दाख की बारी के मजदूरों का दृष्टान्त
पद 1–161स्वर्ग का राज्य किसी गृहस्थ के समान है, जो सबेरे निकला, कि अपने दाख की बारी में मजदूरों को लगाए। 2और उस ने मजदूरों से एक दीनार रोज पर ठहराकर, उन्हें अपने दाख की बारी में भेजा। 3फिर पहर एक दिन चढ़े, निकल कर, और औरों को बाजार में बेकार खड़े देखकर, 4उन से कहा, तुम भी दाख की बारी में जाओ, और जो कुछ ठीक है, तुम्हें दूंगा; सो वे भी गए। 5फिर उस ने दूसरे और तीसरे पहर के निकट निकलकर वैसा ही किया। 6और एक घंटा दिन रहे फिर निकलकर औरों को खड़े पाया, और उन से कहा; तुम क्यों यहां दिन भर बेकार खड़े रहे? उन्हों ने उस से कहा, इसलिये, कि किसी ने हमें मजदूरी पर नहीं लगाया। 7उस ने उन से कहा, तुम भी दाख की बारी में जाओ।
8सांझ को दाख बारी के स्वामी ने अपने भण्डारी से कहा, मजदूरों को बुलाकर पिछलों से लेकर पहिलों तक उन्हें मजदूरी दे दे। 9सो जब वे आए, जो घंटा भर दिन रहे लगाए गए थे, तो उन्हें एक एक दीनार मिला। 10जो पहिले आए, उन्होंने यह समझा, कि हमें अधिक मिलेगा; परन्तु उन्हें भी एक ही एक दीनार मिला। 11जब मिला, तो वह गृहस्थ पर कुड़कुड़ा के कहने लगे। 12कि इन पिछलों ने एक ही घंटा काम किया, और तू ने उन्हें हमारे बराबर कर दिया, जिन्हों ने दिन भर का भार उठाया और घाम सहा?
जो तेरा है, उठा ले, और चला जा; मेरी इच्छा यह है कि जितना तुझे, उतना ही इस पिछले को भी दूं।
13उस ने उन में से एक को उत्तर दिया, कि हे मित्र, मैं तुझ से कुछ अन्याय नहीं करता; क्या तू ने मुझ से एक दीनार न ठहराया? 14जो तेरा है, उठा ले, और चला जा; मेरी इच्छा यह है कि जितना तुझे, उतना ही इस पिछले को भी दूं। 15क्या उचित नहीं कि मैं अपने माल से जो चाहूं सो करूं? क्या तू मेरे भले होने के कारण बुरी दृष्टि से देखता है? 16इसी रीति से जो पिछले हैं, वह पहिले होंगे, और जो पहिले हैं, वे पिछले होंगे॥
इस दृष्टान्त में स्वर्ग के राज्य की तुलना ऐसे गृहस्थ से की गई है जो मजदूरों को अलग-अलग समय पर बुलाता है, फिर भी अन्त में उन्हें समान मजदूरी देता है। यहाँ मुख्य शिक्षा परमेश्वर की उदारता और उसकी कृपा को मानव तुलना और योग्यता की गणना से अलग दिखाना है।
यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान की भविष्यवाणी
पद 17–1917यीशु यरूशलेम को जाते हुए बारह चेलों को एकान्त में ले गया, और मार्ग में उन से कहने लगा। 18कि देखो, हम यरूशलेम को जाते हैं; और मनुष्य का पुत्र महायाजकों और शास्त्रियों के हाथ पकड़वाया जाएगा और वे उस को घात के योग्य ठहराएंगे। 19और उस को अन्यजातियों के हाथ सौंपेंगे, कि वे उसे ठट्ठों में उड़ाएं, और कोड़े मारें, और क्रूस पर चढ़ाएं, और वह तीसरे दिन जिलाया जाएगा॥
और उस को अन्यजातियों के हाथ सौंपेंगे, कि वे उसे ठट्ठों में उड़ाएं, और कोड़े मारें, और क्रूस पर चढ़ाएं, और वह तीसरे दिन जिलाया जाएगा॥
यीशु ने अपने शिष्यों को पहले से बताया कि यरूशलेम में उसके साथ क्या होने वाला है। भविष्यवाणी में दुःख, क्रूस और तीसरे दिन जिलाए जाने—तीनों बातें एक साथ दिखाई देती हैं।
महानता का मार्ग—सेवा और बलिदान
पद 20–2820तब जब्दी के पुत्रों की माता ने अपने पुत्रों के साथ उसके पास आकर प्रणाम किया, और उस से कुछ मांगने लगी। 21उस ने उस से कहा, तू क्या चाहती है? वह उस से बोली, यह कह, कि मेरे ये दो पुत्र तेरे राज्य में एक तेरे दाहिने और एक तेरे बाएं बैठें। 22यीशु ने उत्तर दिया, तुम नहीं जानते कि क्या मांगते हो? जो कटोरा मैं पीने पर हूं, क्या तुम पी सकते हो? उन्होंने उस से कहा, पी सकते हैं। 23उस ने उन से कहा, तुम मेरा कटोरा तो पीओगे पर अपने दाहिने बाएं किसी को बिठाना मेरा काम नहीं, पर जिन के लिये मेरे पिता की ओर से तैयार किया गया, उन्हें के लिये है। 24यह सुनकर, दसों चेले उन दोनों भाइयों पर क्रुद्ध हुए।
परन्तु तुम में ऐसा न होगा; परन्तु जो कोई तुम में बड़ा होना चाहे, वह तुम्हारा सेवक बने।
25यीशु ने उन्हें पास बुलाकर कहा, तुम जानते हो, कि अन्य जातियों के हाकिम उन पर प्रभुता करते हैं; और जो बड़े हैं, वे उन पर अधिकार जताते हैं। 26परन्तु तुम में ऐसा न होगा; परन्तु जो कोई तुम में बड़ा होना चाहे, वह तुम्हारा सेवक बने। 27और जो तुम में प्रधान होना चाहे वह तुम्हारा दास बने। 28जैसे कि मनुष्य का पुत्र, वह इसलिये नहीं आया कि उस की सेवा टहल करी जाए, परन्तु इसलिये आया कि आप सेवा टहल करे और बहुतों की छुड़ौती के लिये अपने प्राण दे॥
संसार में महानता अक्सर अधिकार और प्रभुत्व से जोड़ी जाती है, लेकिन यीशु अपने शिष्यों के लिये बिल्कुल अलग मॉडल देते हैं—सेवा। यीशु स्वयं इस शिक्षा का सर्वोच्च उदाहरण हैं: वे सेवा पाने नहीं, बल्कि सेवा करने और अपने प्राण देने आए।
दो अन्धों की आंखों की चंगाई
पद 29–3429जब वे यरीहो से निकल रहे थे, तो एक बड़ी भीड़ उसके पीछे हो ली। 30और देखो, दो अन्धे, जो सड़क के किनारे बैठे थे, यह सुनकर कि यीशु जा रहा है, पुकारकर कहने लगे; कि हे प्रभु, दाऊद की सन्तान, हम पर दया कर। 31लोगों ने उन्हें डांटा, कि चुप रहें, पर वे और भी चिल्लाकर बोले, हे प्रभु, दाऊद की सन्तान, हम पर दया कर। 32तब यीशु ने खड़े होकर, उन्हें बुलाया, और कहा; 33तुम क्या चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिये करूं? उन्हों ने उस से कहा, हे प्रभु; यह कि हमारी आंखे खुल जाएं।
तुम क्या चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिये करूं? उन्हों ने उस से कहा, हे प्रभु; यह कि हमारी आंखे खुल जाएं।
34यीशु ने तरस खाकर उन की आंखे छूई, और वे तुरन्त देखने लगे; और उसके पीछे हो लिए॥
भीड़ ने उन्हें चुप कराने की कोशिश की, लेकिन दोनों अन्धे और अधिक पुकारते रहे। उनकी पुकार में “दाऊद की सन्तान” कहना यीशु के प्रति उनके विश्वास और पहचान को व्यक्त करता है। यीशु ने उनकी पुकार सुनी, उन पर तरस खाया और उन्हें चंगा किया।
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