परमेश्वर की आज्ञा और मनुष्यों की रीति
पद 1–131तब फरीसी और कई एक शास्त्री जो यरूशलेम से आए थे, उसके पास इकट्ठे हुए। 2और उन्होंने उसके कई एक चेलों को अशुद्ध अर्थात बिना हाथ धोए रोटी खाते देखा। 3क्योंकि फरीसी और सब यहूदी, पुरनियों की रीति पर चलते हैं और जब तक भली भांति हाथ नहीं धो लेते तब तक नहीं खाते। 4और बाजार से आकर, जब तक स्नान नहीं कर लेते, तब तक नहीं खाते; और बहुत सी और बातें हैं, जो उन के पास मानने के लिये पहुंचाई गई हैं, जैसे कटोरों, और लोटों, और तांबे के बरतनों को धोना-मांझना। 5इसलिये उन फरीसियों और शास्त्रियों ने उस से पूछा, कि तेरे चेले क्यों पुरनियों की रीतों पर नहीं चलते, और बिना हाथ धोए रोटी खाते हैं?
6उस ने उन से कहा; कि यशायाह ने तुम कपटियों के विषय में बहुत ठीक भविष्यद्वाणी की; जैसा लिखा है; कि ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उन का मन मुझ से दूर रहता है। 7और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की आज्ञाओं को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं। 8क्योंकि तुम परमेश्वर की आज्ञा को टालकर मनुष्यों की रीतियों को मानते हो। 9और उस ने उन से कहा; तुम अपनी रीतियों को मानने के लिये परमेश्वर आज्ञा कैसी अच्छी तरह टाल देते हो! 10क्योंकि मूसा ने कहा है कि अपने पिता और अपनी माता का आदर कर; और जो कोई पिता वा माता को बुरा कहे, वह अवश्य मार डाला जाए।
11परन्तु तुम कहते हो कि यदि कोई अपने पिता वा माता से कहे, कि जो कुछ तुझे मुझ से लाभ पहुंच सकता था, वह कुरबान अर्थात संकल्प हो चुका। 12तो तुम उस को उसके पिता वा उस की माता की कुछ सेवा करने नहीं देते। 13इस प्रकार तुम अपनी रीतियों से, जिन्हें तुम ने ठहराया है, परमेश्वर का वचन टाल देते हो; और ऐसे ऐसे बहुत से काम करते हो।
“ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उन का मन मुझ से दूर रहता है।”
यीशु बाहरी धार्मिक रीति और हृदय की सच्ची भक्ति के बीच का अन्तर स्पष्ट करते हैं। मनुष्यों की परम्परा तब समस्या बन जाती है जब वह परमेश्वर की आज्ञा को पीछे कर देती है।
मनुष्य को बाहर की वस्तुएं नहीं, हृदय की बातें अशुद्ध करती हैं
पद 14–2314और उस ने लोगों को अपने पास बुलाकर उन से कहा, तुम सब मेरी सुनो, और समझो। 15ऐसी तो कोई वस्तु नहीं जो मनुष्य में बाहर से समाकर अशुद्ध करे; परन्तु जो वस्तुएं मनुष्य के भीतर से निकलती हैं, वे ही उसे अशुद्ध करती हैं। 16यदि किसी के सुनने के कान हों तो सुन ले। 17जब वह भीड़ के पास से घर में गया, तो उसके चेलों ने इस दृष्टान्त के विषय में उस से पूछा। 18उस ने उन से कहा; क्या तुम भी ऐसे नासमझ हो? क्या तुम नहीं समझते, कि जो वस्तु बाहर से मनुष्य के भीतर जाती है, वह उसे अशुद्ध नहीं कर सकती?
19क्योंकि वह उसके मन में नहीं, परन्तु पेट में जाती है, और संडास में निकल जाती है यह कहकर उस ने सब भोजन वस्तुओं को शुद्ध ठहराया। 20फिर उस ने कहा; जो मनुष्य में से निकलता है, वही मनुष्य को अशुद्ध करता है। 21क्योंकि भीतर से अर्थात मनुष्य के मन से, बुरी बुरी चिन्ता, व्यभिचार। 22चोरी, हत्या, पर स्त्रीगमन, लोभ, दुष्टता, छल, लुचपन, कुदृष्टि, निन्दा, अभिमान, और मूर्खता निकलती हैं। 23ये सब बुरी बातें भीतर ही से निकलती हैं और मनुष्य को अशुद्ध करती हैं॥
“जो मनुष्य में से निकलता है, वही मनुष्य को अशुद्ध करता है। क्योंकि भीतर से अर्थात मनुष्य के मन से…”
यीशु का ध्यान केवल बाहरी व्यवहार पर नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर के स्रोत पर है। इसलिए सच्ची शुद्धता केवल बाहर की रीति निभाने से नहीं, बल्कि हृदय के परिवर्तन से सम्बन्धित है।
सूरूफिनीकी स्त्री का विश्वास
पद 24–3024फिर वह वहां से उठकर सूर और सैदा के देशों में आया; और एक घर में गया, और चाहता था, कि कोई न जाने; परन्तु वह छिप न सका। 25और तुरन्त एक स्त्री जिस की छोटी बेटी में अशुद्ध आत्मा थी, उस की चर्चा सुन कर आई, और उसके पांवों पर गिरी। 26यह यूनानी और सूरूफिनीकी जाति की थी; और उस ने उस से बिनती की, कि मेरी बेटी में से दुष्टात्मा निकाल दे। 27उस ने उस से कहा, पहिले लड़कों को तृप्त होने दे, क्योंकि लड़कों की रोटी लेकर कुत्तों के आगे डालना उचित नहीं है।
28उस ने उस को उत्तर दिया; कि सच है प्रभु; तौ भी कुत्ते भी तो मेज के नीचे बालकों की रोटी का चूर चार खा लेते हैं। 29उस ने उस से कहा; इस बात के कारण चली जा; दुष्टात्मा तेरी बेटी में से निकल गई है। 30और उस ने अपने घर आकर देखा कि लड़की खाट पर पड़ी है, और दुष्टात्मा निकल गई है॥
“सच है प्रभु; तौ भी कुत्ते भी तो मेज के नीचे बालकों की रोटी का चूर चार खा लेते हैं।”
स्त्री ने यीशु के सामने अपनी विनती को छोड़ नहीं दिया। उसके उत्तर में विनम्रता और विश्वास दोनों दिखाई देते हैं। उसके विश्वासपूर्ण उत्तर के बाद यीशु ने उसकी बेटी के विषय में कहा कि दुष्टात्मा निकल गई है।
बहिरे और हकले मनुष्य की चंगाई
पद 31–3731फिर वह सूर और सैदा के देशों से निकलकर दिकपुलिस देश से होता हुआ गलील की झील पर पहुंचा। 32और लोगों ने एक बहिरे को जो हकला भी था, उसके पास लाकर उस से बिनती की, कि अपना हाथ उस पर रखे। 33तब वह उस को भीड़ से अलग ले गया, और अपनी उंगलियां उसके कानों में डालीं, और थूक कर उस की जीभ को छुआ। 34और स्वर्ग की ओर देखकर आह भरी, और उस से कहा; इप्फत्तह, अर्थात खुल जा।
35और उसके कान खुल गए, और उस की जीभ की गांठ भी खुल गई, और वह साफ साफ बोलने लगा। 36तब उस ने उन्हें चिताया कि किसी से न कहना; परन्तु जितना उस ने उन्हें चिताया उतना ही वे और प्रचार करने लगे। 37और वे बहुत ही आश्चर्य में होकर कहने लगे, उस ने जो कुछ किया सब अच्छा किया है; वह बहिरों को सुनने की, और गूंगों को बोलने की शक्ति देता है॥
“इप्फत्तह, अर्थात खुल जा।”
“इप्फत्तह” का अर्थ स्वयं इसी पद में “खुल जा” दिया गया है। चंगाई के बाद लोगों की प्रतिक्रिया भी उल्लेखनीय है—उन्होंने यीशु के कार्यों को देखकर कहा कि “उस ने जो कुछ किया सब अच्छा किया है।”
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