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उत्पति अध्याय 7 — बाइबल पाठ, व्याख्या और मुख्य शिक्षाएँ

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1

नूह को जहाज में प्रवेश करने की आज्ञा

पद 1–5

1और यहोवा ने नूह से कहा, तू अपने सारे घराने समेत जहाज में जा; क्योंकि मैं ने इस समय के लोगों में से केवल तुझी को अपनी दृष्टि में धर्मी देखा है। 2सब जाति के शुद्ध पशुओं में से तो तू सात-सात, अर्थात नर और मादा लेना: पर जो पशु शुद्ध नहीं है, उन में से दो-दो लेना, अर्थात नर और मादा: 3और आकाश के पक्षियों में से भी, सात-सात, अर्थात नर और मादा लेना: कि उनका वंश बचकर सारी पृथ्वी के ऊपर बना रहे। 4क्योंकि अब सात दिन और बीतने पर मैं पृथ्वी पर चालीस दिन और चालीस रात तक जल बरसाता रहूंगा; जितनी वस्तुएं मैं ने बनाई हैं सब को भूमि के ऊपर से मिटा दूंगा। 5यहोवा की इस आज्ञा के अनुसार नूह ने किया।

नूह की आज्ञाकारिता

परमेश्वर ने नूह को स्पष्ट निर्देश दिए और नूह ने यहोवा की आज्ञा के अनुसार किया।

2

जलप्रलय का आरम्भ

पद 6–10

6नूह की अवस्था छः सौ वर्ष की थी, जब जलप्रलय पृथ्वी पर आया। 7नूह अपने पुत्रों, पत्नी और बहुओं समेत, जलप्रलय से बचने के लिये जहाज में गया। 8और शुद्ध, और अशुद्ध दोनों प्रकार के पशुओं में से, पक्षियों, 9और भूमि पर रेंगने वालों में से भी, दो-दो, अर्थात नर और मादा, जहाज में नूह के पास गए, जिस प्रकार परमेश्वर ने नूह को आज्ञा दी थी। 10सात दिन के उपरान्त प्रलय का जल पृथ्वी पर आने लगा।

प्रतीक्षा के बाद

परमेश्वर की बताई हुई समय-सीमा पूरी होने के बाद जलप्रलय आरम्भ हुआ। नूह और उसका परिवार पहले ही परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार जहाज में प्रवेश कर चुका था।

3

जलप्रलय और जहाज का बन्द होना

पद 11–16

11जब नूह की अवस्था के छः सौवें वर्ष के दूसरे महीने का सत्तरहवां दिन आया; उसी दिन बड़े गहिरे समुद्र के सब सोते फूट निकले और आकाश के झरोखे खुल गए। 12और वर्षा चालीस दिन और चालीस रात निरन्तर पृथ्वी पर होती रही। 13ठीक उसी दिन नूह अपने पुत्र शेम, हाम, और येपेत, और अपनी पत्नी, और तीनों बहुओं समेत, 14और उनके संग एक-एक जाति के सब बनैले पशु, और एक-एक जाति के सब घरेलू पशु, और एक-एक जाति के सब पृथ्वी पर रेंगने वाले, और एक-एक जाति के सब उड़ने वाले पक्षी, जहाज में गए। 15जितने प्राणियों में जीवन की आत्मा थी उनकी सब जातियों में से दो-दो नूह के पास जहाज में गए। 16और जो गए, वह परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार सब जाति के प्राणियों में से नर और मादा गए। तब यहोवा ने उसका द्वार बन्द कर दिया।

निर्णायक क्षण

जहाज में नूह और उसके परिवार के साथ प्राणी भी प्रवेश कर चुके थे; फिर यहोवा ने जहाज का द्वार बन्द कर दिया।

4

जल का बढ़ना और पृथ्वी का डूबना

पद 17–20

17और पृथ्वी पर चालीस दिन तक प्रलय होता रहा; और पानी बहुत बढ़ता ही गया जिस से जहाज ऊपर को उठने लगा, और वह पृथ्वी पर से ऊंचा उठ गया। 18और जल बढ़ते-बढ़ते पृथ्वी पर बहुत ही बढ़ गया, और जहाज जल के ऊपर-ऊपर तैरता रहा। 19और जल पृथ्वी पर अत्यन्त बढ़ गया, यहां तक कि सारी धरती पर जितने बड़े-बड़े पहाड़ थे, सब डूब गए। 20जल तो पन्द्रह हाथ ऊपर बढ़ गया, और पहाड़ भी डूब गए।

जलप्रलय की व्यापकता

जल लगातार बढ़ता गया और जहाज पृथ्वी से ऊपर उठकर जल के ऊपर तैरता रहा। विवरण में जलप्रलय की व्यापकता को क्रमशः बढ़ते हुए जल के द्वारा दिखाया गया है।

5

पृथ्वी पर प्राणियों का नाश और नूह का बचना

पद 21–24

21और क्या पक्षी, क्या घरेलू पशु, क्या बनैले पशु, और पृथ्वी पर सब चलने वाले प्राणी, और जितने जन्तु पृथ्वी में बहुतायत से भर गए थे, वे सब, और सब मनुष्य मर गए। 22जो जो स्थल पर थे उन में से जितनों के नथनों में जीवन का श्वास था, सब मर मिटे। 23और क्या मनुष्य, क्या पशु, क्या रेंगने वाले जन्तु, क्या आकाश के पक्षी, जो-जो भूमि पर थे, सो सब पृथ्वी पर से मिट गए; केवल नूह, और जितने उसके संग जहाज में थे, वे ही बच गए। 24और जल पृथ्वी पर एक सौ पचास दिन तक प्रबल रहा॥

अध्याय का समापन

जलप्रलय में पृथ्वी पर के प्राणी नाश हुए, परन्तु नूह और उसके साथ जहाज में रहने वाले जीवित बच गए।

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