और मैं उन्हें भूखा विदा करना नहीं चाहता; कहीं ऐसा न हो कि मार्ग में थककर रह जाएं। 33चेलों ने उस से कहा, हमें जंगल में कहां से इतनी रोटी मिलेगी कि हम इतनी बड़ी भीड़ को तृप्त करें? 34यीशु ने उन से पूछा, तुम्हारे पास कितनी रोटियां हैं? उन्होंने कहा; सात और थोड़ी सी छोटी मछलियां। 35तब उस ने लोगों को भूमि पर बैठने की आज्ञा दी।
36और उन सात रोटियों और मछलियों को ले धन्यवाद करके तोड़ा और अपने चेलों को देता गया; और चेले लोगों को। 37सो सब खाकर तृप्त हो गए और बचे हुए टुकड़ों से भरे हुए सात टोकरें उठाए। 38और खाने वाले स्त्रियों और बालकों को छोड़ चार हजार पुरुष थे। 39तब वह भीड़ को विदा करके नाव पर चढ़ गया, और मगदन देश के सिवानों में आया॥
“मुझे इस भीड़ पर तरस आता है।” — पद 32
मत्ती 14 में पांच रोटियों और दो मछलियों से पांच हजार पुरुषों को भोजन कराने के बाद, यहां सात रोटियों और थोड़ी सी मछलियों के द्वारा चार हजार पुरुषों को भोजन कराने की घटना आती है। दोनों घटनाओं में यीशु की करुणा, धन्यवाद और लोगों के तृप्त होने का वर्णन मिलता है।
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