सात रोटियों से चार हजार को भोजन
पद 1–101उन दिनों में, जब फिर बड़ी भीड़ इकट्ठी हुई, और उन के पास कुछ खाने को न था, तो उस ने अपने चेलों को पास बुलाकर उन से कहा। 2मुझे इस भीड़ पर तरस आता है, क्योंकि यह तीन दिन से बराबर मेरे साथ हैं, और उन के पास कुछ भी खाने को नहीं। 3यदि मैं उन्हें भूखा घर भेज दूं, तो मार्ग में थक कर रह जाएंगे; क्योंकि इन में से कोई कोई दूर से आए हैं। 4उसके चेलों ने उस को उत्तर दिया, कि यहां जंगल में इतनी रोटी कोई कहां से लाए कि ये तृप्त हों? 5उस ने उन से पूछा; तुम्हारे पास कितनी रोटियां हैं? उन्होंने कहा, सात।
6तब उस ने लोगों को भूमि पर बैठने की आज्ञा दी, और वे सात रोटियां लीं, और धन्यवाद करके तोड़ीं, और अपने चेलों को देता गया कि उन के आगे रखें, और उन्होंने लोगों के आगे परोस दिया। 7उन के पास थोड़ी सी छोटी मछलियां भी थीं; और उसने धन्यवाद करके उन्हें भी लोगों के आगे रखने की आज्ञा दी। 8सो वे खाकर तृप्त हो गए और शेष टुकड़ों के सात टोकरे भरकर उठाए। 9और लोग चार हजार के लगभग थे; और उस ने उन को विदा किया। 10और वह तुरन्त अपने चेलों के साथ नाव पर चढ़कर दलमनूता देश को चला गया॥
“मुझे इस भीड़ पर तरस आता है…”
यीशु ने भीड़ की शारीरिक आवश्यकता को भी देखा। लोगों की भूख उसके लिये छोटी या महत्वहीन बात नहीं थी। वह उनकी आवश्यकता देखकर तरस खाता है और अपने चेलों को भी उस आवश्यकता में सहभागी बनाता है।
चिन्ह मांगने वाले फरीसी और खमीर की चेतावनी
पद 11–2111फिर फरीसी निकलकर उस से वाद-विवाद करने लगे, और उसे जांचने के लिये उस से कोई स्वर्गीय चिन्ह मांगा। 12उस ने अपनी आत्मा में आह मार कर कहा, इस समय के लोग क्यों चिन्ह ढूंढ़ते हैं? मैं तुम से सच कहता हूं, कि इस समय के लोगों को कोई चिन्ह नहीं दिया जाएगा। 13और वह उन्हें छोड़कर फिर नाव पर चढ़ गया और पार चला गया॥ 14और वे रोटी लेना भूल गए थे, और नाव में उन के पास एक ही रोटी थी। 15और उस ने उन्हें चिताया, कि देखो, फरीसियों के खमीर और हेरोदेस के खमीर से चौकस रहो।
16वे आपस में विचार करके कहने लगे, कि हमारे पास तो रोटी नहीं है। 17यह जानकर यीशु ने उन से कहा; तुम क्यों आपस में यह विचार कर रहे हो कि हमारे पास रोटी नहीं? क्या अब तक नहीं जानते और नहीं समझते? 18क्या तुम्हारा मन कठोर हो गया है? क्या आंखें रखते हुए भी नहीं देखते, और कान रखते हुए भी नहीं सुनते? और तुम्हें स्मरण नहीं, 19कि जब मैं ने पांच हजार के लिये पांच रोटी तोड़ी थीं तो तुम ने टुकड़ों की कितनी टोकरियां भरकर उठाईं? उन्होंने उस से कहा, बारह टोकरियां। 20और जब चार हजार के लिये सात रोटी थीं तो तुमने टुकड़ों के कितने टोकरे भरकर उठाए थे? उन्होंने उससे कहा, सात टोकरे। 21उस ने उन से कहा, क्या तुम अब तक नहीं समझते?
“देखो, फरीसियों के खमीर और हेरोदेस के खमीर से चौकस रहो।”
चेले रोटी की कमी के बारे में सोच रहे थे, जबकि यीशु उन्हें पहले हुए चमत्कारों की याद दिला रहा था। समस्या केवल रोटी की नहीं थी; यीशु उनके समझने और स्मरण करने की कमी की ओर उनका ध्यान खींच रहा था।
बैतसैदा में अन्धे की चंगाई
पद 22–2622और वे बैतसैदा में आए; और लोग एक अन्धे को उसके पास ले आए और उस से बिनती की, कि उस को छूए। 23वह उस अन्धे का हाथ पकड़कर उसे गांव के बाहर ले गया, और उस की आंखों में थूककर उस पर हाथ रखे, और उस से पूछा; क्या तू कुछ देखता है? 24उस ने आंख उठा कर कहा; मैं मनुष्यों को देखता हूं; क्योंकि वे मुझे चलते हुए दिखाई देते हैं, जैसे पेड़। 25तब उस ने फिर दोबारा उस की आंखों पर हाथ रखे, और उस ने ध्यान से देखा, और चंगा हो गया, और सब कुछ साफ साफ देखने लगा। 26और उस ने उस से यह कहकर घर भेजा, कि इस गांव के भीतर पांव भी न रखना॥
“और उस ने ध्यान से देखा, और चंगा हो गया, और सब कुछ साफ साफ देखने लगा।”
इस घटना में चंगाई की प्रक्रिया दो चरणों में दिखाई गई है। पहले उस व्यक्ति को आंशिक रूप से दिखाई दिया, फिर यीशु ने दोबारा हाथ रखा और उसकी दृष्टि स्पष्ट हो गई।
पतरस का अंगीकार—यीशु ही मसीह है
पद 27–3027यीशु और उसके चेले कैसरिया फिलिप्पी के गांवों में चले गए: और मार्ग में उस ने अपने चेलों से पूछा कि लोग मुझे क्या कहते हैं? 28उन्होंने उत्तर दिया, कि यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला; पर कोई कोई एलिय्याह; और कोई कोई भविष्यद्वक्ताओं में से एक भी कहते हैं। 29उस ने उन से पूछा; परन्तु तुम मुझे क्या कहते हो? पतरस ने उस को उत्तर दिया; तू मसीह है। 30तब उस ने उन्हें चिताकर कहा, कि मेरे विषय में यह किसी से न कहना।
“तू मसीह है।”
भीड़ यीशु के विषय में अलग-अलग बातें कह रही थी, लेकिन यीशु ने अपने चेलों से व्यक्तिगत प्रश्न किया—“तुम मुझे क्या कहते हो?” पतरस का उत्तर अध्याय के एक निर्णायक मोड़ को सामने लाता है: “तू मसीह है।”
मसीह का दुःख, मृत्यु और पुनरुत्थान
पद 31–3331और वह उन्हें सिखाने लगा, कि मनुष्य के पुत्र के लिये अवश्य है, कि वह बहुत दुख उठाए, और पुरनिए और महायाजक और शास्त्री उसे तुच्छ समझकर मार डालें और वह तीन दिन के बाद जी उठे। 32उस ने यह बात उन से साफ साफ कह दी: इस पर पतरस उसे अलग ले जाकर झिड़कने लगा। 33परन्तु उस ने फिरकर, और अपने चेलों की ओर देखकर पतरस को झिड़क कर कहा; कि हे शैतान, मेरे साम्हने से दूर हो; क्योंकि तू परमेश्वर की बातों पर नहीं, परन्तु मनुष्य की बातों पर मन लगाता है।
“क्योंकि तू परमेश्वर की बातों पर नहीं, परन्तु मनुष्य की बातों पर मन लगाता है।”
पतरस ने यीशु को मसीह तो स्वीकार किया, लेकिन मसीह के दुःख और क्रूस के मार्ग को स्वीकार नहीं कर पा रहा था। यहाँ यीशु स्पष्ट करते हैं कि परमेश्वर की योजना को मनुष्य की अपेक्षाओं से नहीं मापा जा सकता।
क्रूस उठाकर यीशु के पीछे चलना
पद 34–3834उस ने भीड़ को अपने चेलों समेत पास बुलाकर उन से कहा, जो कोई मेरे पीछे आना चाहे, वह अपने आपे से इन्कार करे और अपना क्रूस उठाकर, मेरे पीछे हो ले। 35क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे वह उसे खोएगा, पर जो कोई मेरे और सुसमाचार के लिये अपना प्राण खोएगा, वह उसे बचाएगा। 36यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा? 37और मनुष्य अपने प्राण के बदले क्या देगा? 38जो कोई इस व्यभिचारी और पापी जाति के बीच मुझ से और मेरी बातों से लजाएगा, मनुष्य का पुत्र भी जब वह पवित्र दूतों के साथ अपने पिता की महिमा सहित आएगा, तब उस से भी लजाएगा।
“जो कोई मेरे पीछे आना चाहे, वह अपने आपे से इन्कार करे और अपना क्रूस उठाकर, मेरे पीछे हो ले।”
“यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा?”
यीशु के पीछे चलना केवल उसके बारे में विश्वास करना नहीं, बल्कि अपने जीवन को उसके अधीन करना भी है। यह भाग शिष्यत्व की कीमत और आत्मिक जीवन के वास्तविक मूल्य को सामने रखता है।
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