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मत्ती अध्याय 6 — बाइबल पाठ, व्याख्या और मुख्य शिक्षाएँ

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1

दिखावे के लिये नहीं, गुप्त में परमेश्वर की सेवा

पद 1–4

1सावधान रहो! तुम मनुष्यों को दिखाने के लिये अपने धर्म के काम न करो, नहीं तो अपने स्वर्गीय पिता से कुछ भी फल न पाओगे। 2इसलिये जब तू दान करे, तो अपने आगे तुरही न बजवा, जैसा कपटी, सभाओं और गलियों में करते हैं, ताकि लोग उन की बड़ाई करें, मैं तुम से सच कहता हूं, कि वे अपना फल पा चुके।

3परन्तु जब तू दान करे, तो जो तेरा दाहिना हाथ करता है, उसे तेरा बायां हाथ न जानने पाए। 4ताकि तेरा दान गुप्त रहे; और तब तेरा पिता जो गुप्त में देखता है, तुझे प्रतिफल देगा॥

मुख्य शिक्षा

“ताकि तेरा दान गुप्त रहे; और तब तेरा पिता जो गुप्त में देखता है, तुझे प्रतिफल देगा॥”

गहराई से समझें

यीशु यहां केवल दान देने की बात नहीं कर रहे, बल्कि उसके पीछे की मंशा पर ध्यान दिलाते हैं। परमेश्वर के सामने मूल्य केवल यह नहीं कि हमने क्या किया, बल्कि यह भी है कि हमने क्यों किया।

2

सच्ची प्रार्थना और प्रभु की प्रार्थना

पद 5–15

5और जब तू प्रार्थना करे, तो कपटियों के समान न हो क्योंकि लोगों को दिखाने के लिये सभाओं में और सड़कों के मोड़ों पर खड़े होकर प्रार्थना करना उन को अच्छा लगता है; मैं तुम से सच कहता हूं, कि वे अपना प्रतिफल पा चुके। 6परन्तु जब तू प्रार्थना करे, तो अपनी कोठरी में जा; और द्वार बन्द कर के अपने पिता से जो गुप्त में है प्रार्थना कर; और तब तेरा पिता जो गुप्त में देखता है, तुझे प्रतिफल देगा।

7प्रार्थना करते समय अन्यजातियों की नाईं बक-बक न करो; क्योंकि वे समझते हैं कि उनके बहुत बोलने से उन की सुनी जाएगी। 8सो तुम उन की नाईं न बनो, क्योंकि तुम्हारा पिता तुम्हारे मांगने से पहिले ही जानता है, कि तुम्हारी क्या क्या आवश्यकता है।

मुख्य वचन

“तुम्हारा पिता तुम्हारे मांगने से पहिले ही जानता है, कि तुम्हारी क्या क्या आवश्यकता है।”

9सो तुम इस रीति से प्रार्थना किया करो; “हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पवित्र माना जाए। 10तेरा राज्य आए; तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो। 11हमारी दिन भर की रोटी आज हमें दे।

12और जिस प्रकार हम ने अपने अपराधियों को क्षमा किया है, वैसे ही तू भी हमारे अपराधों को क्षमा कर। 13और हमें परीक्षा में न ला, परन्तु बुराई से बचा; क्योंकि राज्य और पराक्रम और महिमा सदा तेरे ही हैं।” आमीन।

जानने योग्य

इस प्रार्थना का क्रम ध्यान देने योग्य है: पहले परमेश्वर का नाम, राज्य और इच्छा; फिर दैनिक रोटी, क्षमा, परीक्षा और बुराई से बचाव। यह प्रार्थना हमारी आवश्यकताओं को परमेश्वर की इच्छा के अधीन रखती है।

14इसलिये यदि तुम मनुष्य के अपराध क्षमा करोगे, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता भी तुम्हें क्षमा करेगा। 15और यदि तुम मनुष्यों के अपराध क्षमा न करोगे, तो तुम्हारा पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा न करेगा॥

3

उपवास परमेश्वर के लिये, दिखावे के लिये नहीं

पद 16–18

16जब तुम उपवास करो, तो कपटियों की नाईं तुम्हारे मुंह पर उदासी न छाई रहे, क्योंकि वे अपना मुंह बनाए रहते हैं, ताकि लोग उन्हें उपवासी जानें; मैं तुम से सच कहता हूं, कि वे अपना प्रतिफल पा चुके। 17परन्तु जब तू उपवास करे तो अपने सिर पर तेल मल और मुंह धो। 18ताकि लोग नहीं परन्तु तेरा पिता जो गुप्त में है, तुझे उपवासी जाने; इस दशा में तेरा पिता जो गुप्त में देखता है, तुझे प्रतिफल देगा॥

मुख्य शिक्षा

“ताकि लोग नहीं परन्तु तेरा पिता जो गुप्त में है, तुझे उपवासी जाने…”

4

स्वर्ग में धन इकट्ठा करना

पद 19–21

19अपने लिये पृथ्वी पर धन इकट्ठा न करो; जहां कीड़ा और काई बिगाड़ते हैं, और जहां चोर सेंध लगाते और चुराते हैं। 20परन्तु अपने लिये स्वर्ग में धन इकट्ठा करो, जहां न तो कीड़ा, और न काई बिगाड़ते हैं, और जहां चोर न सेंध लगाते और न चुराते हैं। 21क्योंकि जहां तेरा धन है वहां तेरा मन भी लगा रहेगा।

मुख्य वचन

“क्योंकि जहां तेरा धन है वहां तेरा मन भी लगा रहेगा।”

आज के लिये सीख

यीशु धन को केवल संपत्ति के रूप में नहीं देखते, बल्कि उसे मन की दिशा से जोड़ते हैं। जिस वस्तु को हम सबसे अधिक मूल्य देते हैं, हमारा मन भी उसी की ओर आकर्षित होता जाता है।

5

आंख, मन और दो स्वामियों की सेवा

पद 22–24

22शरीर का दिया आंख है: इसलिये यदि तेरी आंख निर्मल हो, तो तेरा सारा शरीर भी उजियाला होगा। 23परन्तु यदि तेरी आंख बुरी हो, तो तेरा सारा शरीर भी अन्धियारा होगा; इस कारण वह उजियाला जो तुझ में है यदि अन्धकार हो तो वह अन्धकार कैसा बड़ा होगा।

24कोई मनुष्य दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता, क्योंकि वह एक से बैर और दूसरे से प्रेम रखेगा, वा एक से मिला रहेगा और दूसरे को तुच्छ जानेगा; “तुम परमेश्वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकते”।

मुख्य वचन

“तुम परमेश्वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकते।”

गहराई से समझें

यहां यीशु की शिक्षा का केंद्र केवल धन नहीं, बल्कि निष्ठा है। मनुष्य का जीवन अंततः यह तय करता है कि उसका वास्तविक स्वामी कौन है।

6

चिन्ता न करना और स्वर्गीय पिता पर भरोसा

पद 25–34

25इसलिये मैं तुम से कहता हूं, कि अपने प्राण के लिये यह चिन्ता न करना कि हम क्या खाएंगे? और क्या पीएंगे? और न अपने शरीर के लिये कि क्या पहिनेंगे? क्या प्राण भोजन से, और शरीर वस्त्र से बढ़कर नहीं? 26आकाश के पक्षियों को देखो! वे न बोते हैं, न काटते हैं, और न खत्तों में बटोरते हैं; तौभी तुम्हारा स्वर्गीय पिता उन को खिलाता है; क्या तुम उन से अधिक मूल्य नहीं रखते।

मुख्य वचन

“तौभी तुम्हारा स्वर्गीय पिता उन को खिलाता है; क्या तुम उन से अधिक मूल्य नहीं रखते।”

27तुम में कौन है, जो चिन्ता करके अपनी अवस्था में एक घड़ी भी बढ़ा सकता है? 28और वस्त्र के लिये क्यों चिन्ता करते हो? जंगली सोसनों पर ध्यान करो, कि वे कैसे बढ़ते हैं, वे न तो परिश्रम करते हैं, न कातते हैं। 29तौभी मैं तुम से कहता हूं, कि सुलैमान भी, अपने सारे विभव में उन में से किसी के समान वस्त्र पहिने हुए न था।

30इसलिये जब परमेश्वर मैदान की घास को, जो आज है, और कल भाड़ में झोंकी जाएगी, ऐसा वस्त्र पहिनाता है, तो हे अल्पविश्वासियों, तुम को वह क्योंकर न पहिनाएगा? 31इसलिये तुम चिन्ता करके यह न कहना, कि हम क्या खाएंगे, या क्या पीएंगे, या क्या पहिनेंगे? 32क्योंकि अन्यजाति इन सब वस्तुओं की खोज में रहते हैं, और तुम्हारा स्वर्गीय पिता जानता है, कि तुम्हें ये सब वस्तुएं चाहिए।

अध्याय का केंद्रीय वचन

“इसलिये पहिले तुम उसे राज्य और धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएं भी तुम्हें मिल जाएंगी।”

33इसलिये पहिले तुम उसे राज्य और धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएं भी तुम्हें मिल जाएंगी। 34सो कल के लिये चिन्ता न करो, क्योंकि कल का दिन अपनी चिन्ता आप कर लेगा; आज के लिये आज ही का दुख बहुत है॥

आज के लिये सीख

मत्ती 6 का अंतिम भाग चिन्ता को नकारने के बजाय प्राथमिकता को सही करने की शिक्षा देता है। यीशु पहले परमेश्वर के राज्य और धर्म की खोज करने को कहते हैं और फिर दैनिक आवश्यकताओं के विषय में भरोसा सिखाते हैं।

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