यीशु का रूपान्तर और स्वर्गीय महिमा
पद 1–131और उस ने उन से कहा; मैं तुम से सच कहता हूं, कि जो यहां खड़े हैं, उन में से कोई कोई ऐसे हैं, कि जब तक परमेश्वर के राज्य को सामर्थ सहित आता हुआ न देख लें, तब तक मृत्यु का स्वाद कदापि न चखेंगे॥ 2छः दिन के बाद यीशु ने पतरस और याकूब और यूहन्ना को साथ लिया, और एकान्त में किसी ऊंचे पहाड़ पर ले गया; और उन के साम्हने उसका रूप बदल गया। 3और उसका वस्त्र ऐसा चमकने लगा और यहां तक अति उज्ज्वल हुआ, कि पृथ्वी पर कोई धोबी भी वैसा उज्ज्वल नहीं कर सकता। 4और उन्हें मूसा के साथ एलिय्याह दिखाई दिया; और वे यीशु के साथ बातें करते थे।
7तब एक बादल ने उन्हें छा लिया, और उस बादल में से यह शब्द निकला, कि यह मेरा प्रिय पुत्र है; उस की सुनो।
5इस पर पतरस ने यीशु से कहा; हे रब्बी, हमारा यहां रहना अच्छा है: इसलिये हम तीन मण्डप बनाएं; एक तेरे लिये, एक मूसा के लिये, और एक एलिय्याह के लिये। 6क्योंकि वह न जानता था, कि क्या उत्तर दे; इसलिये कि वे बहुत डर गए थे। 7तब एक बादल ने उन्हें छा लिया, और उस बादल में से यह शब्द निकला, कि यह मेरा प्रिय पुत्र है; उस की सुनो। 8तब उन्होंने एकाएक चारों ओर दृष्टि की, और यीशु को छोड़ अपने साथ और किसी को न देखा॥ 9पहाड़ से उतरते हुए, उस ने उन्हें आज्ञा दी, कि जब तक मनुष्य का पुत्र मरे हुओं में से जी न उठे, तब तक जो कुछ तुम ने देखा है वह किसी से न कहना। 10उन्होंने इस बात को स्मरण रखा; और आपस में वाद-विवाद करने लगे, कि मरे हुओं में से जी उठने का क्या अर्थ है? 11और उन्होंने उस से पूछा, शास्त्री क्यों कहते हैं, कि एलिय्याह का पहिले आना अवश्य है? 12उस ने उन्हें उत्तर दिया कि एलिय्याह सचमुच पहिले आकर सब कुछ सुधारेगा, परन्तु मनुष्य के पुत्र के विषय में यह क्यों लिखा है, कि वह बहुत दुख उठाएगा, और तुच्छ गिना जाएगा? 13परन्तु मैं तुम से कहता हूं, कि एलिय्याह तो आ चुका, और जैसा उसके विषय में लिखा है, उन्होंने जो कुछ चाहा उसके साथ किया॥
रूपान्तर के समय यीशु की महिमा उनके निकटतम चेलों के सामने प्रकट हुई। मूसा और एलिय्याह का दिखाई देना भी इस घटना को परमेश्वर की पूर्व योजना और भविष्यद्वक्ताओं की गवाही से जोड़ता है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण संदेश पिता की ओर से आता है—“यह मेरा प्रिय पुत्र है; उस की सुनो।”
दुष्टात्मा से ग्रस्त बालक की चंगाई और विश्वास
पद 14–2914और जब वह चेलों के पास आया, तो देखा कि उन के चारों ओर बड़ी भीड़ लगी है और शास्त्री उन के साथ विवाद कर रहें हैं। 15और उसे देखते ही सब बहुत ही आश्चर्य करने लगे, और उस की ओर दौड़कर उसे नमस्कार किया। 16उस ने उन से पूछा; तुम इन से क्या विवाद कर रहे हो? 17भीड़ में से एक ने उसे उत्तर दिया, कि हे गुरू, मैं अपने पुत्र को, जिस में गूंगी आत्मा समाई है, तेरे पास लाया था। 18जहां कहीं वह उसे पकड़ती है, वहीं पटक देती है: और वह मुंह में फेन भर लाता, और दांत पीसता, और सूखता जाता है: और मैं ने चेलों से कहा कि वे उसे निकाल दें परन्तु वह निकाल न सके। 19यह सुनकर उस ने उन से उत्तर देके कहा: कि हे अविश्वासी लोगों, मैं कब तक तुम्हारे साथ रहूंगा और कब तक तुम्हारी सहूंगा? उसे मेरे पास लाओ। 20तब वे उसे उसके पास ले आए: और जब उस ने उसे देखा, तो उस आत्मा ने तुरन्त उसे मरोड़ा; और वह भूमि पर गिरा, और मुंह से फेन बहाते हुए लोटने लगा। 21उस ने उसके पिता से पूछा; इस की यह दशा कब से है? 22उस ने कहा, बचपन से: उस ने इसे नाश करने के लिये कभी आग और कभी पानी में गिराया; परन्तु यदि तू कुछ कर सके, तो हम पर तरस खाकर हमारा उपकार कर।
24बालक के पिता ने तुरन्त गिड़गिड़ाकर कहा; हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूं, मेरे अविश्वास का उपाय कर।
23यीशु ने उस से कहा; यदि तू कर सकता है; यह क्या बात है? विश्वास करने वाले के लिये सब कुछ हो सकता है। 24बालक के पिता ने तुरन्त गिड़गिड़ाकर कहा; हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूं, मेरे अविश्वास का उपाय कर। 25जब यीशु ने देखा, कि लोग दौड़कर भीड़ लगा रहे हैं, तो उस ने अशुद्ध आत्मा को यह कहकर डांटा, कि हे गूंगी और बहिरी आत्मा, मैं तुझे आज्ञा देता हूं, उस में से निकल आ, और उस में फिर कभी प्रवेश न कर। 26तब वह चिल्लाकर, और उसे बहुत मरोड़ कर, निकल आई; और बालक मरा हुआ सा हो गया, यहां तक कि बहुत लोग कहने लगे, कि वह मर गया। 27परन्तु यीशु ने उसका हाथ पकड़ के उसे उठाया, और वह खड़ा हो गया।
इस घटना में विश्वास को पूर्ण संदेह-रहित भावना के रूप में नहीं, बल्कि अपनी कमजोरी के साथ प्रभु के पास आने के रूप में देखा जा सकता है। पिता का यह कहना—“मैं विश्वास करता हूं, मेरे अविश्वास का उपाय कर”—विश्वास और मानवीय दुर्बलता दोनों को सामने रखता है।
28जब वह घर में आया, तो उसके चेलों ने एकान्त में उस से पूछा, हम उसे क्यों न निकाल सके? 29उस ने उन से कहा, कि यह जाति बिना प्रार्थना किसी और उपाय से निकल नहीं सकती॥
यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान की दूसरी भविष्यवाणी
पद 30–3230फिर वे वहां से चले, और गलील में होकर जा रहे थे, और वह नहीं चाहता था कि कोई जाने॥ 31क्योंकि वह अपने चेलों को उपदेश देता और उन से कहता था, कि मनुष्य का पुत्र मनुष्यों के हाथ में पकड़वाया जाएगा, और वे उसे मार डालेंगे, और वह मरने के तीन दिन बाद जी उठेगा। 32पर यह बात उन की समझ में नहीं आई, और वे उस से पूछने से डरते थे॥
31मनुष्य का पुत्र मनुष्यों के हाथ में पकड़वाया जाएगा, और वे उसे मार डालेंगे, और वह मरने के तीन दिन बाद जी उठेगा।
चेलों को यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान की बात समझ में नहीं आई और वे पूछने से भी डरते थे। अध्याय में आगे आने वाली शिक्षा दिखाती है कि यीशु केवल अपनी मृत्यु के विषय में नहीं, बल्कि अपने पीछे चलने वालों के जीवन और सेवकाई के विषय में भी उन्हें तैयार कर रहा था।
महान कौन है और बालक के समान ग्रहण करना
पद 33–3733फिर वे कफरनहूम में आए; और घर में आकर उस ने उन से पूछा कि रास्ते में तुम किस बात पर विवाद करते थे? 34वे चुप रहे, क्योंकि मार्ग में उन्होंने आपस में यह वाद-विवाद किया था, कि हम में से बड़ा कौन है?
35तब उस ने बैठकर बारहों को बुलाया, और उन से कहा, यदि कोई बड़ा होना चाहे, तो सब से छोटा और सब का सेवक बने।
36और उस ने एक बालक को लेकर उन के बीच में खड़ा किया, और उसे गोद में लेकर उन से कहा। 37जो कोई मेरे नाम से ऐसे बालकों में से किसी एक को भी ग्रहण करता है, वह मुझे ग्रहण करता है; और जो कोई मुझे ग्रहण करता, वह मुझे नहीं, वरन मेरे भेजने वाले को ग्रहण करता है॥
यीशु ने महानता की परिभाषा उलट दी। परमेश्वर के राज्य में बड़ा होने का मार्ग दूसरों पर अधिकार जमाना नहीं, बल्कि नम्र होकर सेवक बनना है।
जो हमारे विरोध में नहीं, वह हमारी ओर है
पद 38–4138तब यूहन्ना ने उस से कहा, हे गुरू हम ने एक मनुष्य को तेरे नाम से दुष्टात्माओं को निकालते देखा और हम उसे मना करने लगे, क्योंकि वह हमारे पीछे नहीं हो लेता था। 39यीशु ने कहा, उस को मत मना करो; क्योंकि ऐसा कोई नहीं जो मेरे नाम से सामर्थ का काम करे, और जल्दी से मुझे बुरा कह सके। 40क्योंकि जो हमारे विरोध में नहीं, वह हमारी ओर है। 41जो कोई एक कटोरा पानी तुम्हें इसलिये पिलाए कि तुम मसीह के हो तो मैं तुम से सच कहता हूं कि वह अपना प्रतिफल किसी रीति से न खोएगा।
40क्योंकि जो हमारे विरोध में नहीं, वह हमारी ओर है।
यहां चेलों को अपने समूह की सीमा से आगे देखने की शिक्षा दी जाती है। यीशु के नाम में होने वाले कार्य को केवल इस कारण रोकना उचित नहीं था कि वह व्यक्ति उनके साथ नहीं चलता था।
ठोकर से सावधान रहना और नमक के समान बने रहना
पद 42–5042पर जो कोई इन छोटों में से जो मुझ पर विश्वास करते हैं, किसी को ठोकर खिलाए तो उसके लिये भला यह है कि एक बड़ी चक्की का पाट उसके गले में लटकाया जाए और वह समुद्र में डाल दिया जाए। 43यदि तेरा हाथ तुझे ठोकर खिलाए तो उसे काट डाल टुण्डा होकर जीवन में प्रवेश करना, तेरे लिये इस से भला है कि दो हाथ रहते हुए नरक के बीच उस आग में डाला जाए जो कभी बुझने की नहीं। 44जहां उन का कीड़ा नहीं मरता और आग नहीं बुझती। 45और यदि तेरा पांव तुझे ठोकर खिलाए तो उसे काट डाल। 46लंगड़ा होकर जीवन में प्रवेश करना तेरे लिये इस से भला है, कि दो पांव रहते हुए नरक में डाला जाए। 47और यदि तेरी आंख तुझे ठोकर खिलाए तो उसे निकाल डाल, काना होकर परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना तेरे लिये इस से भला है, कि दो आंख रहते हुए तू नरक में डाला जाए। 48जहां उन का कीड़ा नहीं मरता और आग नहीं बुझती।
42पर जो कोई इन छोटों में से जो मुझ पर विश्वास करते हैं, किसी को ठोकर खिलाए तो उसके लिये भला यह है कि एक बड़ी चक्की का पाट उसके गले में लटकाया जाए और वह समुद्र में डाल दिया जाए।
49क्योंकि हर एक जन आग से नमकीन किया जाएगा। 50नमक अच्छा है, पर यदि नमक की नमकीनी जाती रहे, तो उसे किस से स्वादित करोगे? अपने में नमक रखो, और आपस में मेल मिलाप से रहो॥
यीशु यहां पाप और दूसरों को ठोकर खिलाने के विषय में अत्यन्त गंभीर भाषा का प्रयोग करता है। अंतिम शिक्षा “अपने में नमक रखो, और आपस में मेल मिलाप से रहो” आत्मिक जीवन में शुद्धता के साथ-साथ आपसी मेल-मिलाप की आवश्यकता पर भी बल देती है।
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