हम एक ऐसी पीढ़ी में जी रहे हैं जिसने ‘प्रेम’ को ‘सहमति’ (Consent) और ‘सहनशीलता’ का पर्याय बना दिया है। हमने परमेश्वर को एक ऐसे बूढ़े, दयालु दादाजी जैसा बना दिया है जो गलतियों को देखकर भी बस मुस्कुरा देते हैं। लेकिन जब हम उस परमेश्वर का सामना करते हैं जो कनान के विनाश का आदेश देता है, या नूह की बाढ़ में मानवता को डुबो देता है, तो हमारी बनाई हुई ‘सॉफ्ट’ तस्वीर चकनाचूर हो जाती है। हम चीखते हैं: “क्या यह क्रूरता नहीं है? क्या यह हत्या नहीं है?“ लेकिन क्या होगा अगर मैं आपसे कहूँ कि आपकी यह ‘क्रूरता’ की परिभाषा ही एक खतरनाक भ्रम है? क्या होगा अगर परमेश्वर का न्याय क्रूरता नहीं, बल्कि मानवता का उपचार हो?
न्याय के बिना प्रेम केवल भावना है, और प्रेम के बिना न्याय केवल निर्दयता है।
परमेश्वर की संप्रभुता: एक असुविधाजनक सत्य
सबसे पहले, हमें उस ‘अहंकार’ को हटाना होगा जिसे हम ‘मानवीय नैतिकता’ कहते हैं। हम एक सीमित, नाशवान प्राणी हैं जो अपनी 70-80 साल की आयु के चश्मे से उस अनंत परमेश्वर को परखना चाहते हैं जिसने समय और स्थान को बनाया है।
यदि मैं एक कलाकार हूँ और मैं अपनी पेंटिंग को फाड़ देता हूँ, तो क्या कोई मुझे ‘कातिल’ कहेगा? नहीं। क्योंकि वह मेरी रचना है। परमेश्वर ने ब्रह्मांड को शून्य से बनाया है। उन्होंने सांस दी है, उन्होंने रक्त दिया है। उनके पास अपनी रचना के ऊपर अधिकार है—न्याय करने का और मिटाने का भी। जब हम कहते हैं, “परमेश्वर को ऐसा नहीं करना चाहिए था,” तो हम असल में यह कह रहे हैं कि “परमेश्वर को मेरे बनाए हुए नियमों का पालन करना चाहिए।”
कनान और नूह: 'संहार' नहीं, 'कैंसर का अंत'
आलोचक अक्सर पूछते हैं: “परमेश्वर इतने क्रूर क्यों हैं। उदाहरण के तौर पर पुराने नियम में परमेश्वर ने कनानियों को क्यों मरवाया? (व्यवस्थाविवरण 7:1-2)” वे यह भूल जाते हैं कि कनान क्या था? कनान एक ऐसी जगह थी जहाँ नैतिकता का अंत हो चुका था। वे अपने जीवित बच्चों को मोलेक (Molech) नामक
देवता की जलती हुई गोद में फेंक देते थे। यह केवल ‘धर्म’ नहीं था; यह राक्षसी क्रूरता थी जो मानवता की नींव को गला रही थी।
अगर परमेश्वर इस बुराई को नहीं हटाते, तो यह पूरी मानव जाती में फैल जाती। परमेश्वर ने उन्हें 400 साल दिए थे (उत्पत्ति 15:16)। 400 साल! क्या यह क्रूरता है या धैर्य की पराकाष्ठा? वह न्याय तब आया जब ‘पाप का घड़ा’ लबालब भर गया था।
नूह की बाढ़ के बारे में भी यही सच है। दुनिया हिंसा और दुष्टता से इस कदर भर गई थी कि तब मनुष्यों का हर एक काम या विचार केवल बुरा था। क्या एक ऐसा परमेश्वर जो बुराई को पनपने देता है, वाकई ‘अच्छा’ कहला सकता है?
बुराई को सहना, बुराई के साथ शामिल होना है।
दाऊद का खून: एक टूटे हुए हृदय की गवाही
अक्सर कहा जाता है, “दाऊद तो हत्यारा था, फिर उसे प्रिय क्यों कहा गया?” यह तर्क इंसान की बाहरी क्रियाओं को देखता है, लेकिन परमेश्वर इंसान के ‘हृदय की दिशा’ को देखते हैं। दाऊद एक योद्धा था, उसने खून बहाया, लेकिन उसने अपनी गलतियों को कभी ‘सही साबित’ नहीं किया। भजन संहिता 51 पढ़िए। वह परमेश्वर के सामने धूल में लोट गया था।
बाइबल का परमेश्वर उन लोगों को नहीं ढूँढता जो कभी पाप नहीं करते (क्योंकि ऐसा कोई नहीं है), वह उन्हें ढूँढता है जो पाप करने के बाद अपने अहंकार को तोड़कर उसके सामने पश्चाताप करना जानते हैं।
दार्शनिक और तार्किक पहेली: अगर परमेश्वर नहीं, तो बुराई क्या है?
यहाँ नास्तिकता (Atheism) की सबसे बड़ी हार है। यदि यह ब्रह्मांड केवल परमाणुओं और संयोग का परिणाम है, तो ‘क्रूरता’ या ‘Evil’ जैसी कोई चीज है ही नहीं। हिटलर ने जो किया, वह बस ‘केमिस्ट्री’ थी। लेकिन आपका अंतर्मन चीखता है कि यह ‘गलत’ था। आप कैसे जानते हैं कि वह गलत था? क्योंकि एक ‘परम मानक’ (Objective Moral Standard) है। और वह मानक केवल एक पवित्र परमेश्वर से ही आ सकता है। यदि आप न्याय की मांग कर रहे हैं, तो आप अनजाने में ही उस परमेश्वर के अस्तित्व को स्वीकार कर रहे हैं जिसके बिना ‘न्याय’ शब्द का कोई अर्थ ही नहीं है।
क्रूस: जहाँ न्याय और प्रेम का मिलन हुआ
अगर परमेश्वर केवल प्रेमी होते, तो वे पाप को अनदेखा कर देते—लेकिन तब वे ‘पवित्र’ न होते। अगर वे केवल न्यायी होते, तो हम सभी नष्ट हो जाते। क्रूस वह जगह है जहाँ परमेश्वर ने दोनों को एक साथ पूरा किया।
उसने न्याय के लिए कीमत मांगी—और वह कीमत स्वयं चुकाई। उसने हमारे पापों का दंड अपने इकलौते पुत्र पर डाल दिया। जो परमेश्वर दूसरों को सजा देने के बजाय खुद सजा भुगत ले, उसे क्रूर कहना केवल अज्ञानता ही नहीं, बल्कि सबसे बड़ा अहसान फरामोश होना है।
अंतिम चुनौती: आप क्या चुनेंगे?
आप इस लेख को पढ़कर बस एक ‘सहानुभूति’ रख सकते हैं या आप अपनी आंखों से पर्दा हटा सकते हैं। समस्या यह नहीं है कि परमेश्वर क्रूर हैं; समस्या यह है कि हम ऐसे परमेश्वर को चाहते हैं जो हमें हमारे पापों के साथ ‘कंफर्टेबल’ रहने दे।
हम न्याय चाहते हैं, बशर्ते वह न्याय दूसरों पर हो। हम पवित्रता चाहते हैं, बशर्ते वह हमारी स्वतंत्रता में बाधा न डाले।
आज का दिन फैसला करने का है। क्या आप एक ऐसे ‘बुद्ध’ या ‘काल्पनिक’ ईश्वर की तलाश में हैं जो आपकी मर्जी से चले? या आप उस ‘जीवंत परमेश्वर’ के सामने झुकने को तैयार हैं जो न केवल सत्य है, बल्कि प्रेम का स्रोत भी है?
न्याय आ रहा है। यह क्रूरता नहीं होगी, यह वह ‘सफाई’ होगी जिसकी यह दुनिया भूखी है। क्या आप उस दिन के लिए तैयार हैं?
सत्य कहीं बाहर नहीं, आपके भीतर दस्तक दे रहा है। क्या आप दरवाजा खोलेंगे?

