जब हम पुराने नियम को पढ़ते हैं, तो “व्यवस्था” शब्द बार-बार हमारे सामने आता है। विशेष रूप से निर्गमन, लैव्यव्यवस्था और व्यवस्थाविवरण की पुस्तकों में हमें बहुत-सी आज्ञाएँ और निर्देश मिलते हैं। इन्हें पढ़ते समय एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है—परमेश्वर ने इतनी सारी व्यवस्थाएँ आखिर क्यों दीं? क्या मनुष्य को परमेश्वर से उद्धार पाने के लिए इन सभी नियमों का पालन करना था? और यदि आज हम यीशु मसीह में विश्वास और अनुग्रह की बात करते हैं, तो फिर पुराने नियम की व्यवस्था हमारे लिए इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
इस प्रश्न का उत्तर समझने के लिए सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि व्यवस्था केवल नियमों की एक लंबी सूची नहीं थी। परमेश्वर ने इस्राएल को मिस्र की दासता से बाहर निकालने के बाद उन्हें अपनी विशेष प्रजा के रूप में स्थापित किया और फिर उन्हें बताया कि उसके साथ वाचा में रहने वाले लोगों का जीवन कैसा होना चाहिए। उनकी आराधना, सामाजिक जीवन, न्याय, शुद्धता, बलिदान और दैनिक व्यवहार—इन सभी क्षेत्रों के लिए व्यवस्था दी गई थी।
यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण बात ध्यान देने योग्य है। परमेश्वर ने पहले इस्राएल को मिस्र की दासता से निकाला और उसके बाद व्यवस्था दी। निर्गमन 20:2 में दस आज्ञाएँ देने से पहले परमेश्वर कहता है, “मैं तेरा परमेश्वर यहोवा हूं, जो तुझे मिस्र देश अर्थात दासत्व के घर से निकाल लाया है।” इसका अर्थ बहुत सरल है—पहले छुटकारा, फिर व्यवस्था।
इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं। मान लीजिए किसी व्यक्ति को वर्षों की कैद से बाहर निकालकर स्वतंत्र कर दिया जाता है। उसके बाद उसे बताया जाता है कि अब स्वतंत्र समाज में उसे किस प्रकार जिम्मेदारी और अनुशासन के साथ जीवन जीना है। वे नियम उसकी स्वतंत्रता खरीदने के लिए नहीं दिए गए, क्योंकि वह पहले ही स्वतंत्र किया जा चुका है। इसी प्रकार इस्राएल को पहले मिस्र की दासता से छुड़ाया गया और फिर परमेश्वर ने उन्हें अपनी प्रजा के रूप में जीवन जीने की व्यवस्था दी।
इसलिए यह समझना जरूरी है कि मूसा की व्यवस्था का उद्देश्य केवल उद्धार प्राप्त करने का रास्ता देना नहीं था। बाइबल में उद्धार और परमेश्वर पर विश्वास की कहानी मूसा की व्यवस्था से बहुत पहले शुरू हो चुकी थी। उदाहरण के लिए, उत्पत्ति 15:6 में अब्राहम के विषय में लिखा है, “उसने यहोवा पर विश्वास किया; और यहोवा ने इस बात को उसके लेखे में धार्मिकता गिना।” यह घटना उस समय की है जब मूसा की व्यवस्था अभी दी ही नहीं गई थी। इसलिए पुराने नियम को इस तरह समझना सही नहीं होगा कि पहले लोग नियमों का पालन करके उद्धार पाते थे और बाद में यीशु के आने पर विश्वास का मार्ग शुरू हुआ। इस विषय को ठीक से समझने के लिए हमें अब्राहम की वाचा और मूसा की वाचा के बीच का अंतर भी समझना होगा, जिस पर हम अगले लेख में विस्तार से विचार करेंगे।
तो फिर व्यवस्था का उद्देश्य क्या था? सबसे पहले, व्यवस्था ने इस्राएल को एक ऐसी प्रजा के रूप में व्यवस्थित किया जो परमेश्वर के साथ वाचा में थी। उन्हें यह सिखाया गया कि परमेश्वर की आराधना कैसे करनी है, समाज में न्याय कैसे बनाए रखना है, अपने जीवन को पवित्रता के अनुसार कैसे चलाना है और दूसरी जातियों के बीच अपनी अलग पहचान कैसे बनाए रखनी है। इस दृष्टि से व्यवस्था उनके पूरे जीवन से संबंधित थी, केवल धार्मिक स्थान या आराधना से नहीं।
व्यवस्था का एक दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य मनुष्य को पाप की गंभीरता समझाना था। जब परमेश्वर हत्या, चोरी, झूठी गवाही, व्यभिचार और लालच जैसी बातों के विरुद्ध आज्ञा देता है, तो वह यह स्पष्ट करता है कि उसके सामने सही और गलत क्या है। इसे हम आईने के उदाहरण से समझ सकते हैं। आईना हमारे चेहरे पर गंदगी पैदा नहीं करता, लेकिन वह हमें यह दिखा देता है कि हमारे चेहरे पर गंदगी है। उसी प्रकार व्यवस्था मनुष्य के भीतर पाप पैदा नहीं करती; वह मनुष्य को पाप को पहचानने और उसकी गंभीरता समझने में सहायता करती है।
व्यवस्था में बलिदानों और आराधना से संबंधित निर्देश भी थे। पशु बलिदान, रक्त, वेदी, याजक और अन्य धार्मिक विधियाँ पुराने नियम की व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा थीं। लेकिन इन सभी को एक ही अर्थ में समझना सही नहीं होगा। अलग-अलग बलिदानों के अलग-अलग उद्देश्य थे। इसलिए केवल यह कहना कि “पुराने नियम में जानवर इसलिए मारे जाते थे ताकि पाप क्षमा हो जाए” पूरी तस्वीर नहीं बताता। परमेश्वर को रक्त और पशु बलिदान की आवश्यकता क्यों थी, यह अपने आप में इतना महत्वपूर्ण विषय है कि हम इसे आगे एक अलग लेख में विस्तार से समझेंगे।
इसी प्रकार पुराने नियम की कुछ व्यवस्थाएँ आज के पाठक को बहुत कठिन या अजीब लग सकती हैं। भोजन से संबंधित नियम, सब्त, दासता, मृत्यु दण्ड, विवाह और तलाक से संबंधित व्यवस्थाएँ तथा कनान की जातियों के विरुद्ध युद्ध जैसे विषय गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं। इन प्रश्नों से बचना आवश्यक नहीं है। बल्कि एक गंभीर बाइबल विद्यार्थी को इन्हें ईमानदारी से पूछना चाहिए। लेकिन किसी भी व्यवस्था को समझने से पहले हमें यह देखना होगा कि वह किसे दी गई थी, किस वाचा के अंतर्गत दी गई थी, उस समय उसका उद्देश्य क्या था और बाइबल की आगे की शिक्षा में उसे किस प्रकार समझाया गया है।
यही कारण है कि पुराने नियम की किसी व्यवस्था को पढ़ते समय हमें तुरंत यह नहीं पूछना चाहिए कि “क्या मुझे भी आज यही करना है?” उससे पहले हमें उसका संदर्भ समझना चाहिए। एक ही प्रश्न हमें बार-बार पूछना होगा—यह व्यवस्था किसके लिए थी, क्यों दी गई थी और परमेश्वर की बड़ी योजना में इसका स्थान क्या था?
इसलिए व्यवस्था को समझने की हमारी पहली कुंजी यह है कि इसे केवल नियमों की पुस्तक न समझें। यह इस्राएल के साथ परमेश्वर की वाचा, उनके जीवन, उनकी आराधना, उनके समाज और पाप के प्रति उनकी समझ का महत्वपूर्ण हिस्सा थी। व्यवस्था ने उन्हें परमेश्वर की पवित्रता दिखाई, उनके जीवन को व्यवस्थित किया और आगे आने वाली परमेश्वर की उद्धार की योजना की पृष्ठभूमि तैयार की।
लेकिन अभी हमारी यात्रा की शुरुआत ही हुई है। यदि हम व्यवस्था को सही ढंग से समझना चाहते हैं, तो अगला प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है—मूसा से पहले क्या था? अब्राहम परमेश्वर के साथ किस वाचा में था? क्या अब्राहम के समय भी परमेश्वर की कोई व्यवस्था थी? और मूसा के द्वारा दी गई व्यवस्था आने से वास्तव में क्या बदला?
इन प्रश्नों के उत्तर हमें व्यवस्था की पूरी तस्वीर समझने में एक महत्वपूर्ण कदम आगे ले जाएँगे।
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