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मत्ती अध्याय 9 — बाइबल पाठ, व्याख्या और मुख्य शिक्षाएँ

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1

यीशु ने झोले के मारे हुए को चंगा किया और पाप क्षमा करने का अधिकार दिखाया

पद 1–8

1फिर वह नाव पर चढ़कर पार गया; और अपने नगर में आया। 2और देखो, कई लोग एक झोले के मारे हुए को खाट पर रखकर उसके पास लाए; यीशु ने उन का विश्वास देखकर, उस झोले के मारे हुए से कहा; हे पुत्र, ढाढ़स बान्ध; तेरे पाप क्षमा हुए। 3और देखो, कई शास्त्रियों ने सोचा, कि यह तो परमेश्वर की निन्दा करता है। 4यीशु ने उन के मन की बातें मालूम करके कहा, कि तुम लोग अपने अपने मन में बुरा विचार क्यों कर रहे हो?

5सहज क्या है, यह कहना, कि तेरे पाप क्षमा हुए; या यह कहना कि उठ और चल फिर। 6परन्तु इसलिये कि तुम जान लो कि मनुष्य के पुत्र को पृथ्वी पर पाप क्षमा करने का अधिकार है (उस ने झोले के मारे हुए से कहा) उठ: अपनी खाट उठा, और अपने घर चला जा। 7वह उठकर अपने घर चला गया। 8लोग यह देखकर डर गए और परमेश्वर की महिमा करने लगे जिस ने मनुष्यों को ऐसा अधिकार दिया है॥

महत्वपूर्ण वचन • पद 6

“मनुष्य के पुत्र को पृथ्वी पर पाप क्षमा करने का अधिकार है”

गहराई से समझें

इस घटना में यीशु केवल शारीरिक चंगाई नहीं करते, बल्कि पाप क्षमा करने के अपने अधिकार को भी प्रकट करते हैं। चंगाई उस अधिकार का दिखाई देने वाला प्रमाण बनती है।

2

मत्ती को बुलाना और पापियों के साथ यीशु का भोजन करना

पद 9–13

9वहां से आगे बढ़कर यीशु ने मत्ती नाम एक मनुष्य को महसूल की चौकी पर बैठे देखा, और उस से कहा, मेरे पीछे हो ले। वह उठकर उसके पीछे हो लिया॥ 10और जब वह घर में भोजन करने के लिये बैठा तो बहुतेरे महसूल लेने वाले और पापी आकर यीशु और उसके चेलों के साथ खाने बैठे। 11यह देखकर फरीसियों ने उसके चेलों से कहा; तुम्हारा गुरू महसूल लेने वालों और पापियों के साथ क्यों खाता है?

12उस ने यह सुनकर उन से कहा, वैद्य भले चंगों को नहीं परन्तु बीमारों को अवश्य है। 13सो तुम जाकर इस का अर्थ सीख लो, कि मैं बलिदान नहीं परन्तु दया चाहता हूं; क्योंकि मैं धर्मियों को नहीं परन्तु पापियों को बुलाने आया हूं॥

महत्वपूर्ण वचन • पद 13

“मैं बलिदान नहीं परन्तु दया चाहता हूं; क्योंकि मैं धर्मियों को नहीं परन्तु पापियों को बुलाने आया हूं”

आज के लिये सीख

यीशु की सेवकाई उन लोगों तक पहुंचती है जिन्हें अपने जीवन में चंगाई, क्षमा और परिवर्तन की आवश्यकता है। यहां “दया” धार्मिक दिखावे से अधिक महत्वपूर्ण हृदय की स्थिति को सामने लाती है।

3

उपवास और नए दाखरस की शिक्षा

पद 14–17

14तब यूहन्ना के चेलों ने उसके पास आकर कहा; क्या कारण है कि हम और फरीसी इतना उपवास करते हैं, पर तेरे चेले उपवास नहीं करते? 15यीशु ने उन से कहा; क्या बराती, जब तक दुल्हा उन के साथ है शोक कर सकते हैं? पर वे दिन आएंगे कि दूल्हा उन से अलग किया जाएगा, उस समय वे उपवास करेंगे।

16कोरे कपड़े का पैबन्द पुराने पहिरावन पर कोई नहीं लगाता, क्योंकि वह पैबन्द पहिरावन से और कुछ खींच लेता है, और वह अधिक फट जाता है। 17और नया दाखरस पुरानी मशकों में नहीं भरते हैं; क्योंकि ऐसा करने से मशकें फट जाती हैं, और दाखरस बह जाता है और मशकें नाश हो जाती हैं, परन्तु नया दाखरस नई मशकों में भरते हैं और वह दोनों बची रहती हैं।

महत्वपूर्ण वचन • पद 17

“नया दाखरस नई मशकों में भरते हैं और वह दोनों बची रहती हैं।”

गहराई से समझें

यीशु की यह शिक्षा दिखाती है कि उसके आने के साथ परमेश्वर के कार्य को केवल पुराने बाहरी ढांचे में सीमित करके नहीं समझा जा सकता। नया दाखरस और नई मशक परिवर्तन और नई व्यवस्था की ओर संकेत करते हैं।

4

सरदार की बेटी और बारह वर्ष से पीड़ित स्त्री

पद 18–26

18वह उन से ये बातें कह ही रहा था, कि देखो, एक सरदार ने आकर उसे प्रणाम किया और कहा मेरी पुत्री अभी मरी है; परन्तु चलकर अपना हाथ उस पर रख, तो वह जीवित हो जाएगी। 19यीशु उठकर अपने चेलों समेत उसके पीछे हो लिया। 20और देखो, एक स्त्री ने जिस के बारह वर्ष से लोहू बहता था, उसके पीछे से आकर उसके वस्त्र के आंचल को छू लिया। 21क्योंकि वह अपने मन में कहती थी कि यदि मैं उसके वस्त्र ही को छू लूंगी तो चंगी हो जाऊंगी।

महत्वपूर्ण वचन • पद 22

“पुत्री ढाढ़स बान्ध; तेरे विश्वास ने तुझे चंगा किया है”

22यीशु ने फिरकर उसे देखा, और कहा; पुत्री ढाढ़स बान्ध; तेरे विश्वास ने तुझे चंगा किया है; सो वह स्त्री उसी घड़ी चंगी हो गई। 23जब यीशु उस सरदार के घर में पहुंचा और बांसली बजाने वालों और भीड़ को हुल्लड़ मचाते देखा तब कहा। 24हट जाओ, लड़की मरी नहीं, पर सोती है; इस पर वे उस की हंसी करने लगे। 25परन्तु जब भीड़ निकाल दी गई, तो उस ने भीतर जाकर लड़की का हाथ पकड़ा, और वह जी उठी। 26और इस बात की चर्चा उस सारे देश में फैल गई।

जानने योग्य

इस पूरे भाग में दो अलग परिस्थितियां एक साथ दिखाई देती हैं—एक ओर बारह वर्षों से पीड़ित स्त्री और दूसरी ओर मर चुकी बालिका। दोनों परिस्थितियों में यीशु की सामर्थ्य और विश्वास का महत्व सामने आता है।

5

दो अन्धों की आंखें खोलना

पद 27–31

27जब यीशु वहां से आगे बढ़ा, तो दो अन्धे उसके पीछे यह पुकारते हुए चले, कि हे दाऊद की सन्तान, हम पर दया कर। 28जब वह घर में पहुंचा, तो वे अन्धे उस के पास आए; और यीशु ने उन से कहा; क्या तुम्हें विश्वास है, कि मैं यह कर सकता हूं उन्होंने उस से कहा; हां प्रभु। 29तब उस ने उन की आंखे छूकर कहा, तुम्हारे विश्वास के अनुसार तुम्हारे लिये हो।

30और उन की आंखे खुल गई और यीशु ने उन्हें चिताकर कहा; सावधान, कोई इस बात को न जाने। 31पर उन्होंने निकलकर सारे देश में उसका यश फैला दिया॥

महत्वपूर्ण वचन • पद 29

“तुम्हारे विश्वास के अनुसार तुम्हारे लिये हो।”

आज के लिये सीख

अन्धे यीशु को “दाऊद की सन्तान” कहकर पुकारते हैं। उनकी पुकार में यीशु के प्रति विश्वास और पहचान दोनों दिखाई देते हैं।

6

गूंगे को चंगाई और फरीसियों का विरोध

पद 32–34

32जब वे बाहर जा रहे थे, तो देखो, लोग एक गूंगे को जिस में दुष्टात्मा थी उस के पास लाए। 33और जब दुष्टात्मा निकाल दी गई, तो गूंगा बोलने लगा; और भीड़ ने अचम्भा करके कहा कि इस्राएल में ऐसा कभी नहीं देखा गया। 34परन्तु फरीसियों ने कहा, यह तो दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है॥

महत्वपूर्ण वचन • पद 33

“गूंगा बोलने लगा; और भीड़ ने अचम्भा करके कहा कि इस्राएल में ऐसा कभी नहीं देखा गया।”

ध्यान देने योग्य

एक ही घटना पर दो बिल्कुल अलग प्रतिक्रियाएं दिखाई देती हैं—भीड़ यीशु की सामर्थ्य पर अचम्भा करती है, जबकि फरीसी उसी कार्य को गलत स्रोत से जोड़ते हैं।

7

भीड़ पर तरस और बहुत से मजदूरों की आवश्यकता

पद 35–38

35और यीशु सब नगरों और गांवों में फिरता रहा और उन की सभाओं में उपदेश करता, और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और हर प्रकार की बीमारी और दुर्बलता को दूर करता रहा। 36जब उस ने भीड़ को देखा तो उस को लोगों पर तरस आया, क्योंकि वे उन भेड़ों की नाईं जिनका कोई रखवाला न हो, व्याकुल और भटके हुए से थे।

महत्वपूर्ण वचन • पद 36

“उस को लोगों पर तरस आया, क्योंकि वे उन भेड़ों की नाईं जिनका कोई रखवाला न हो, व्याकुल और भटके हुए से थे।”

37तब उस ने अपने चेलों से कहा, पक्के खेत तो बहुत हैं पर मजदूर थोड़े हैं। 38इसलिये खेत के स्वामी से बिनती करो कि वह अपने खेत काटने के लिये मजदूर भेज दे॥

गहराई से समझें

मत्ती अध्याय 9 का समापन यीशु की सेवकाई की एक बड़ी तस्वीर के साथ होता है—शिक्षा, सुसमाचार, चंगाई और लोगों के प्रति करुणा। इसी करुणा से “मजदूरों” के लिये प्रार्थना करने की पुकार निकलती है।

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