दोष लगाने के बजाय पहले स्वयं को देखना
पद 1–61दोष मत लगाओ, कि तुम पर भी दोष न लगाया जाए। 2क्योंकि जिस प्रकार तुम दोष लगाते हो, उसी प्रकार तुम पर भी दोष लगाया जाएगा; और जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिये भी नापा जाएगा।
3तू क्यों अपने भाई की आंख के तिनके को देखता है, और अपनी आंख का लट्ठा तुझे नहीं सूझता? 4और जब तेरी ही आंख में लट्ठा है, तो तू अपने भाई से क्योंकर कह सकता है, कि ला मैं तेरी आंख से तिनका निकाल दूं। 5हे कपटी, पहले अपनी आंख में से लट्ठा निकाल ले, तब तू अपने भाई की आंख का तिनका भली भांति देखकर निकाल सकेगा॥
“हे कपटी, पहले अपनी आंख में से लट्ठा निकाल ले, तब तू अपने भाई की आंख का तिनका भली भांति देखकर निकाल सकेगा॥”
6पवित्र वस्तु कुत्तों को न दो, और अपने मोती सूअरों के आगे मत डालो; ऐसा न हो कि वे उन्हें पांवों तले रौंदें और पलट कर तुम को फाड़ डालें॥
यीशु दूसरों की गलतियों को पहचानने से पहले आत्म-परीक्षण की शिक्षा देते हैं। अध्याय की शुरुआत में “दोष मत लगाओ” के साथ-साथ आगे चलकर विवेक की आवश्यकता भी दिखाई देती है; इसलिए यह अंधी स्वीकृति नहीं, बल्कि सही दृष्टि की शिक्षा है।
मांगो, ढूंढ़ो और खटखटाओ
पद 7–117मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूंढ़ो, तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा। 8क्योंकि जो कोई मांगता है, उसे मिलता है; और जो ढूंढ़ता है, वह पाता है और जो खटखटाता है, उसके लिये खोला जाएगा।
“मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूंढ़ो, तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा।”
9तुम में से ऐसा कौन मनुष्य है, कि यदि उसका पुत्र उस से रोटी मांगे, तो वह उसे पत्थर दे? 10वा मछली मांगे, तो उसे सांप दे? 11सो जब तुम बुरे होकर, अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएं देना जानते हो, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने मांगने वालों को अच्छी वस्तुएं क्यों न देगा?
यहां यीशु प्रार्थना को एक पिता और उसके बच्चों के संबंध के उदाहरण से समझाते हैं। मनुष्य अपने बच्चों की आवश्यकताओं को समझता है; उससे कहीं अधिक परमेश्वर अपने मांगने वालों के प्रति भलाई रखता है।
स्वर्णिम नियम और जीवन के दो मार्ग
पद 12–1412इस कारण जो कुछ तुम चाहते हो, कि मनुष्य तुम्हारे साथ करें, तुम भी उन के साथ वैसा ही करो; क्योंकि व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा यही है॥
“जो कुछ तुम चाहते हो, कि मनुष्य तुम्हारे साथ करें, तुम भी उन के साथ वैसा ही करो।”
13सकेत फाटक से प्रवेश करो, क्योंकि चौड़ा है वह फाटक और चौड़ा है वह मार्ग जो विनाश को पहुंचाता है; और बहुतेरे हैं जो उस से प्रवेश करते हैं। 14क्योंकि सकेत है वह फाटक और सकरा है वह मार्ग जो जीवन को पहुंचाता है, और थोड़े हैं जो उसे पाते हैं॥
यीशु यहां दो विपरीत मार्गों का चित्र देते हैं—एक चौड़ा मार्ग जो विनाश की ओर जाता है और दूसरा सकरा मार्ग जो जीवन की ओर ले जाता है। यह चुनाव और दिशा की गंभीरता को सामने रखता है।
झूठे भविष्यद्वक्ताओं को उनके फलों से पहचानना
पद 15–2015झूठे भविष्यद्वक्ताओं से सावधान रहो, जो भेड़ों के भेष में तुम्हारे पास आते हैं, परन्तु अन्तर में फाड़ने वाले भेड़िए हैं। 16उन के फलों से तुम उन्हें पहचान लोगे क्या झाड़ियों से अंगूर, वा ऊंटकटारों से अंजीर तोड़ते हैं?
17इसी प्रकार हर एक अच्छा पेड़ अच्छा फल लाता है और निकम्मा पेड़ बुरा फल लाता है। 18अच्छा पेड़ बुरा फल नहीं ला सकता, और न निकम्मा पेड़ अच्छा फल ला सकता है। 19जो जो पेड़ अच्छा फल नहीं लाता, वह काटा और आग में डाला जाता है। 20सो उन के फलों से तुम उन्हें पहचान लोगे।
“उन के फलों से तुम उन्हें पहचान लोगे।”
किसी व्यक्ति की पहचान केवल उसके बाहरी रूप या दावों से नहीं, बल्कि उसके “फलों” से करने की शिक्षा दी गई है। यीशु ने यहां discernment के लिये एक व्यावहारिक कसौटी दी है।
केवल “हे प्रभु” कहना पर्याप्त नहीं
पद 21–2321जो मुझ से, हे प्रभु, हे प्रभु कहता है, उन में से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है।
“परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है।”
22उस दिन बहुतेरे मुझ से कहेंगे; हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत अचम्भे के काम नहीं किए? 23तब मैं उन से खुलकर कह दूंगा कि मैं ने तुम को कभी नहीं जाना, हे कुकर्म करने वालों, मेरे पास से चले जाओ।
इस भाग में यीशु बाहरी धार्मिक गतिविधियों और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार जीवन जीने के बीच अंतर दिखाते हैं। केवल धार्मिक शब्द या बड़े काम अपने आप में पर्याप्त प्रमाण नहीं बताए गए हैं।
चट्टान पर बना घर और सुनकर मानने वाला जीवन
पद 24–2724इसलिये जो कोई मेरी ये बातें सुनकर उन्हें मानता है वह उस बुद्धिमान मनुष्य की नाईं ठहरेगा जिस ने अपना घर चट्टान पर बनाया। 25और मेंह बरसा और बाढ़ें आईं, और आन्धियां चलीं, और उस घर पर टक्करें लगीं, परन्तु वह नहीं गिरा, क्योंकि उस की नेव चट्टान पर डाली गई थी।
“जो कोई मेरी ये बातें सुनकर उन्हें मानता है वह उस बुद्धिमान मनुष्य की नाईं ठहरेगा जिस ने अपना घर चट्टान पर बनाया।”
26परन्तु जो कोई मेरी ये बातें सुनता है और उन पर नहीं चलता वह उस निर्बुद्धि मनुष्य की नाईं ठहरेगा जिस ने अपना घर बालू पर बनाया। 27और मेंह बरसा, और बाढ़ें आईं, और आन्धियां चलीं, और उस घर पर टक्करें लगीं और वह गिरकर सत्यानाश हो गया॥
यीशु के उदाहरण में दोनों घरों पर एक जैसी वर्षा, बाढ़ और आन्धियां आती हैं। अंतर परिस्थितियों में नहीं, बल्कि नींव में है। सुनना और मानना जीवन की नींव को स्थिर बनाता है।
यीशु की शिक्षा का अधिकार
पद 28–2928जब यीशु ये बातें कह चुका, तो ऐसा हुआ कि भीड़ उसके उपदेश से चकित हुई। 29क्योंकि वह उन के शास्त्रियों के समान नहीं परन्तु अधिकारी की नाईं उन्हें उपदेश देता था॥
“क्योंकि वह उन के शास्त्रियों के समान नहीं परन्तु अधिकारी की नाईं उन्हें उपदेश देता था॥”
मत्ती 7 की शिक्षा आत्म-परीक्षण, प्रार्थना, सही मार्ग, विवेक, परमेश्वर की इच्छा के अनुसार जीवन और यीशु की बातों को व्यवहार में उतारने पर केंद्रित है। अध्याय का अंतिम चित्र स्पष्ट है—मजबूत नींव केवल सुनने से नहीं, बल्कि सुनकर मानने से बनती है।
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