मन्दिर के विनाश की भविष्यवाणी और अन्त के चिन्ह
पद 1–131जब वह मन्दिर से निकल रहा था, तो उसके चेलों में से एक ने उस से कहा; हे गुरू, देख, कैसे कैसे पत्थर और कैसे कैसे भवन हैं! 2यीशु ने उस से कहा; क्या तुम ये बड़े बड़े भवन देखते हो: यहां पत्थर पर पत्थर भी बचा न रहेगा जो ढाया न जाएगा॥ 3जब वह जैतून के पहाड़ पर मन्दिर के साम्हने बैठा था, तो पतरस और याकूब और यूहन्ना और अन्द्रियास ने अलग जाकर उस से पूछा। 4कि हमें बता कि ये बातें कब होंगी और जब ये सब बातें पूरी होने पर होंगी उस समय का क्या चिन्ह होगा?
5यीशु उन से कहने लगा; चौकस रहो कि कोई तुम्हें न भरमाए।
6बहुतेरे मेरे नाम से आकर कहेंगे, कि मैं वही हूं और बहुतों को भरमाएंगे। 7और जब तुम लड़ाइयां, और लड़ाइयों की चर्चा सुनो; तो न घबराना: क्योंकि इन का होना अवश्य है; परन्तु उस समय अन्त न होगा। 8क्योंकि जाति पर जाति, और राज्य पर राज्य चढ़ाई करेगा, और हर कहीं भूकम्प होंगे, और अकाल पड़ेंगे; यह तो पीड़ाओं का आरम्भ ही होगा॥
9परन्तु तुम अपने विषय में चौकस रहो; क्योंकि लोग तुम्हें महासभाओं में सौंपेंगे और तुम पंचायतों में पीटे जाओगे; और मेरे कारण हाकिमों और राजाओं के आगे खड़े किए जाओगे, ताकि उन के लिये गवाही हो। 10पर अवश्य है कि पहिले सुसमाचार सब जातियों में प्रचार किया जाए। 11जब वे तुम्हें ले जाकर सौंपेंगे, तो पहिले से चिन्ता न करना, कि हम क्या कहेंगे; पर जो कुछ तुम्हें उसी घड़ी बताया जाए, वही कहना; क्योंकि बोलने वाले तुम नहीं हो, परन्तु पवित्र आत्मा है।
12और भाई को भाई, और पिता को पुत्र घात के लिये सौंपेंगे, और लड़केबाले माता-पिता के विरोध में उठकर उन्हें मरवा डालेंगे। 13और मेरे नाम के कारण सब लोग तुम से बैर करेंगे; पर जो अन्त तक धीरज धरे रहेगा, उसी का उद्धार होगा॥
अन्त के चिन्हों की चर्चा के बीच यीशु बार-बार अपने चेलों को भय के बजाय चौकस रहने और विश्वास में स्थिर रहने की शिक्षा देता है। विशेष रूप से सुसमाचार के प्रचार और अन्त तक धीरज धरने पर ध्यान दिया गया है।
भारी क्लेश और झूठे मसीहों से सावधान
पद 14–2314सो जब तुम उस उजाड़ने वाली घृणित वस्तु को जहां उचित नहीं वहां खड़ी देखो, (पढ़नेवाला समझ ले) तब जो यहूदिया में हों, वे पहाड़ों पर भाग जाएं। 15जो कोठे पर हो, वह अपने घर से कुछ लेने को नीचे न उतरे और न भीतर जाए। 16और जो खेत में हो, वह अपना कपड़ा लेने के लिये पीछे न लौटे। 17उन दिनों में जो गर्भवती और दूध पिलाती होंगी, उन के लिये हाय हाय! 18और प्रार्थना किया करो कि यह जाड़े में न हो।
19क्योंकि वे दिन ऐसे क्लेश के होंगे, कि सृष्टि के आरम्भ से जो परमेश्वर ने सृजी है अब तक न तो हुए, और न कभी फिर होंगे। 20और यदि प्रभु उन दिनों को न घटाता, तो कोई प्राणी भी न बचता; परन्तु उन चुने हुओं के कारण जिन को उस ने चुना है, उन दिनों को घटाया।
21उस समय यदि कोई तुम से कहे; देखो, मसीह यहां है, या देखो, वहां है, तो प्रतीति न करना।
22क्योंकि झूठे मसीह और झूठे भविष्यद्वक्ता उठ खड़े होंगे, और चिन्ह और अद्भुत काम दिखाएंगे कि यदि हो सके तो चुने हुओं को भी भरमा दें। 23पर तुम चौकस रहो: देखो, मैं ने तुम्हें सब बातें पहिले ही से कह दी हैं।
इस खण्ड में केवल बाहरी संकट की चेतावनी नहीं है; आत्मिक धोखे की भी गंभीर चेतावनी है। चिन्ह और अद्भुत काम अपने आप में सत्य की गारंटी नहीं हैं—इसलिए यीशु अपने चेलों से चौकस रहने को कहता है।
मनुष्य के पुत्र का आगमन और चुने हुओं का इकट्ठा किया जाना
पद 24–2724उन दिनों में, उस क्लेश के बाद सूरज अन्धेरा हो जाएगा, और चाँद प्रकाश न देगा। 25और आकाश से तारागण गिरने लगेंगे: और आकाश की शक्तियां हिलाई जाएंगी।
26तब लोग मनुष्य के पुत्र को बड़ी सामर्थ और महिमा के साथ बादलों में आते देखेंगे।
27उस समय वह अपने दूतों को भेजकर, पृथ्वी के इस छोर से आकाश की उस छोर तक चारों दिशा से अपने चुने हुए लोगों को इकट्ठे करेगा।
यहाँ अध्याय का ध्यान संकटों से हटकर मनुष्य के पुत्र के आगमन पर केन्द्रित हो जाता है। यीशु के आने के साथ उसके चुने हुए लोगों को इकट्ठा किए जाने की बात कही गई है।
अंजीर के पेड़ से सीख और परमेश्वर के वचन की स्थिरता
पद 28–3128अंजीर के पेड़ से यह दृष्टान्त सीखो: जब उस की डाली कोमल हो जाती; और पत्ते निकलने लगते हैं; तो तुम जान लेते हो, कि ग्रीष्मकाल निकट है। 29इसी रीति से जब तुम इन बातों को होते देखो, तो जान लो, कि वह निकट है वरन द्वार ही पर है। 30मैं तुम से सच कहता हूं, कि जब तक ये सब बातें न हो लेंगी, तब तक यह पीढ़ी जाती न रहेगी।
31आकाश और पृथ्वी टल जाएंगे, परन्तु मेरी बातें कभी न टलेंगी।
यीशु अंजीर के पेड़ के उदाहरण से अपने चेलों को चिन्हों को पहचानना सिखाता है, लेकिन साथ ही उसके वचन की स्थिरता को सर्वोच्च स्थान देता है। परिस्थितियां बदल सकती हैं, परन्तु उसका वचन नहीं टलता।
उस दिन और घड़ी का समय अज्ञात है
पद 32–3732उस दिन या उस घड़ी के विषय में कोई नहीं जानता, न स्वर्ग के दूत और न पुत्र; परन्तु केवल पिता। 33देखो, जागते और प्रार्थना करते रहो; क्योंकि तुम नहीं जानते कि वह समय कब आएगा।
34यह उस मनुष्य की सी दशा है, जो परदेश जाते समय अपना घर छोड़ जाए, और अपने दासों को अधिकार दे: और हर एक को उसका काम जता दे, और द्वारपाल को जागते रहने की आज्ञा दे। 35इसलिये जागते रहो; क्योंकि तुम नहीं जानते कि घर का स्वामी कब आएगा, सांझ को या आधी रात को, या मुर्ग के बांग देने के समय या भोर को।
36ऐसा न हो कि वह अचानक आकर तुम्हें सोते पाए।
37और जो मैं तुम से कहता हूं, वही सब से कहता हूं, जागते रहो॥
यीशु ने समय की गणना करने के बजाय जागते रहने की आज्ञा दी। यहाँ मुख्य जोर तारीख या घड़ी जानने पर नहीं, बल्कि तैयार, सचेत और विश्वासयोग्य जीवन जीने पर है।
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