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उत्पति अध्याय 6 — बाइबल पाठ, व्याख्या और मुख्य शिक्षाएँ

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1

मनुष्य की बढ़ती बुराई और परमेश्वर का दुःख

पद 1–8

1फिर जब मनुष्य भूमि के ऊपर बहुत बढ़ने लगे, और उनके बेटियां उत्पन्न हुई, 2तब परमेश्वर के पुत्रों ने मनुष्य की पुत्रियों को देखा, कि वे सुन्दर हैं; सो उन्होंने जिस जिस को चाहा उन से ब्याह कर लिया। 3और यहोवा ने कहा, मेरा आत्मा मनुष्य से सदा लौ विवाद करता न रहेगा, क्योंकि मनुष्य भी शरीर ही है: उसकी आयु एक सौ बीस वर्ष की होगी। 4उन दिनों में पृथ्वी पर दानव रहते थे; और इसके पश्चात जब परमेश्वर के पुत्र मनुष्य की पुत्रियों के पास गए तब उनके द्वारा जो सन्तान उत्पन्न हुए, वे पुत्र शूरवीर होते थे, जिनकी कीर्ति प्राचीन काल से प्रचलित है। 5और यहोवा ने देखा, कि मनुष्यों की बुराई पृथ्वी पर बढ़ गई है, और उनके मन के विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है सो निरन्तर बुरा ही होता है। 6और यहोवा पृथ्वी पर मनुष्य को बनाने से पछताया, और वह मन में अति खेदित हुआ। 7तब यहोवा ने सोचा, कि मैं मनुष्य को जिसकी मैं ने सृष्टि की है पृथ्वी के ऊपर से मिटा दूंगा; क्या मनुष्य, क्या पशु, क्या रेंगने वाले जन्तु, क्या आकाश के पक्षी, सब को मिटा दूंगा क्योंकि मैं उनके बनाने से पछताता हूं। 8परन्तु यहोवा के अनुग्रह की दृष्टि नूह पर बनी रही॥

मुख्य मोड़

मनुष्य की बढ़ती हुई बुराई के बीच भी नूह पर यहोवा के अनुग्रह की दृष्टि बनी रही।

2

नूह धर्मी पुरुष और परमेश्वर के साथ चलने वाला

पद 9–12

9नूह की वंशावली यह है। नूह धर्मी पुरुष और अपने समय के लोगों में खरा था, और नूह परमेश्वर ही के साथ-साथ चलता रहा। 10और नूह से, शेम, और हाम, और येपेत नाम, तीन पुत्र उत्पन्न हुए। 11उस समय पृथ्वी परमेश्वर की दृष्टि में बिगड़ गई थी, और उपद्रव से भर गई थी। 12और परमेश्वर ने पृथ्वी पर जो दृष्टि की तो क्या देखा, कि वह बिगड़ी हुई है; क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपनी अपनी चाल चलन बिगाड़ ली थी।

नूह की विशेषता

जिस समय पृथ्वी बिगाड़ और उपद्रव से भर गई थी, उसी समय नूह का परिचय धर्मी और अपने समय के लोगों में खरे व्यक्ति के रूप में दिया गया है।

3

जलप्रलय की घोषणा और जहाज बनाने की आज्ञा

पद 13–16

13तब परमेश्वर ने नूह से कहा, सब प्राणियों के अन्त करने का प्रश्न मेरे साम्हने आ गया है; क्योंकि उनके कारण पृथ्वी उपद्रव से भर गई है, इसलिये मैं उन को पृथ्वी समेत नाश कर डालूंगा। 14इसलिये तू गोपेर वृक्ष की लकड़ी का एक जहाज बना ले, उस में कोठरियां बनाना, और भीतर बाहर उस पर राल लगाना। 15और इस ढंग से उसको बनाना: जहाज की लम्बाई तीन सौ हाथ, चौड़ाई पचास हाथ, और ऊंचाई तीस हाथ की हो। 16जहाज में एक खिड़की बनाना, और इसके एक हाथ ऊपर से उसकी छत बनाना, और जहाज की एक अलंग में एक द्वार रखना, और जहाज में पहिला, दूसरा, तीसरा खण्ड बनाना।

परमेश्वर की आज्ञा

नूह को केवल आने वाले जलप्रलय के विषय में चेतावनी नहीं दी गई, बल्कि जहाज के निर्माण के लिये उसकी लकड़ी, आकार, खिड़की, द्वार और खण्डों तक का निर्देश दिया गया।

4

जलप्रलय और नूह के साथ वाचा

पद 17–18

17और सुन, मैं आप पृथ्वी पर जलप्रलय करके सब प्राणियों को, जिन में जीवन की आत्मा है, आकाश के नीचे से नाश करने पर हूं: और सब जो पृथ्वी पर हैं मर जाएंगे। 18परन्तु तेरे संग मैं वाचा बान्धता हूं: इसलिये तू अपने पुत्रों, स्त्री, और बहुओं समेत जहाज में प्रवेश करना।

वाचा

न्याय की घोषणा के बीच परमेश्वर नूह के साथ वाचा बाँधने की बात कहता है। यही वाचा आगे जहाज में प्रवेश करने और नूह के परिवार की रक्षा के निर्देश से जुड़ती है।

5

जीव-जन्तुओं और भोजन की तैयारी

पद 19–22

19और सब जीवित प्राणियों में से, तू एक-एक जाति के दो-दो, अर्थात एक नर और एक मादा जहाज में ले जा कर, अपने साथ जीवित रखना। 20एक-एक जाति के पक्षी, और एक-एक जाति के पशु, और एक-एक जाति के भूमि पर रेंगने वाले, सब में से दो-दो तेरे पास आएंगे, कि तू उन को जीवित रखे। 21और भांति भांति का भोज्य पदार्थ जो खाया जाता है, उन को तू ले कर अपने पास इकट्ठा कर रखना सो तेरे और उनके भोजन के लिये होगा। 22परमेश्वर की इस आज्ञा के अनुसार नूह ने किया।

नूह की आज्ञाकारिता

अध्याय का अन्त इस स्पष्ट वाक्य के साथ होता है कि नूह ने परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार किया।

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