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मत्ती अध्याय 16 — बाइबल पाठ, व्याख्या और मुख्य शिक्षाएँ

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1

समय के चिन्ह और फरीसियों-सदूकियों का खमीर

पद 1–12

1और फरीसियों और सदूकियों ने पास आकर उसे परखने के लिये उस से कहा, कि हमें आकाश का कोई चिन्ह दिखा। 2उस ने उन को उत्तर दिया, कि सांझ को तुम कहते हो कि खुला रहेगा क्योंकि आकाश लाल है। 3और भोर को कहते हो, कि आज आन्धी आएगी क्योंकि आकाश लाल और धुमला है; तुम आकाश का लक्षण देखकर भेद बता सकते हो पर समयों के चिन्हों का भेद नहीं बता सकते? 4इस युग के बुरे और व्यभिचारी लोग चिन्ह ढूंढ़ते हैं पर यूनुस के चिन्ह को छोड़ कोई और चिन्ह उन्हें न दिया जाएगा, और वह उन्हें छोड़कर चला गया॥ 5और चेले पार जाते समय रोटी लेना भूल गए थे। 6यीशु ने उन से कहा, देखो; फरीसियों और सदूकियों के खमीर से चौकस रहना।

7वे आपस में विचार करने लगे, कि हम तो रोटी नहीं लाए। 8यह जानकर, यीशु ने उन से कहा, हे अल्पविश्वासियों, तुम आपस में क्यों विचार करते हो कि हमारे पास रोटी नहीं? 9क्या तुम अब तक नहीं समझे? और उन पांच हजार की पांच रोटी स्मरण नहीं करते, और न यह कि कितनी टोकरियां उठाईं थीं? 10और न उन चार हजार की सात रोटी; और न यह कि कितने टोकरे उठाए गए थे? 11तुम क्यों नहीं समझते कि मैं ने तुम से रोटियों के विषय में नहीं कहा फरीसियों और सदूकियों के खमीर से चौकस रहना। 12तब उन को समझ में आया, कि उस ने रोटी के खमीर से नहीं, पर फरीसियों और सदूकियों की शिक्षा से चौकस रहने को कहा था।

महत्वपूर्ण चेतावनी

“फरीसियों और सदूकियों के खमीर से चौकस रहना।” — पद 6

गहराई से समझें

यहां “खमीर” रोटी के भौतिक खमीर की बात नहीं कर रहा था। शिष्यों को बाद में समझ आया कि यीशु फरीसियों और सदूकियों की शिक्षा से सावधान रहने की बात कर रहे थे। गलत शिक्षा भी धीरे-धीरे मनुष्य के विचार और विश्वास को प्रभावित कर सकती है।

2

पतरस का अंगीकार कि यीशु मसीह है

पद 13–20

13यीशु कैसरिया फिलिप्पी के देश में आकर अपने चेलों से पूछने लगा, कि लोग मनुष्य के पुत्र को क्या कहते हैं? 14उन्होंने कहा, कितने तो यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला कहते हैं और कितने एलिय्याह, और कितने यिर्मयाह या भविष्यद्वक्ताओं में से कोई एक कहते हैं। 15उस ने उन से कहा; परन्तु तुम मुझे क्या कहते हो? 16शमौन पतरस ने उत्तर दिया, कि तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है।

विश्वास का अंगीकार

“तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है।” — पद 16

17यीशु ने उस को उत्तर दिया, कि हे शमौन योना के पुत्र, तू धन्य है; क्योंकि मांस और लोहू ने नहीं, परन्तु मेरे पिता ने जो स्वर्ग में है, यह बात तुझ पर प्रगट की है। 18और मैं भी तुझ से कहता हूं, कि तू पतरस है; और मैं इस पत्थर पर अपनी कलीसिया बनाऊंगा: और अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे। 19मैं तुझे स्वर्ग के राज्य की कुंजियां दूंगा: और जो कुछ तू पृथ्वी पर बान्धेगा, वह स्वर्ग में बन्धेगा; और जो कुछ तू पृथ्वी पर खोलेगा, वह स्वर्ग में खुलेगा। 20तब उस ने चेलों को चिताया, कि किसी से न कहना! कि मैं मसीह हूं।

जानने योग्य

पतरस का उत्तर केवल यीशु की पहचान के बारे में सामान्य राय नहीं था। उसने यीशु को “जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह” कहा। यीशु ने स्पष्ट किया कि यह समझ मानवीय बुद्धि से नहीं, बल्कि स्वर्गीय पिता के द्वारा प्रगट हुई थी।

3

यीशु ने अपनी मृत्यु और पुनरुत्थान की भविष्यवाणी की

पद 21–23

21उस समय से यीशु अपने चेलों को बताने लगा, कि मुझे अवश्य है, कि यरूशलेम को जाऊं, और पुरनियों और महायाजकों और शास्त्रियों के हाथ से बहुत दुख उठाऊं; और मार डाला जाऊं; और तीसरे दिन जी उठूं। 22इस पर पतरस उसे अलग ले जाकर झिड़कने लगा कि हे प्रभु, परमेश्वर न करे; तुझ पर ऐसा कभी न होगा। 23उस ने फिरकर पतरस से कहा, हे शैतान, मेरे साम्हने से दूर हो: तू मेरे लिये ठोकर का कारण है; क्योंकि तू परमेश्वर की बातें नहीं, पर मनुष्यों की बातों पर मन लगाता है।

महत्वपूर्ण वचन

“तू परमेश्वर की बातें नहीं, पर मनुष्यों की बातों पर मन लगाता है।” — पद 23

गहराई से समझें

पतरस यीशु को दुख और मृत्यु से बचाना चाहता था, लेकिन यीशु ने उसके विचार को परमेश्वर की योजना के विपरीत बताया। यहां यह स्पष्ट होता है कि प्रेम और अच्छी इच्छा के बावजूद मनुष्य की सोच हमेशा परमेश्वर की इच्छा के समान नहीं होती।

4

क्रूस उठाकर यीशु के पीछे चलना

पद 24–28

24तब यीशु ने अपने चेलों से कहा; यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो अपने आप का इन्कार करे और अपना क्रूस उठाए, और मेरे पीछे हो ले। 25क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे, वह उसे खोएगा; और जो कोई मेरे लिये अपना प्राण खोएगा, वह उसे पाएगा। 26यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे, और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा? या मनुष्य अपने प्राण के बदले में क्या देगा?

27मनुष्य का पुत्र अपने स्वर्गदूतों के साथ अपने पिता की महिमा में आएगा, और उस समय वह हर एक को उसके कामों के अनुसार प्रतिफल देगा। 28मैं तुम से सच कहता हूं, कि जो यहां खड़े हैं, उन में से कितने ऐसे हैं; कि जब तक मनुष्य के पुत्र को उसके राज्य में आते हुए न देख लेंगे, तब तक मृत्यु का स्वाद कभी न चखेंगे।

शिष्यत्व का मूल संदेश

“यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो अपने आप का इन्कार करे और अपना क्रूस उठाए, और मेरे पीछे हो ले।” — पद 24

जीवन का प्रश्न

“यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे, और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा?” — पद 26

आज के लिये सीख

यीशु के पीछे चलना केवल उसके नाम को मान लेने की बात नहीं है। इसमें अपने आप का इन्कार करना, अपना क्रूस उठाना और उसके पीछे चलना शामिल है। यीशु यहां संसार की उपलब्धियों और आत्मा के वास्तविक मूल्य के बीच स्पष्ट तुलना रखते हैं।

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