मुख्य सामग्री पर जाएँ
नवीनतम:नए बाइबल अध्ययन, प्रश्नों के उत्तर और प्रशिक्षण सामग्री नियमित रूप से जोड़ी जाती है।देखें →
Apostle Vinod KumarDonate →

मरकुस अध्याय 5 — बाइबल पाठ, व्याख्या और मुख्य शिक्षाएँ

WhatsApp
1

गिरासेनियों के देश में दुष्टात्माओं से ग्रस्त मनुष्य की मुक्ति

पद 1–20

1और वे झील के पार गिरासेनियों के देश में पहुंचे। 2और जब वह नाव पर से उतरा तो तुरन्त एक मनुष्य जिस में अशुद्ध आत्मा थी कब्रों से निकल कर उसे मिला। 3वह कब्रों में रहा करता था। और कोई उसे सांकलों से भी न बान्ध सकता था। 4क्योंकि वह बार बार बेड़ियों और सांकलों से बान्धा गया था, पर उस ने सांकलों को तोड़ दिया, और बेड़ियों के टुकड़े टुकड़े कर दिए थे, और कोई उसे वश में नहीं कर सकता था। 5वह लगातार रात-दिन कब्रों और पहाड़ों में चिल्लाता, और अपने को पत्थरों से घायल करता था। 6वह यीशु को दूर ही से देखकर दौड़ा, और उसे प्रणाम किया। 7और ऊंचे शब्द से चिल्लाकर कहा; हे यीशु, परमप्रधान परमेश्वर के पुत्र, मुझे तुझ से क्या काम? मैं तुझे परमेश्वर की शपथ देता हूं, कि मुझे पीड़ा न दे। 8क्योंकि उस ने उस से कहा था, हे अशुद्ध आत्मा, इस मनुष्य में से निकल आ।

9उस ने उस से पूछा; तेरा क्या नाम है? उस ने उस से कहा; मेरा नाम सेना है; क्योंकि हम बहुत हैं। 10और उस ने उस से बहुत बिनती की, हमें इस देश से बाहर न भेज। 11वहां पहाड़ पर सूअरों का एक बड़ा झुण्ड चर रहा था। 12और उन्होंने उस से बिनती करके कहा, कि हमें उन सूअरों में भेज दे, कि हम उन के भीतर जाएं। 13सो उस ने उन्हें आज्ञा दी और अशुद्ध आत्मा निकलकर सूअरों के भीतर पैठ गई और झुण्ड, जो कोई दो हजार का था, कगार पर से झपटकर झील में जा पड़ा, और डूब मरा।

14और उन के चरवाहों ने भागकर नगर और गांवों में समाचार सुनाया। 15और जो हुआ था, लोग उसे देखने आए। और यीशु के पास आकर, वे उस को जिस में दुष्टात्माएं थीं, अर्थात जिस में सेना समाई थी, कपड़े पहिने और सचेत बैठे देखकर, डर गए। 16और देखने वालों ने उसका जिस में दुष्टात्माएं थीं, और सूअरों का पूरा हाल, उन को कह सुनाया। 17और वे उस से बिनती कर के कहने लगे, कि हमारे सिवानों से चला जा।

18और जब वह नाव पर चढ़ने लगा, तो वह जिस में पहिले दुष्टात्माएं थीं, उस से बिनती करने लगा, कि मुझे अपने साथ रहने दे। 19परन्तु उस ने उसे आज्ञा न दी, और उस से कहा, अपने घर जाकर अपने लोगों को बता, कि तुझ पर दया करके प्रभु ने तेरे लिये कैसे बड़े काम किए हैं। 20वह जाकर दिकपुलिस में इस बात का प्रचार करने लगा, कि यीशु ने मेरे लिये कैसे बड़े काम किए; और सब अचम्भा करते थे॥

विशेष वचन · पद 19

“अपने घर जाकर अपने लोगों को बता, कि तुझ पर दया करके प्रभु ने तेरे लिये कैसे बड़े काम किए हैं।”

आज के लिये सीख

यीशु ने उस व्यक्ति को अपने साथ रहने देने के बजाय उसे अपने घर और अपने लोगों के पास भेजा, ताकि वह अपनी मुक्ति और प्रभु की दया की गवाही दे। व्यक्तिगत अनुभव को गवाही में बदलने की यह एक सुंदर तस्वीर है।

2

याईर की बेटी और बारह वर्ष से बीमार स्त्री

पद 21–34

21जब यीशु फिर नाव से पार गया, तो एक बड़ी भीड़ उसके पास इकट्ठी हो गई; और वह झील के किनारे था। 22और याईर नाम आराधनालय के सरदारों में से एक आया, और उसे देखकर, उसके पांवों पर गिरा। 23और उस ने यह कहकर बहुत बिनती की, कि मेरी छोटी बेटी मरने पर है: तू आकर उस पर हाथ रख, कि वह चंगी होकर जीवित रहे। 24तब वह उसके साथ चला; और बड़ी भीड़ उसके पीछे हो ली, यहां तक कि लोग उस पर गिरे पड़ते थे॥ 25और एक स्त्री, जिस को बारह वर्ष से लोहू बहने का रोग था। 26और जिस ने बहुत वैद्यों से बड़ा दुख उठाया और अपना सब माल व्यय करने पर भी कुछ लाभ न उठाया था, परन्तु और भी रोगी हो गई थी।

27यीशु की चर्चा सुनकर, भीड़ में उसके पीछे से आई, और उसके वस्त्र को छू लिया। 28क्योंकि वह कहती थी, यदि मैं उसके वस्त्र ही को छू लूंगी, तो चंगी हो जाऊंगी। 29और तुरन्त उसका लोहू बहना बन्द हो गया; और उस ने अपनी देह में जान लिया, कि मैं उस बीमारी से अच्छी हो गई। 30यीशु ने तुरन्त अपने में जान लिया, कि मुझ में से सामर्थ निकली है, और भीड़ में पीछे फिरकर पूछा; मेरा वस्त्र किस ने छूआ? 31उसके चेलों ने उस से कहा; तू देखता है, कि भीड़ तुझ पर गिरी पड़ती है, और तू कहता है; कि किस ने मुझे छुआ?

32तब उस ने उसे देखने के लिये जिस ने यह काम किया था, चारों ओर दृष्टि की। 33तब वह स्त्री यह जानकर, कि मेरी कैसी भलाई हुई है, डरती और कांपती हुई आई, और उसके पांवों पर गिरकर, उस से सब हाल सच सच कह दिया। 34उस ने उस से कहा; पुत्री तेरे विश्वास ने तुझे चंगा किया है: कुशल से जा, और अपनी इस बीमारी से बची रह॥

विशेष वचन · पद 34

“पुत्री तेरे विश्वास ने तुझे चंगा किया है: कुशल से जा, और अपनी इस बीमारी से बची रह॥”

गहराई से समझें

इस घटना में स्त्री ने भीड़ के बीच से यीशु के वस्त्र को छुआ और चंगाई पाई। यीशु ने केवल चंगाई होने पर बात समाप्त नहीं की, बल्कि उस स्त्री को सामने आने और उसके विश्वास को सार्वजनिक रूप से संबोधित किया।

3

याईर की बेटी को जिलाना

पद 35–43

35वह यह कह ही रहा था, कि आराधनालय के सरदार के घर से लोगों ने आकर कहा, कि तेरी बेटी तो मर गई; अब गुरु को क्यों दुख देता है? 36जो बात वे कह रहे थे, उस को यीशु ने अनसुनी करके, आराधनालय के सरदार से कहा; मत डर; केवल विश्वास रख। 37और उस ने पतरस और याकूब और याकूब के भाई यूहन्ना को छोड़, और किसी को अपने साथ आने न दिया। 38और आराधनालय के सरदार के घर में पहुंचकर, उस ने लोगों को बहुत रोते और चिल्लाते देखा। 39तब उस ने भीतर जाकर उस से कहा, तुम क्यों हल्ला मचाते और रोते हो? लड़की मरी नहीं, परन्तु सो रही है।

40वे उस की हंसी करने लगे, परन्तु उस ने सब को निकालकर लड़की के माता-पिता और अपने साथियों को लेकर, भीतर जहां लड़की पड़ी थी, गया। 41और लड़की का हाथ पकड़कर उस से कहा, ‘तलीता कूमी’; जिस का अर्थ यह है कि ‘हे लड़की, मैं तुझ से कहता हूं, उठ’। 42और लड़की तुरन्त उठकर चलने फिरने लगी; क्योंकि वह बारह वर्ष की थी। और इस पर लोग बहुत चकित हो गए। 43फिर उस ने उन्हें चिताकर आज्ञा दी कि यह बात कोई जानने न पाए और कहा; कि उसे कुछ खाने को दिया जाए॥

विश्वास का वचन · पद 36

“मत डर; केवल विश्वास रख।”

आज के लिये सीख

जब परिस्थिति मानवीय दृष्टि से समाप्त दिखाई दे रही थी, तब यीशु ने याईर से डरने के बजाय विश्वास रखने को कहा। अध्याय की यह घटना विश्वास, आशा और यीशु के जीवन पर अधिकार को एक साथ सामने लाती है।

सेवकाई में सहभागी बनें

परमेश्वर के वचन को और लोगों तक पहुँचाएँ

यदि इस सेवकाई के द्वारा आपको परमेश्वर के वचन से आशीष मिली है, तो आपका सहयोग इस संदेश को और लोगों तक पहुँचाने में सहायता कर सकता है।

सेवकाई में सहयोग करें
बाइबल शिक्षा और अधिक लोगों तक
ऑनलाइन सेवकाई विस्तार करने में सहायता
मसीही वीडियो अधिक भाषाओं में
इस लेख के शिक्षक

Apostle Vinod Kumar

हिंदी में बाइबल अध्ययन और मसीही शिक्षाओं के माध्यम से लोगों की सेवा।

सेवकाई और परिचय पढ़ें →
AVK Knowledge Map

इस विषय से जुड़े अध्ययन

बातचीत में शामिल हों

0 टिप्पणियाँ

इस लेख पर नई टिप्पणियाँ अभी बंद हैं, लेकिन पहले की बातचीत पढ़ी जा सकती है।
अगला अध्ययनइस विषय से जुड़े और लेख पढ़ें
और खोजें →