सब्त के दिन सूखे हाथ वाले मनुष्य की चंगाई
पद 1–61और वह आराधनालय में फिर गया; और वहां एक मनुष्य था, जिस का हाथ सूख गया था। 2और वे उस पर दोष लगाने के लिये उस की घात में लगे हुए थे, कि देखें, वह सब्त के दिन में उसे चंगा करता है कि नहीं। 3उस ने सूखे हाथ वाले मनुष्य से कहा; बीच में खड़ा हो। 4और उन से कहा; क्या सब्त के दिन भला करना उचित है या बुरा करना, प्राण को बचाना या मारना? पर वे चुप रहे।
5और उस ने उन के मन की कठोरता से उदास होकर, उन को क्रोध से चारों ओर देखा, और उस मनुष्य से कहा, अपना हाथ बढ़ा। उस ने बढ़ाया, और उसका हाथ अच्छा हो गया। 6तब फरीसी बाहर जाकर तुरन्त हेरोदियों के साथ उसके विरोध में सम्मति करने लगे, कि उसे किस प्रकार नाश करें॥
“क्या सब्त के दिन भला करना उचित है या बुरा करना, प्राण को बचाना या मारना?”
यीशु ने धार्मिक नियमों की बाहरी व्याख्या से अधिक मनुष्य की भलाई और जीवन के मूल्य को सामने रखा। इस घटना में उनके प्रति विरोध की कठोरता भी स्पष्ट होने लगती है।
झील के किनारे बड़ी भीड़ और यीशु की चंगाई
पद 7–127और यीशु अपने चेलों के साथ झील की ओर चला गया: और गलील से एक बड़ी भीड़ उसके पीछे हो ली। 8और यहूदिया, और यरूशलेम और इदूमिया से, और यरदन के पार, और सूर और सैदा के आसपास से एक बड़ी भीड़ यह सुनकर, कि वह कैसे अचम्भे के काम करता है, उसके पास आई। 9और उस ने अपने चेलों से कहा, भीड़ के कारण एक छोटी नाव मेरे लिये तैयार रहे ताकि वे मुझे दबा न सकें। 10क्योंकि उस ने बहुतों को चंगा किया था; इसलिये जितने लोग रोग से ग्रसित थे, उसे छूने के लिये उस पर गिरे पड़ते थे।
11और अशुद्ध आत्माएं भी, जब उसे देखती थीं, तो उसके आगे गिर पड़ती थीं, और चिल्लाकर कहती थीं कि तू परमेश्वर का पुत्र है। 12और उस ने उन्हें बहुत चिताया, कि मुझे प्रगट न करना॥
“तू परमेश्वर का पुत्र है।”
यीशु की सेवकाई का प्रभाव केवल गलील तक सीमित नहीं रहा। अलग-अलग क्षेत्रों से लोग उनके पास आने लगे, क्योंकि उन्होंने उनकी चंगाई और सामर्थ के कामों के विषय में सुना था।
बारह प्रेरितों की नियुक्ति
पद 13–1913फिर वह पहाड़ पर चढ़ गया, और जिन्हें वह चाहता था उन्हें अपने पास बुलाया; और वे उसके पास चले आए। 14तब उस ने बारह पुरुषों को नियुक्त किया, कि वे उसके साथ साथ रहें, और वह उन्हें भेजे, कि प्रचार करें। 15और दुष्टात्माओं के निकालने का अधिकार रखें। 16और वे ये हैं: शमौन जिस का नाम उस ने पतरस रखा। 17और जब्दी का पुत्र याकूब, और याकूब का भाई यूहन्ना, जिनका नाम उस ने बूअनरिगस, अर्थात गर्जन के पुत्र रखा।
18और अन्द्रियास, और फिलेप्पुस, और बरतुल्मै, और मत्ती, और थोमा, और हलफई का पुत्र याकूब; और तद्दी, और शमौन कनानी। 19और यहूदा इस्करियोती, जिस ने उसे पकड़वा भी दिया॥
“वे उसके साथ साथ रहें, और वह उन्हें भेजे, कि प्रचार करें। और दुष्टात्माओं के निकालने का अधिकार रखें।”
यीशु ने बारहों को केवल काम करने के लिये नहीं चुना; पहले वे उसके साथ रहें, फिर उन्हें प्रचार और सेवकाई के लिये भेजा जाए। संगति और सेवकाई यहां साथ-साथ दिखाई देती हैं।
शैतान के विरुद्ध यीशु का अधिकार
पद 20–3020और वह घर में आया: और ऐसी भीड़ इकट्ठी हो गई, कि वे रोटी भी न खा सके। 21जब उसके कुटुम्बियों ने यह सुना, तो उसे पकड़ने के लिये निकले; क्योंकि कहते थे, कि उसका चित्त ठिकाने नहीं है। 22और शास्त्री जो यरूशलेम से आए थे, यह कहते थे, कि उस में शैतान है, और यह भी, कि वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है। 23और वह उन्हें पास बुलाकर, उन से दृष्टान्तों में कहने लगा; शैतान क्योंकर शैतान को निकाल सकता है? 24और यदि किसी राज्य में फूट पड़े, तो वह राज्य क्योंकर स्थिर रह सकता है? 25और यदि किसी घर में फूट पड़े, तो वह घर क्योंकर स्थिर रह सकेगा?
26और यदि शैतान अपना ही विरोधी होकर अपने में फूट डाले, तो वह क्योंकर बना रह सकता है? उसका तो अन्त ही हो जाता है। 27किन्तु कोई मनुष्य किसी बलवन्त के घर में घुसकर उसका माल लूट नहीं सकता, जब तक कि वह पहिले उस बलवन्त को न बान्ध ले; और तब उसके घर को लूट लेगा। 28मैं तुम से सच कहता हूं, कि मनुष्यों की सन्तान के सब पाप और निन्दा जो वे करते हैं, क्षमा की जाएगी। 29परन्तु जो कोई पवित्रात्मा के विरुद्ध निन्दा करे, वह कभी भी क्षमा न किया जाएगा: वरन वह अनन्त पाप का अपराधी ठहरता है। 30क्योंकि वे यह कहते थे, कि उस में अशुद्ध आत्मा है॥
“परन्तु जो कोई पवित्रात्मा के विरुद्ध निन्दा करे, वह कभी भी क्षमा न किया जाएगा: वरन वह अनन्त पाप का अपराधी ठहरता है।”
इस प्रसंग में यीशु दिखाते हैं कि शैतान अपने ही राज्य को नष्ट करने के लिये स्वयं अपने विरुद्ध नहीं लड़ता। साथ ही, पवित्रात्मा के काम को जान-बूझकर अशुद्ध ठहराने के विषय में वे अत्यन्त गंभीर चेतावनी देते हैं।
यीशु के सच्चे भाई, बहिन और माता
पद 31–3531और उस की माता और उसके भाई आए, और बाहर खड़े होकर उसे बुलवा भेजा। 32और भीड़ उसके आसपास बैठी थी, और उन्होंने उस से कहा; देख, तेरी माता और तेरे भाई बाहर तुझे ढूँढ़ते हैं। 33उस ने उन्हें उत्तर दिया, कि मेरी माता और मेरे भाई कौन हैं? 34और उन पर जो उसके आस पास बैठे थे, दृष्टि करके कहा, देखो, मेरी माता और मेरे भाई यह हैं। 35क्योंकि जो कोई परमेश्वर की इच्छा पर चले, वही मेरा भाई, और बहिन और माता है॥
“क्योंकि जो कोई परमेश्वर की इच्छा पर चले, वही मेरा भाई, और बहिन और माता है॥”
यीशु अपने सच्चे अनुयायियों की पहचान परमेश्वर की इच्छा पर चलने से कराते हैं। उनके लिये परमेश्वर की इच्छा के अनुसार जीना केवल एक धार्मिक विचार नहीं, बल्कि उनके साथ सम्बन्ध की पहचान है।
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