यीशु ने कोढ़ी को शुद्ध किया
पद 1–41जब वह उस पहाड़ से उतरा, तो एक बड़ी भीड़ उसके पीछे हो ली। 2और देखो, एक कोढ़ी ने पास आकर उसे प्रणाम किया और कहा; कि हे प्रभु यदि तू चाहे, तो मुझे शुद्ध कर सकता है। 3यीशु ने हाथ बढ़ाकर उसे छूआ, और कहा, मैं चाहता हूं, तू शुद्ध हो जा और वह तुरन्त कोढ़ से शुद्ध हो गया। 4यीशु ने उस से कहा; देख, किसी से न कहना परन्तु जाकर अपने आप को याजक को दिखला और जो चढ़ावा मूसा ने ठहराया है उसे चढ़ा, ताकि उन के लिये गवाही हो।
“मैं चाहता हूं, तू शुद्ध हो जा”
इस घटना में यीशु केवल सामर्थ्यवान ही नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की ओर हाथ बढ़ाने वाले प्रभु के रूप में दिखाई देते हैं जिसे समाज से दूर रखा जाता था।
सूबेदार का विश्वास और उसके सेवक की चंगाई
पद 5–135और जब वह कफरनहूम में आया तो एक सूबेदार ने उसके पास आकर उस से बिनती की। 6कि हे प्रभु, मेरा सेवक घर में झोले का मारा बहुत दुखी पड़ा है। 7उस ने उस से कहा; मैं आकर उसे चंगा करूंगा। 8सूबेदार ने उत्तर दिया; कि हे प्रभु मैं इस योग्य नहीं, कि तू मेरी छत के तले आए, पर केवल मुख से कह दे तो मेरा सेवक चंगा हो जाएगा। 9क्योंकि मैं भी पराधीन मनुष्य हूं, और सिपाही मेरे हाथ में हैं, और जब एक से कहता हूं, जा, तो वह जाता है; और दूसरे को कि आ, तो वह आता है; और अपने दास से कहता हूं, कि यह कर, तो वह करता है।
“हे प्रभु मैं इस योग्य नहीं, कि तू मेरी छत के तले आए, पर केवल मुख से कह दे तो मेरा सेवक चंगा हो जाएगा।”
10यह सुनकर यीशु ने अचम्भा किया, और जो उसके पीछे आ रहे थे उन से कहा; मैं तुम से सच कहता हूं, कि मैं ने इस्राएल में भी ऐसा विश्वास नहीं पाया। 11और मैं तुम से कहता हूं, कि बहुतेरे पूर्व और पश्चिम से आकर इब्राहीम और इसहाक और याकूब के साथ स्वर्ग के राज्य में बैठेंगे। 12परन्तु राज्य के सन्तान बाहर अन्धियारे में डाल दिए जाएंगे: वहां रोना और दांतों का पीसना होगा। 13और यीशु ने सूबेदार से कहा, जा; जैसा तेरा विश्वास है, वैसा ही तेरे लिये हो: और उसका सेवक उसी घड़ी चंगा हो गया॥
सूबेदार ने यीशु की सामर्थ्य को अपनी आंखों से देखने की शर्त नहीं रखी। उसका विश्वास यीशु के अधिकार और वचन पर था। यह विश्वास की एक महत्वपूर्ण तस्वीर है—प्रभु के वचन पर भरोसा करना।
पतरस की सास और बहुत से बीमारों की चंगाई
पद 14–1714और यीशु ने पतरस के घर में आकर उस की सास को ज्वर में पड़ी देखा। 15उस ने उसका हाथ छूआ और उसका ज्वर उतर गया; और वह उठकर उस की सेवा करने लगी। 16जब संध्या हुई तब वे उसके पास बहुत से लोगों को लाए जिन में दुष्टात्माएं थीं और उस ने उन आत्माओं को अपने वचन से निकाल दिया, और सब बीमारों को चंगा किया। 17ताकि जो वचन यशायाह भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा गया था वह पूरा हो, कि उस ने आप हमारी दुर्बलताओं को ले लिया और हमारी बीमारियों को उठा लिया॥
“उस ने आप हमारी दुर्बलताओं को ले लिया और हमारी बीमारियों को उठा लिया”
मत्ती इस घटनाक्रम को यशायाह भविष्यद्वक्ता के वचन की पूर्ति के रूप में प्रस्तुत करता है। यहाँ यीशु की चंगाई की सेवकाई को भविष्यद्वाणी से जोड़ा गया है।
यीशु के पीछे चलने की कीमत
पद 18–2218यीशु ने अपनी चारों ओर एक बड़ी भीड़ देखकर उस पार जाने की आज्ञा दी। 19और एक शास्त्री ने पास आकर उस से कहा, हे गुरू, जहां कहीं तू जाएगा, मैं तेरे पीछे पीछे हो लूंगा। 20यीशु ने उस से कहा, लोमड़ियों के भट और आकाश के पक्षियों के बसेरे होते हैं; परन्तु मनुष्य के पुत्र के लिये सिर धरने की भी जगह नहीं है।
“परन्तु मनुष्य के पुत्र के लिये सिर धरने की भी जगह नहीं है।”
21एक और चेले ने उस से कहा, हे प्रभु, मुझे पहिले जाने दे, कि अपने पिता को गाड़ दूं। 22यीशु ने उस से कहा, तू मेरे पीछे हो ले; और मुरदों को अपने मुरदे गाड़ने दे॥
इस भाग में यीशु के पीछे चलने को केवल भावनात्मक उत्साह नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं और समर्पण से जुड़ा हुआ जीवन दिखाया गया है।
यीशु ने तूफान को शान्त किया
पद 23–2723जब वह नाव पर चढ़ा, तो उसके चेले उसके पीछे हो लिए। 24और देखो, झील में एक ऐसा बड़ा तूफान उठा कि नाव लहरों से ढंपने लगी; और वह सो रहा था। 25तब उन्होंने पास आकर उसे जगाया, और कहा, हे प्रभु, हमें बचा, हम नाश हुए जाते हैं। 26उस ने उन से कहा; हे अल्पविश्वासियों, क्यों डरते हो? तब उस ने उठकर आन्धी और पानी को डांटा, और सब शान्त हो गया।
“हे अल्पविश्वासियों, क्यों डरते हो?”
27और लोग अचम्भा करके कहने लगे कि यह कैसा मनुष्य है, कि आन्धी और पानी भी उस की आज्ञा मानते हैं।
इस घटना में शिष्यों का प्रश्न केवल तूफान के शान्त होने पर आश्चर्य नहीं है; वे यीशु के अधिकार को पहचानने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं—आन्धी और पानी भी उसकी आज्ञा मानते हैं।
गदरेनियों के देश में दुष्टात्माओं से ग्रस्त मनुष्य
पद 28–3428जब वह उस पार गदरेनियों के देश में पहुंचा, तो दो मनुष्य जिन में दुष्टात्माएं थीं कब्रों से निकलते हुए उसे मिले, जो इतने प्रचण्ड थे, कि कोई उस मार्ग से जा नहीं सकता था। 29और देखो, उन्होंने चिल्लाकर कहा; हे परमेश्वर के पुत्र, हमारा तुझ से क्या काम? क्या तू समय से पहिले हमें दु:ख देने यहां आया है? 30उन से कुछ दूर बहुत से सूअरों का एक झुण्ड चर रहा था। 31दुष्टात्माओं ने उस से यह कहकर बिनती की, कि यदि तू हमें निकालता है, तो सूअरों के झुण्ड में भेज दे।
“हे परमेश्वर के पुत्र, हमारा तुझ से क्या काम?”
32उस ने उन से कहा, जाओ, वे निकलकर सूअरों में पैठ गए और देखो, सारा झुण्ड कड़ाड़े पर से झपटकर पानी में जा पड़ा और डूब मरा। 33और चरवाहे भागे, और नगर में जाकर ये सब बातें और जिन में दुष्टात्माएं थीं उन का सारा हाल कह सुनाया। 34और देखो, सारे नगर के लोग यीशु से भेंट करने को निकल आए और उसे देखकर बिनती की, कि हमारे सिवानों से बाहर निकल जा॥
अध्याय का यह अंतिम दृश्य एक गंभीर प्रतिक्रिया दिखाता है: यीशु की सामर्थ्य को देखकर नगर के लोग उसके पास आने के बजाय उससे अपने सिवानों से बाहर निकल जाने की बिनती करते हैं।
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