पिछले लेख में हमने समझा कि परमेश्वर ने इस्राएल को मिस्र की दासता से निकालने के बाद उन्हें व्यवस्था दी। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—यदि मूसा की व्यवस्था इतनी महत्वपूर्ण थी, तो मूसा से पहले परमेश्वर के लोग कैसे जीते थे? अब्राहम, इसहाक और याकूब के समय कौन-सी व्यवस्था थी? क्या वे परमेश्वर के सामने धर्मी ठहरने के लिए मूसा की व्यवस्था का पालन करते थे?
इस प्रश्न को समझे बिना पुराने नियम की व्यवस्था को ठीक से समझना कठिन है। इसका कारण यह है कि बाइबल में परमेश्वर का मनुष्य के साथ संबंध केवल मूसा से शुरू नहीं होता। मूसा से बहुत पहले परमेश्वर ने अब्राहम को बुलाया, उससे प्रतिज्ञा की और उसके साथ एक विशेष वाचा बाँधी। इसलिए हमें पहले यह देखना होगा कि अब्राहम के साथ परमेश्वर ने क्या किया और बाद में मूसा के द्वारा क्या जोड़ा गया।
अब्राहम और विश्वास
उत्पत्ति 12 में परमेश्वर अब्राहम को बुलाता है और उससे कहता है कि वह अपने देश और अपने पिता के घर को छोड़कर उस देश में जाए जिसे परमेश्वर उसे दिखाएगा। परमेश्वर उससे एक बड़ी जाति बनाने, उसे आशीष देने और उसके द्वारा पृथ्वी के परिवारों के आशीषित होने की प्रतिज्ञा करता है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि उस समय मूसा की व्यवस्था अस्तित्व में नहीं थी। न सिनै पर्वत था, न दस आज्ञाएँ दी गई थीं और न ही बलिदानों तथा याजकों की वह पूरी व्यवस्था थी जिसे हम बाद में देखते हैं। फिर भी अब्राहम परमेश्वर के साथ संबंध में था और उसके जीवन में विश्वास की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
उत्पत्ति 15:6 में लिखा है, “उसने यहोवा पर विश्वास किया; और यहोवा ने इस बात को उसके लेखे में धार्मिकता गिना।” यह वचन हमें एक बहुत महत्वपूर्ण सिद्धांत दिखाता है—परमेश्वर के साथ मनुष्य के संबंध को केवल नियमों के पालन तक सीमित करके नहीं समझा जा सकता। अब्राहम का जीवन हमें दिखाता है कि विश्वास परमेश्वर की योजना में व्यवस्था दिए जाने से पहले भी महत्वपूर्ण था।
लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं कि अब्राहम परमेश्वर की आज्ञाओं की परवाह नहीं करता था। जब परमेश्वर ने उसे बुलाया, उसने आज्ञा मानकर अपना देश छोड़ा। उसने परमेश्वर पर विश्वास किया और उसके निर्देश के अनुसार आगे बढ़ा। इसलिए बाइबल में विश्वास और आज्ञाकारिता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
फिर मूसा के समय क्या बदला?
अब हम निर्गमन की ओर आते हैं। सदियों बाद अब्राहम की संतानों की संख्या बढ़ चुकी थी और वे मिस्र में एक बड़ी प्रजा बन चुके थे। लेकिन वे मिस्र की दासता में थे। परमेश्वर ने मूसा के द्वारा उन्हें वहाँ से बाहर निकाला और सिनै पर्वत पर उनके साथ वाचा बाँधी।
यहीं से मूसा की व्यवस्था का एक नया चरण शुरू होता है।
यहाँ अंतर समझना बहुत जरूरी है। अब्राहम के साथ परमेश्वर की वाचा में मुख्य रूप से उसकी प्रतिज्ञा और परमेश्वर की पहल दिखाई देती है। मूसा के समय इस्राएल एक पूरी प्रजा के रूप में सामने है, और अब उन्हें यह बताया जाना है कि परमेश्वर के साथ वाचा में रहने वाली इस प्रजा का जीवन कैसा होगा।
इसे एक परिवार के उदाहरण से समझ सकते हैं। किसी परिवार में पिता अपने बच्चे से कह सकता है, “तुम मेरे बच्चे हो और मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ।” यह उसके संबंध की बात है। लेकिन जब बच्चा बड़ा होकर परिवार की जिम्मेदारियों को समझने लगता है, तो उसे घर के नियम भी बताए जाते हैं—क्या करना है, क्या नहीं करना है और दूसरों के साथ कैसे व्यवहार करना है। नियम संबंध को पैदा नहीं करते, बल्कि संबंध के भीतर जीवन को व्यवस्थित करते हैं।
इसी प्रकार मूसा की व्यवस्था को समझने में यह अंतर महत्वपूर्ण है। व्यवस्था इस्राएल के साथ परमेश्वर की वाचा के जीवन को व्यवस्थित करती थी।
क्या अब्राहम और मूसा की वाचा एक ही थीं?
नहीं, दोनों को बिल्कुल एक जैसा समझना उचित नहीं होगा। अब्राहम की वाचा में परमेश्वर की प्रतिज्ञा, वंश और आशीष का विशेष स्थान है। मूसा की वाचा में इस्राएल को एक प्रजा के रूप में परमेश्वर की आज्ञाओं के अनुसार जीवन जीने की जिम्मेदारी दी गई।
इसका अर्थ यह नहीं कि परमेश्वर ने अपनी पहले की प्रतिज्ञा बदल दी थी। बल्कि बाइबल की कहानी आगे बढ़ रही थी। अब्राहम से की गई प्रतिज्ञा के माध्यम से एक प्रजा अस्तित्व में आती है और फिर उस प्रजा को मूसा के द्वारा एक विशेष वाचा और व्यवस्था दी जाती है।
इसीलिए हमें अब्राहम के विश्वास और मूसा की व्यवस्था को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करने से बचना चाहिए। अब्राहम हमें दिखाता है कि परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर विश्वास करना कितना महत्वपूर्ण है, जबकि मूसा की व्यवस्था हमें दिखाती है कि परमेश्वर के साथ वाचा में रहने वाली इस्राएली प्रजा को किस प्रकार जीवन जीना था।
एक बहुत महत्वपूर्ण अंतर
अब यहाँ से हमारे लिए एक बड़ी बात स्पष्ट होती है। परमेश्वर की योजना मूसा से शुरू नहीं हुई थी। मूसा की व्यवस्था परमेश्वर की पूरी योजना का एक महत्वपूर्ण चरण थी, लेकिन उससे पहले अब्राहम था, उससे पहले परमेश्वर की प्रतिज्ञा थी और उसके पीछे परमेश्वर की अपनी योजना थी।
इसलिए जब हम किसी व्यवस्था को पढ़ते हैं, तो हमें केवल यह नहीं देखना चाहिए कि “क्या लिखा है?” बल्कि यह भी देखना चाहिए कि यह व्यवस्था परमेश्वर की बड़ी योजना में कहाँ आती है।
यही समझ आगे हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि अब अगला बड़ा प्रश्न उठता है—यदि मूसा की व्यवस्था में इतनी सारी अलग-अलग आज्ञाएँ थीं, तो वे सभी किस प्रकार की थीं? क्या हत्या न करने की आज्ञा और किसी विशेष पशु के मांस से दूर रहने की आज्ञा एक ही प्रकार की थी? क्या सब्त और बलिदान की व्यवस्था को भी उसी तरह समझना चाहिए?
इन प्रश्नों का उत्तर हमें अगले लेख में मिलेगा, जहाँ हम पुराने नियम की व्यवस्थाओं के अलग-अलग प्रकार और उनके उद्देश्य को एक साथ समझेंगे।
आगे पढ़ें:
पुराने नियम की व्यवस्था कितनी प्रकार की थी?
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