दाख की बारी के किसानों का दृष्टान्त
पद 1–121फिर वह दृष्टान्त में उन से बातें करने लगा: कि किसी मनुष्य ने दाख की बारी लगाई, और उसके चारों ओर बाड़ा बान्धा, और रस का कुंड खोदा, और गुम्मट बनाया; और किसानों को उसका ठेका देकर परदेश चला गया। 2फिर फल के मौसम में उस ने किसानों के पास एक दास को भेजा कि किसान से दाख की बारी के फलों का भाग ले। 3पर उन्होंने उसे पकड़कर पीटा और छूछे हाथ लौटा दिया। 4फिर उस ने एक और दास को उन के पास भेजा और उन्होंने उसका सिर फोड़ डाला और उसका अपमान किया। 5फिर उस ने एक और को भेजा, और उन्होंने उसे मार डाला: तब उस ने और बहुतों को भेजा: उन में से उन्होंने कितनों को पीटा, और कितनों को मार डाला।
6अब एक ही रह गया था, जो उसका प्रिय पुत्र था; अन्त में उस ने उसे भी उन के पास यह सोचकर भेजा कि वे मेरे पुत्र का आदर करेंगे। 7पर उन किसानों ने आपस में कहा; यही तो वारिस है; आओ, हम उसे मार डालें, तब मीरास हमारी हो जाएगी। 8और उन्होंने उसे पकड़कर मार डाला, और दाख की बारी के बाहर फेंक दिया। 9इसलिये दाख की बारी का स्वामी क्या करेगा? वह आकर उन किसानों को नाश करेगा, और दाख की बारी औरों को दे देगा।
10क्या तुम ने पवित्र शास्त्र में यह वचन नहीं पढ़ा, कि जिस पत्थर को राजमिस्त्रियों ने निकम्मा ठहराया था, वही कोने का सिरा हो गया?
11यह प्रभु की ओर से हुआ, और हमारी दृष्टि में अद्भुत है। 12तब उन्होंने उसे पकड़ना चाहा; क्योंकि समझ गए थे, कि उस ने हमारे विरोध में यह दृष्टान्त कहा है: पर वे लोगों से डरे; और उसे छोड़ कर चले गए॥
दाख की बारी के इस दृष्टान्त में किसानों का व्यवहार परमेश्वर के भेजे हुए दासों और अन्त में उसके प्रिय पुत्र के प्रति विद्रोह को दिखाता है। “कोने का सिरा” उस व्यक्ति की ओर संकेत करता है जिसे मनुष्यों ने ठुकराया, परन्तु परमेश्वर ने विशेष स्थान दिया।
कैसर का कर और परमेश्वर का अधिकार
पद 13–1713तब उन्होंने उसे बातों में फंसाने के लिये कई एक फरीसियों और हेरोदियों को उसके पास भेजा। 14और उन्होंने आकर उस से कहा; हे गुरू, हम जानते हैं, कि तू सच्चा है, और किसी की परवाह नहीं करता; क्योंकि तू मनुष्यों का मुंह देख कर बातें नहीं करता, परन्तु परमेश्वर का मार्ग सच्चाई से बताता है। 15तो क्या कैसर को कर देना उचित है, कि नहीं? हम दें, या न दें? उस ने उन का कपट जानकर उन से कहा; मुझे क्यों परखते हो? एक दीनार मेरे पास लाओ, कि मैं देखूं। 16वे ले आए, और उस ने उन से कहा; यह मूर्ति और नाम किस का है? उन्होंने कहा, कैसर का।
17यीशु ने उन से कहा; जो कैसर का है वह कैसर को, और जो परमेश्वर का है परमेश्वर को दो: तब वे उस पर बहुत अचम्भा करने लगे॥
यीशु ने एक ऐसे प्रश्न का उत्तर दिया जिसमें उसे फंसाने की कोशिश की गई थी। उसके उत्तर में सांसारिक उत्तरदायित्व और परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च उत्तरदायित्व—दोनों के बीच स्पष्ट भेद दिखाई देता है।
पुनरुत्थान और परमेश्वर की सामर्थ
पद 18–2718फिर सदूकियों ने भी, जो कहते हैं कि मरे हुओं का जी उठना है ही नहीं, उसके पास आकर उस से पूछा। 19कि हे गुरू, मूसा ने हमारे लिये लिखा है, कि यदि किसी का भाई बिना सन्तान मर जाए, और उस की पत्नी रह जाए, तो उसका भाई उस की पत्नी को ब्याह ले और अपने भाई के लिये वंश उत्पन्न करे: सात भाई थे। 20पहिला भाई ब्याह करके बिना सन्तान मर गया। 21तब दूसरे भाई ने उस स्त्री को ब्याह लिया और बिना सन्तान मर गया; और वैसे ही तीसरे ने भी। 22और सातों से सन्तान न हुई: सब के पीछे वह स्त्री भी मर गई। 23सो जी उठने पर वह उन में से किस की पत्नी होगी? क्योंकि वह सातों की पत्नी हो चुकी थी।
24यीशु ने उन से कहा; क्या तुम इस कारण से भूल में नहीं पड़े हो, कि तुम न तो पवित्र शास्त्र ही को जानते हो, और न परमेश्वर की सामर्थ को।
25क्योंकि जब वे मरे हुओं में से जी उठेंगे, तो उन में ब्याह शादी न होगी; पर स्वर्ग में दूतों की नाईं होंगे। 26मरे हुओं के जी उठने के विषय में क्या तुम ने मूसा की पुस्तक में झाड़ी की कथा में नहीं पढ़ा, कि परमेश्वर ने उस से कहा, मैं इब्राहीम का परमेश्वर, और इसहाक का परमेश्वर, और याकूब का परमेश्वर हूं?
27परमेश्वर मरे हुओं का नहीं, वरन जीवितों का परमेश्वर है: सो तुम बड़ी भूल में पड़े हो॥
यीशु पुनरुत्थान को केवल पुराने जीवन की पुनरावृत्ति के रूप में नहीं समझाता। वह परमेश्वर की सामर्थ और आने वाले जीवन की वास्तविकता को सामने रखता है।
सब से बड़ी आज्ञा — परमेश्वर और पड़ोसी से प्रेम
पद 28–3428और शास्त्रियों में से एक ने आकर उन्हें विवाद करते सुना, और यह जानकर कि उस ने उन्हें अच्छी रीति से उत्तर दिया; उस से पूछा, सब से मुख्य आज्ञा कौन सी है?
29यीशु ने उसे उत्तर दिया, सब आज्ञाओं में से यह मुख्य है; हे इस्राएल सुन; प्रभु हमारा परमेश्वर एक ही प्रभु है। 30और तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन से और अपने सारे प्राण से, और अपनी सारी बुद्धि से, और अपनी सारी शक्ति से प्रेम रखना।
31और दूसरी यह है, कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना: इस से बड़ी और कोई आज्ञा नहीं। 32शास्त्री ने उस से कहा; हे गुरू, बहुत ठीक! तू ने सच कहा, कि वह एक ही है, और उसे छोड़ और कोई नहीं। 33और उस से सारे मन और सारी बुद्धि और सारे प्राण और सारी शक्ति के साथ प्रेम रखना और पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना, सारे होमों और बलिदानों से बढ़कर है।
34जब यीशु ने देखा कि उस ने समझ से उत्तर दिया, तो उस से कहा; तू परमेश्वर के राज्य से दूर नहीं: और किसी को फिर उस से कुछ पूछने का साहस न हुआ॥
इस खण्ड में प्रेम को दो दिशाओं में रखा गया है—परमेश्वर के प्रति सम्पूर्ण प्रेम और पड़ोसी के प्रति अपने समान प्रेम। यीशु के अनुसार ये दोनों आज्ञाएं परमेश्वर की इच्छा के केन्द्र को प्रकट करती हैं।
मसीह दाऊद का पुत्र और प्रभु
पद 35–3735फिर यीशु ने मन्दिर में उपदेश करते हुए यह कहा, कि शास्त्री क्योंकर कहते हैं, कि मसीह दाऊद का पुत्र है? 36दाऊद ने आप ही पवित्र आत्मा में होकर कहा है, कि प्रभु ने मेरे प्रभु से कहा; मेरे दाहिने बैठ, जब तक कि मैं तेरे बैरियों को तेरे पांवों की पीढ़ी न कर दूं।
37दाऊद तो आप ही उसे प्रभु कहता है, फिर वह उसका पुत्र कहां से ठहरा? और भीड़ के लोग उस की आनन्द से सुनते थे॥
यीशु केवल यह नहीं पूछ रहा कि मसीह दाऊद के वंश में कैसे आता है; वह यह प्रश्न उठाता है कि मसीह की पहचान को केवल दाऊद के वंशज तक सीमित क्यों समझा जाए।
शास्त्रियों के कपट से सावधान
पद 38–4038उस ने अपने उपदेश में उन से कहा, शास्त्रियों से चौकस रहो, जो लम्बे वस्त्र पहिने हुए फिरना। 39और बाजारों में नमस्कार, और आराधनालयों में मुख्य मुख्य आसन और जेवनारों में मुख्य मुख्य स्थान भी चाहते हैं। 40वे विधवाओं के घरों को खा जाते हैं, और दिखाने के लिये बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हैं, ये अधिक दण्ड पाएंगे॥
40वे विधवाओं के घरों को खा जाते हैं, और दिखाने के लिये बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हैं, ये अधिक दण्ड पाएंगे॥
कंगाल विधवा का दो दमड़ियों का दान
पद 41–4441और वह मन्दिर के भण्डार के साम्हने बैठकर देख रहा था, कि लोग मन्दिर के भण्डार में किस प्रकार पैसे डालते हैं, और बहुत धनवानों ने बहुत कुछ डाला। 42इतने में एक कंगाल विधवा ने आकर दो दमड़ियां, जो एक अधेले के बराबर होती है, डालीं।
43तब उस ने अपने चेलों को पास बुलाकर उन से कहा; मैं तुम से सच कहता हूं, कि मन्दिर के भण्डार में डालने वालों में से इस कंगाल विधवा ने सब से बढ़कर डाला है।
44क्योंकि सब ने अपने धन की बढ़ती में से डाला है, परन्तु इस ने अपनी घटी में से जो कुछ उसका था, अर्थात अपनी सारी जीविका डाल दी है।
यीशु ने दान का मूल्य केवल उसकी मात्रा से नहीं आंका। इस विधवा ने अपनी घटी में से दिया—अर्थात उसके पास जो था, उसी में से उसने अपनी सारी जीविका दे दी। यही कारण है कि यीशु ने उसके दान को विशेष रूप से अपने चेलों के सामने रखा।
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