यरूशलेम में यीशु का प्रवेश और राजा के रूप में स्वागत
पद 1–111जब वे यरूशलेम के निकट जैतून पहाड़ पर बैतफगे और बैतनिय्याह के पास आए, तो उस ने अपने चेलों में से दो को यह कहकर भेजा। 2कि अपने साम्हने के गांव में जाओ, और उस में पहुँचते ही एक गदही का बच्चा जिस पर कभी कोई नहीं चढ़ा, बन्धा हुआ तुम्हें मिलेगा, उसे खोल लाओ। 3यदि तुम से कोई पूछे, यह क्यों करते हो? तो कहना, कि प्रभु को इस का प्रयोजन है; और वह शीघ्र उसे यहां भेज देगा। 4उन्होंने जाकर उस बच्चे को बाहर द्वार के पास चौक में बन्धा हुआ पाया, और खोलने लगे। 5और उन में से जो वहां खड़े थे, कोई कोई कहने लगे कि यह क्या करते हो, गदही के बच्चे को क्यों खोलते हो? 6उन्होंने जैसा यीशु ने कहा था, वैसा ही उन से कह दिया; तब उन्होंने उन्हें जाने दिया। 7और उन्होंने बच्चे को यीशु के पास लाकर उस पर अपने कपड़े डाले और वह उस पर बैठ गया।
8और बहुतों ने अपने कपड़े मार्ग में बिछाए और औरों ने खेतों में से डालियां काट काट कर फैला दीं। 9और जो उसके आगे आगे जाते और पीछे पीछे चले आते थे, पुकार पुकार कर कहते जाते थे, कि होशाना; धन्य है वह जो प्रभु के नाम से आता है।
10हमारे पिता दाऊद का राज्य जो आ रहा है; धन्य है: आकाश में होशाना॥
11और वह यरूशलेम पहुंचकर मन्दिर में आया, और चारों ओर सब वस्तुओं को देखकर बारहों के साथ बैतनिय्याह गया क्योंकि सांझ हो गई थी॥
यीशु का यरूशलेम में प्रवेश केवल भीड़ द्वारा स्वागत का दृश्य नहीं है। उसके आने के साथ मन्दिर, धार्मिक नेतृत्व और परमेश्वर की आराधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न भी सामने आने वाले हैं।
अंजीर का पेड़ और मन्दिर की शुद्धि
पद 12–1912दूसरे दिन जब वे बैतनिय्याह से निकले तो उस को भूख लगी। 13और वह दूर से अंजीर का एक हरा पेड़ देखकर निकट गया, कि क्या जाने उस में कुछ पाए: पर पत्तों को छोड़ कुछ न पाया; क्योंकि फल का समय न था। 14इस पर उस ने उस से कहा अब से कोई तेरा फल कभी न खाए। और उसके चेले सुन रहे थे।
15फिर वे यरूशलेम में आए, और वह मन्दिर में गया; और वहां जो लेन-देन कर रहे थे उन्हें बाहर निकालने लगा, और सर्राफों के पीढ़े और कबूतर के बेचने वालों की चौकियां उलट दीं। 16और मन्दिर में से होकर किसी को बरतन लेकर आने जाने न दिया।
17और उपदेश करके उन से कहा, क्या यह नहीं लिखा है, कि मेरा घर सब जातियों के लिये प्रार्थना का घर कहलाएगा? पर तुम ने इसे डाकुओं की खोह बना दी है।
18यह सुनकर महायाजक और शास्त्री उसके नाश करने का अवसर ढूंढ़ने लगे; क्योंकि उस से डरते थे, इसलिये कि सब लोग उसके उपदेश से चकित होते थे॥ 19और प्रति दिन सांझ होते ही वह नगर से बाहर जाया करता था।
मन्दिर को यीशु “प्रार्थना का घर” कहता है। इस घटना में आराधना के स्थान के वास्तविक उद्देश्य और उसके गलत उपयोग के बीच स्पष्ट विरोध दिखाई देता है।
विश्वास, प्रार्थना और क्षमा की शिक्षा
पद 20–2620फिर भोर को जब वे उधर से जाते थे तो उन्होंने उस अंजीर के पेड़ को जड़ तक सूखा हुआ देखा। 21पतरस को वह बात स्मरण आई, और उस ने उस से कहा, हे रब्बी, देख, यह अंजीर का पेड़ जिसे तू ने शाप दिया था सूख गया है।
22यीशु ने उस को उत्तर दिया, कि परमेश्वर पर विश्वास रखो।
23मैं तुम से सच कहता हूं कि जो कोई इस पहाड़ से कहे; कि तू उखड़ जा, और समुद्र में जा पड़, और अपने मन में सन्देह न करे, वरन प्रतीति करे, कि जो कहता हूं वह हो जाएगा, तो उसके लिये वही होगा। 24इसलिये मैं तुम से कहता हूं, कि जो कुछ तुम प्रार्थना करके मांगो तो प्रतीति कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिये हो जाएगा।
25और जब कभी तुम खड़े हुए प्रार्थना करते हो, तो यदि तुम्हारे मन में किसी की ओर से कुछ विरोध हो, तो क्षमा करो: इसलिये कि तुम्हारा स्वर्गीय पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा करे॥ 26और यदि तुम क्षमा न करो तो तुम्हारा पिता भी जो स्वर्ग में है, तुम्हारा अपराध क्षमा न करेगा।
इस शिक्षा में विश्वास और प्रार्थना के साथ क्षमा को भी जोड़ा गया है। यीशु के अनुसार परमेश्वर से मांगने वाला जीवन दूसरों के प्रति क्षमा रखने वाले हृदय से अलग नहीं है।
यीशु के अधिकार को चुनौती
पद 27–3327वे फिर यरूशलेम में आए, और जब वह मन्दिर में टहल रहा था तो महायाजक और शास्त्री और पुरनिए उसके पास आकर पूछने लगे। 28कि तू ये काम किस अधिकार से करता है? और यह अधिकार तुझे किस ने दिया है कि तू ये काम करे? 29यीशु ने उस से कहा: मैं भी तुम से एक बात पूछता हूं; मुझे उत्तर दो: तो मैं तुम्हें बताऊंगा कि ये काम किस अधिकार से करता हूं।
30यूहन्ना का बपतिस्मा क्या स्वर्ग की ओर से था वा मनुष्यों की ओर से था? मुझे उत्तर दो।
31तब वे आपस में विवाद करने लगे कि यदि हम कहें, स्वर्ग की ओर से, तो वह कहेगा; फिर तुम ने उस की प्रतीति क्यों नहीं की? 32और यदि हम कहें, मनुष्यों की ओर से तो लोगों का डर है, क्योंकि सब जानते हैं कि यूहन्ना सचमुच भविष्यद्वक्ता है। 33सो उन्होंने यीशु को उत्तर दिया, कि हम नहीं जानते: यीशु ने उन से कहा, मैं भी तुम को नहीं बताता, कि ये काम किस अधिकार से करता हूं॥
धार्मिक अगुओं का प्रश्न यीशु के अधिकार को चुनौती देने के लिये था। यीशु का उत्तर उनके प्रश्न के पीछे छिपी मनोवृत्ति को सामने ले आता है—वे सत्य को स्वीकार करने के बजाय लोगों और परिणामों के बारे में सोच रहे थे।
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