विवाह, तलाक और परमेश्वर की मूल योजना
पद 1–121जब यीशु ये बातें कह चुका, तो गलील से चला गया; और यहूदिया के देश में यरदन के पार आया। 2और बड़ी भीड़ उसके पीछे हो ली, और उस ने उन्हें वहां चंगा किया॥ 3तब फरीसी उस की परीक्षा करने के लिये पास आकर कहने लगे, क्या हर एक कारण से अपनी पत्नी को त्यागना उचित है? 4उस ने उत्तर दिया, क्या तुम ने नहीं पढ़ा, कि जिस ने उन्हें बनाया, उस ने आरम्भ से नर और नारी बनाकर कहा। 5कि इस कारण मनुष्य अपने माता पिता से अलग होकर अपनी पत्नी के साथ रहेगा और वे दोनों एक तन होंगे? 6सो अब दो नहीं, परन्तु एक तन हैं: इसलिये जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग न करे।
सो अब दो नहीं, परन्तु एक तन हैं: इसलिये जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग न करे।
7उन्होंने उस से कहा, फिर मूसा ने क्यों यह ठहराया, कि त्यागपत्र देकर उसे छोड़ दे? 8उस ने उन से कहा, मूसा ने तुम्हारे मन की कठोरता के कारण तुम्हें अपनी अपनी पत्नी को छोड़ देने की आज्ञा दी, परन्तु आरम्भ में ऐसा नहीं था। 9और मैं तुम से कहता हूं, कि जो कोई व्यभिचार को छोड़ और किसी कारण से अपनी पत्नी को त्यागकर, दूसरी से ब्याह करे, वह व्यभिचार करता है: और जो उस छोड़ी हुई को ब्याह करे, वह भी व्यभिचार करता है। 10चेलों ने उस से कहा, यदि पुरुष का स्त्री के साथ ऐसा सम्बन्ध है, तो ब्याह करना अच्छा नहीं। 11उस ने उन से कहा, सब यह वचन ग्रहण नहीं कर सकते, केवल वे जिन को यह दान दिया गया है। 12क्योंकि कुछ नपुंसक ऐसे हैं जो माता के गर्भ ही से ऐसे जन्मे; और कुछ नपुंसक ऐसे हैं, जिन्हें मनुष्य ने नपुंसक बनाया: और कुछ नपुंसक ऐसे हैं, जिन्हों ने स्वर्ग के राज्य के लिये अपने आप को नपुंसक बनाया है, जो इस को ग्रहण कर सकता है, वह ग्रहण करे।
यीशु विवाह के विषय में चर्चा को केवल मूसा की अनुमति तक सीमित नहीं रखते, बल्कि सृष्टि के आरम्भ की ओर ले जाते हैं। उनके उत्तर में विवाह की एकता और परमेश्वर की मूल योजना पर विशेष जोर दिखाई देता है।
बालकों को यीशु के पास आने देना
पद 13–1513तब लोग बालकों को उसके पास लाए, कि वह उन पर हाथ रखे और प्रार्थना करे; पर चेलों ने उन्हें डांटा। 14यीशु ने कहा, बालकों को मेरे पास आने दो: और उन्हें मना न करो, क्योंकि स्वर्ग का राज्य ऐसों ही का है। 15और वह उन पर हाथ रखकर, वहां से चला गया।
बालकों को मेरे पास आने दो: और उन्हें मना न करो, क्योंकि स्वर्ग का राज्य ऐसों ही का है।
यीशु ने बच्चों को अपने पास आने से नहीं रोका। यह दृश्य दिखाता है कि परमेश्वर के राज्य में विनम्रता, सरलता और निर्भरता का कितना महत्व है।
धनी जवान और अनन्त जीवन का प्रश्न
पद 16–2216और देखो, एक मनुष्य ने पास आकर उस से कहा, हे गुरू; मैं कौन सा भला काम करूं, कि अनन्त जीवन पाऊं? 17उस ने उस से कहा, तू मुझ से भलाई के विषय में क्यों पूछता है? भला तो एक ही है; पर यदि तू जीवन में प्रवेश करना चाहता है, तो आज्ञाओं को माना कर। 18उस ने उस से कहा, कौन सी आज्ञाएं? यीशु ने कहा, यह कि हत्या न करना, व्यभिचार न करना, चोरी न करना, झूठी गवाही न देना। 19अपने पिता और अपनी माता का आदर करना, और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना। 20उस जवान ने उस से कहा, इन सब को तो मैं ने माना है अब मुझ में किस बात की घटी है?
इन सब को तो मैं ने माना है अब मुझ में किस बात की घटी है?
21यीशु ने उस से कहा, यदि तू सिद्ध होना चाहता है; तो जा, अपना माल बेचकर कंगालों को दे; और तुझे स्वर्ग में धन मिलेगा; और आकर मेरे पीछे हो ले। 22परन्तु वह जवान यह बात सुन उदास होकर चला गया, क्योंकि वह बहुत धनी था॥
इस घटना में केवल बाहरी आज्ञाओं का पालन ही विषय नहीं है। यीशु ने उस जवान के जीवन में उस स्थान को सामने रखा जिसे उसकी सम्पत्ति ने घेर रखा था। शिष्यत्व का प्रश्न केवल “मैंने क्या किया?” नहीं, बल्कि “मेरे जीवन में सबसे बड़ा स्थान किसका है?” भी है।
धनवान और परमेश्वर के राज्य में प्रवेश
पद 23–2623तब यीशु ने अपने चेलों से कहा, मैं तुम से सच कहता हूं, कि धनवान का स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना कठिन है। 24फिर तुम से कहता हूं, कि परमेश्वर के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊंट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है। 25यह सुनकर, चेलों ने बहुत चकित होकर कहा, फिर किस का उद्धार हो सकता है?
यीशु ने उन की ओर देखकर कहा, मनुष्यों से तो यह नहीं हो सकता, परन्तु परमेश्वर से सब कुछ हो सकता है।
26यीशु ने उन की ओर देखकर कहा, मनुष्यों से तो यह नहीं हो सकता, परन्तु परमेश्वर से सब कुछ हो सकता है।
शिष्यों का प्रश्न मानव सामर्थ्य की सीमा को सामने लाता है। यीशु का उत्तर उद्धार की सम्भावना को मनुष्य की क्षमता से हटाकर परमेश्वर की सामर्थ्य पर केन्द्रित करता है।
मसीह के पीछे चलने वालों का प्रतिफल
पद 27–3027इस पर पतरस ने उस से कहा, कि देख, हम तो सब कुछ छोड़ के तेरे पीछे हो लिये हैं: तो हमें क्या मिलेगा? 28यीशु ने उन से कहा, मैं तुम से सच कहता हूं, कि नई उत्पत्ति से जब मनुष्य का पुत्र अपनी महिमा के सिहांसन पर बैठेगा, तो तुम भी जो मेरे पीछे हो लिये हो, बारह सिंहासनों पर बैठकर इस्राएल के बारह गोत्रों का न्याय करोगे। 29और जिस किसी ने घरों या भाइयों या बहिनों या पिता या माता या लड़केबालों या खेतों को मेरे नाम के लिये छोड़ दिया है, उस को सौ गुना मिलेगा: और वह अनन्त जीवन का अधिकारी होगा।
और जिस किसी ने घरों या भाइयों या बहिनों या पिता या माता या लड़केबालों या खेतों को मेरे नाम के लिये छोड़ दिया है, उस को सौ गुना मिलेगा: और वह अनन्त जीवन का अधिकारी होगा।
30परन्तु बहुतेरे जो पहिले हैं, पिछले होंगे; और जो पिछले हैं, पहिले होंगे॥
अध्याय का अन्त एक महत्वपूर्ण उलटाव के सिद्धान्त के साथ होता है: परमेश्वर के राज्य में मानव प्रतिष्ठा और परमेश्वर की दृष्टि एक जैसी नहीं होती। जो संसार की दृष्टि में पहले दिखाई देते हैं, वे पीछे हो सकते हैं, और जो पीछे दिखाई देते हैं, वे पहले हो सकते हैं।
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