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उत्पत्ति अध्याय 26 — बाइबल पाठ, व्याख्या और मुख्य शिक्षाएँ

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1

इसहाक को परमेश्वर की प्रतिज्ञा और गरार में उसका निवास

पद 1–6

1और उस देश में अकाल पड़ा, वह उस पहिले अकाल से अलग था जो इब्राहीम के दिनों में पड़ा था। सो इसहाक गरार को पलिश्तियों के राजा अबीमेलेक के पास गया। 2वहां यहोवा ने उसको दर्शन देकर कहा, मिस्र में मत जा; जो देश मैं तुझे बताऊं उसी में रह। 3तू इसी देश में रह, और मैं तेरे संग रहूंगा, और तुझे आशीष दूंगा; और ये सब देश मैं तुझ को, और तेरे वंश को दूंगा; और जो शपथ मैं ने तेरे पिता इब्राहीम से खाई थी, उसे मैं पूरी करूंगा।

4और मैं तेरे वंश को आकाश के तारागण के समान करूंगा। और मैं तेरे वंश को ये सब देश दूंगा, और पृथ्वी की सारी जातियां तेरे वंश के कारण अपने को धन्य मानेंगी। 5क्योंकि इब्राहीम ने मेरी मानी, और जो मैं ने उसे सौंपा था उसको और मेरी आज्ञाओं विधियों, और व्यवस्था का पालन किया। 6सो इसहाक गरार में रह गया।

2

रिबका के विषय में इसहाक का भय और अबीमेलेक की चेतावनी

पद 7–11

7जब उस स्थान के लोगों ने उसकी पत्नी के विषय में पूछा, तब उसने यह सोच कर कि यदि मैं उसको अपनी पत्नी कहूं, तो यहां के लोग रिबका के कारण जो परमसुन्दरी है मुझ को मार डालेंगे, उत्तर दिया, वह तो मेरी बहिन है। 8जब उसको वहां रहते बहुत दिन बीत गए, तब एक दिन पलिश्तियों के राजा अबीमेलेक ने खिड़की में से झांक के क्या देखा, कि इसहाक अपनी पत्नी रिबका के साथ क्रीड़ा कर रहा है।

9तब अबीमेलेक ने इसहाक को बुलवा कर कहा, वह तो निश्चय तेरी पत्नी है; फिर तू ने क्योंकर उसको अपनी बहिन कहा? इसहाक ने उत्तर दिया, मैं ने सोचा था, कि ऐसा न हो कि उसके कारण मेरी मृत्यु हो। 10अबीमेलेक ने कहा, तू ने हम से यह क्या किया? ऐसे तो प्रजा में से कोई तेरी पत्नी के साथ सहज से कुकर्म कर सकता, और तू हम को पाप में फंसाता। 11और अबीमेलेक ने अपनी सारी प्रजा को आज्ञा दी, कि जो कोई उस पुरुष को वा उस स्त्री को छूएगा, सो निश्चय मार डाला जाएगा।

3

इसहाक की समृद्धि और कुओं के लिये संघर्ष

पद 12–22

12फिर इसहाक ने उस देश में जोता बोया, और उसी वर्ष में सौ गुणा फल पाया: और यहोवा ने उसको आशीष दी। 13और वह बढ़ा और उसकी उन्नति होती चली गई, यहां तक कि वह अति महान पुरुष हो गया। 14जब उसके भेड़-बकरी, गाय-बैल, और बहुत से दास-दासियां हुई, तब पलिश्ती उससे डाह करने लगे। 15सो जितने कुओं को उसके पिता इब्राहीम के दासों ने इब्राहीम के जीते जी खोदा था, उन को पलिश्तियों ने मिट्टी से भर दिया। 16तब अबीमेलेक ने इसहाक से कहा, हमारे पास से चला जा; क्योंकि तू हम से बहुत सामर्थी हो गया है।

17सो इसहाक वहां से चला गया, और गरार के नाले में तम्बू खड़ा करके वहां रहने लगा। 18तब जो कुएं उसके पिता इब्राहीम के दिनों में खोदे गए थे, और इब्राहीम के मरने के पीछे पलिश्तियों ने भर दिए थे, उन को इसहाक ने फिर से खुदवाया; और उनके वे ही नाम रखे, जो उसके पिता ने रखे थे। 19फिर इसहाक के दासों को नाले में खोदते खोदते बहते जल का एक सोता मिला। 20तब गरारी चरवाहों ने इसहाक के चरवाहों से झगड़ा किया, और कहा, कि यह जल हमारा है। सो उसने उस कुएं का नाम एसेक रखा इसलिये कि वे उससे झगड़े थे।

21फिर उन्होंने दूसरा कुआं खोदा; और उन्होंने उसके लिये भी झगड़ा किया, सो उसने उसका नाम सित्रा रखा। 22तब उसने वहां से कूच करके एक और कुआं खुदवाया; और उसके लिये उन्होंने झगड़ा न किया; सो उसने उसका नाम यह कह कर रहोबोत रखा, कि अब तो यहोवा ने हमारे लिये बहुत स्थान दिया है, और हम इस देश में फूलें-फलेंगे।

4

बेर्शेबा में वेदी और परमेश्वर की प्रतिज्ञा

पद 23–25

23वहां से वह बेर्शेबा को गया। 24और उसी दिन यहोवा ने रात को उसे दर्शन देकर कहा, मैं तेरे पिता इब्राहीम का परमेश्वर हूं; मत डर, क्योंकि मैं तेरे साथ हूं, और अपने दास इब्राहीम के कारण तुझे आशीष दूंगा, और तेरा वंश बढ़ाऊंगा। 25तब उसने वहां एक वेदी बनाई, और यहोवा से प्रार्थना की, और अपना तम्बू वहीं खड़ा किया; और वहां इसहाक के दासों ने एक कुआं खोदा।

5

अबीमेलेक के साथ वाचा और शान्ति

पद 26–33

26तब अबीमेलेक अपने मित्र अहुज्जत, और अपने सेनापति पीकोल को संग ले कर, गरार से उसके पास गया। 27इसहाक ने उन से कहा, तुम ने मुझ से बैर करके अपने बीच से निकाल दिया था; सो अब मेरे पास क्यों आए हो? 28उन्होंने कहा, हम ने तो प्रत्यक्ष देखा है, कि यहोवा तेरे साथ रहता है: सो हम ने सोचा, कि तू तो यहोवा की ओर से धन्य है, सो हमारे तेरे बीच में शपथ खाई जाए, और हम तुझ से इस विषय की वाचा बन्धाएं;

29कि जैसे हम ने तुझे नहीं छूआ, वरन तेरे साथ निरी भलाई की है, और तुझ को कुशल क्षेम से विदा किया, उसके अनुसार तू भी हम से कोई बुराई न करेगा। 30तब उसने उनकी जेवनार की, और उन्होंने खाया पिया। 31बिहान को उन सभों ने तड़के उठ कर आपस में शपथ खाई; तब इसहाक ने उन को विदा किया, और वे कुशल क्षेम से उसके पास से चले गए। 32उसी दिन इसहाक के दासों ने आकर अपने उस खोदे हुए कुएं का वृत्तान्त सुना के कहा, कि हम को जल का एक सोता मिला है। 33तब उसने उसका नाम शिबा रखा: इसी कारण उस नगर का नाम आज तक बेर्शेबा पड़ा है॥

6

ऐसाव के विवाह से इसहाक और रिबका को खेद

पद 34–35

34जब ऐसाव चालीस वर्ष का हुआ, तब उसने हित्ती बेरी की बेटी यहूदीत, और हित्ती एलोन की बेटी बाशमत को ब्याह लिया। 35और इन स्त्रियों के कारण इसहाक और रिबका के मन को खेद हुआ॥

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