1. परमेश्वर की व्यवस्था (Law) का उद्देश्य
- रोमियों 3:20 – “इस कारण व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी उसके सामने धर्मी न ठहरेगा, क्योंकि व्यवस्था के द्वारा तो पाप की पहिचान होती है।”
- गलातियों 3:24 – “इसलिए व्यवस्था मसीह तक पहुँचाने को हमारा शिक्षक बनी, कि हम विश्वास के द्वारा धर्मी ठहरें।”
- निर्गमन 20:1-17 – दस आज्ञाएँ, जो परमेश्वर ने मूसा को दीं।
- व्यवस्था विवरण 27:26 – “जो इस व्यवस्था की बातों को पूरा करने के लिये नहीं करता, वह श्रापित हो।”
- भजन संहिता 19:7 – “यहोवा की व्यवस्था खड़ी-खोटी है, वह प्राण को बहाल कर देती है; यहोवा की चितौनियाँ सच्ची हैं, वे भोले को बुद्धिमान बनाती हैं।”
2. व्यवस्था पाप को दिखाती है, लेकिन उद्धार नहीं दे सकती
- रोमियों 7:7 – “तो हम क्या कहें? क्या व्यवस्था पाप है? कदापि नहीं! परन्तु मैंने पाप को तो व्यवस्था के द्वारा ही जाना; और यदि व्यवस्था यह न कहती कि ‘लालच न कर,’ तो मैं लालच को न जानता।”
- रोमियों 3:23 – “क्योंकि सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं।”
- याकूब 2:10 – “क्योंकि जो सारी व्यवस्था का पालन करे, परन्तु एक ही बात में ठोकर खाए, वह सब दोषों का अपराधी ठहरता है।”
3. अनुग्रह (Grace) द्वारा उद्धार
- यूहन्ना 1:17 – “क्योंकि व्यवस्था तो मूसा के द्वारा दी गई, परन्तु अनुग्रह और सच्चाई यीशु मसीह के द्वारा पहुँची।”
- रोमियों 6:14 – “इसलिए कि पाप का तुम पर प्रभुत्व न होगा, क्योंकि तुम व्यवस्था के अधीन नहीं, वरन् अनुग्रह के अधीन हो।”
- रोमियों 3:24 – “और उसके अनुग्रह से उस छुड़ाए जाने के कारण जो मसीह यीशु में है, सेंतमेंत धर्मी ठहराए जाते हैं।”
- इफिसियों 2:8-9 – “क्योंकि अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, विश्वास के द्वारा; और यह तुम्हारी ओर से नहीं, यह परमेश्वर का दान है; और न कर्मों के कारण, कि कोई घमण्ड करे।”
- 2 कुरिन्थियों 5:21 – “जो पाप से अज्ञात था, उसे उसने हमारे लिये पाप ठहराया; कि हम उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ।”
4. अनुग्रह हमें एक नया जीवन देता है
- तितुस 2:11-12 – “क्योंकि परमेश्वर का अनुग्रह सब मनुष्यों की उद्धार के लिए प्रगट हुआ है। वह हमें शिक्षा देता है कि हम अभक्ति और सांसारिक अभिलाषाओं से मन फेर कर इस युग में संयम, धार्मिकता, और भक्ति से जीवन बिताएँ।”
- रोमियों 5:1 – “इसलिए कि हम विश्वास के द्वारा धर्मी ठहरे, तो परमेश्वर के साथ हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा मेल-मिलाप हो।”
- रोमियों 8:1-2 – “इसलिए अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं; क्योंकि जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने मसीह यीशु में मुझे पाप और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र कर दिया।”
- 2 कुरिन्थियों 12:9 – “परन्तु उसने मुझसे कहा, ‘मेरा अनुग्रह तुझे पर्याप्त है; क्योंकि मेरी सामर्थ्य निर्बलता में सिद्ध होती है।’”
5. तो क्या हमें अब व्यवस्था की जरूरत नहीं?
- मत्ती 5:17 – “यह न समझो कि मैं व्यवस्था या भविष्यद्वक्ताओं की बातों को लोप करने आया हूँ; मैं लोप करने नहीं, परन्तु पूरा करने आया हूँ।”
- यूहन्ना 14:15 – “यदि तुम मुझसे प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे।”
- रोमियों 3:31 – “तो क्या हम विश्वास के द्वारा व्यवस्था को व्यर्थ ठहराते हैं? कदापि नहीं! वरन् हम व्यवस्था को स्थिर रखते हैं।”
6. निष्कर्ष – व्यवस्था और अनुग्रह का संतुलन
- गलातियों 2:16 – “परन्तु यह जानकर कि मनुष्य व्यवस्था के कामों से नहीं, परन्तु यीशु मसीह पर विश्वास करने के द्वारा धर्मी ठहरता है, हम ने भी मसीह यीशु पर विश्वास किया, कि हम मसीह पर विश्वास करने से धर्मी ठहरें, न कि व्यवस्था के कामों से; क्योंकि व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी धर्मी नहीं ठहरेगा।”
- रोमियों 10:4 – “क्योंकि मसीह सब विश्वास करनेवालों के लिए धार्मिकता के निमित्त व्यवस्था का अन्त है।”
- गलातियों 5:4 – “तुम जो व्यवस्था के द्वारा धर्मी ठहरना चाहते हो, मसीह से अलग और अनुग्रह से गिर गए हो।”
समाप्ति
परमेश्वर की व्यवस्था हमें पाप की पहचान कराती है, लेकिन उद्धार नहीं देती। उद्धार केवल अनुग्रह से होता है, जो यीशु मसीह में विश्वास करने से मिलता है। हालाँकि, अनुग्रह हमें परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलने की शक्ति भी देता है, इसलिए हमें उसके मार्गदर्शन का पालन करना चाहिए।