हिन्दू धर्म ग्रंथों में वर्णित बेतुकी बातें – कहाँ कहाँ से उत्पन्न हुए मानव शिशु

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इस देश में एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसे लोगों का है, जो विज्ञान के प्रत्येक आधुनिक आविष्कार के बाद यह दावा करने लगता है कि इस का आविष्कार तो हमारे पूर्वजों ने बहुत पहले ही कर लिया था और इस के समर्थन के लिए उदाहरण ढूंढ़ते हुए वे वेदोंपुराणों तक सरपट दौड़ लगाने लगते हैं. जब से आधुनिक वैज्ञानिकों ने टेस्ट ट्यूब में से बच्चे को पैदा किया है, तब से ये लोग यह सिद्ध करने के लिए हाथपैर मार रहे हैं कि उन के पूर्वजों ने यह चमत्कार तो हजारों वर्ष पहले ही कर दिखाया था. इस के लिए वे वेदों, पुराणों आदि की काल्पनिक एवं असंभाव्य किस्से कहानियों को वैज्ञानिक शब्दावली के पैबंद लगा कर पेश कर रहे हैं और इस तरह के लेख कई पत्रपत्रिकाओं ने बड़े जोरशोर से प्रकाशित हो रहे हैं. इस से पहले कि हम उन किस्सेकहानियों को उद्धृत कर उन पर विचार करें, हमें यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि ‘टेस्ट ट्यूब बेबी’ ( परखनली शिशु ) है क्या और उस की उत्पत्ति की प्रक्रिया क्या है.

इस प्रक्रिया को अंगरेजी में ‘इन विट्रो फरटेलाइजेशन एंड एंब्रियो ट्रांसफर’ (आई.वी.एफ.ई.टी.) कहते हैं. जिस का अर्थ है-परखनली में उपजाऊपन और गर्भ का स्थानांतरण. इस प्रक्रिया में क्या किया जाता है? इस में स्त्री के डिंबाशय में हारमोनों द्वारा डिंब को परिपक्व किया जाता है, तब उसे वहां से निकाला जाता है. डिंबाशय से डिंब को निकालने के लिए अब ‘अल्ट्रा साउंड तरंगों’ का उपयोग किया जाने लगा है. जब तरंगें महिला के गर्भ में छोड़ी जाती हैं तो डिंबाशय के डिंब अल्ट्रा साउंड यंत्र के परदे पर उभरने लगते हैं. इन डिंबों को एस्पाइरेटर द्वारा निकाल दिया जाता है. ( इस प्रक्रिया में न तो स्त्री को बेहोश किया जाता है और न ही ज्यादा देर लगती है. पूरी क्रिया में मरीज को एक सूई चुभोई जाती है. ) इन निकाले गए डिंबों का सूक्ष्मदर्शी यंत्र से निरीक्षण करने के बाद उन्हें ‘पेट्री डिश’ में रखा जाता है, जिस में जीवाणुरहित पोषक द्रव्य होता है.

उक्त विधि से प्राप्त डिंबों को छः घंटे तक तथा नर शुक्राणुओं को 30 मिनट तक 37 डिग्री सेंटीग्रेड पर इनक्यूबेटर में रख कर गतिशील किया जाता है. पूर्वोक्त ‘पेट्री डिश’ में डिंबों और शुक्राणुओं को मिला कर फिर इसी इनक्यूबेटर में रख दिया जाता है. दो दिन बाद ये भ्रूण में बदलना शुरू कर देते हैं. इन भ्रूणों को एक नली द्वारा हवा के दबाव से महिला के गर्भ में स्थापित कर दिया जाता है और उचित समय पर स्त्री बच्चे को जन्म देती है.

संक्षेप में यह है परखनली में शिशु. यहां हम ने पेचीदा डाक्टरी शब्दावली के स्थान पर सरल शब्दावली में सारी प्रक्रिया प्रस्तुत कर दी है, जिसे आम आदमी भी आसानी से समझ सकता है. अब हमें यह देखना है कि हिंदू धर्म ग्रंथों की किस तरह की किस्सेकहानियों को अतीतवादी हिंदू ‘परखनली में जन्मे शिशुओं के उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत करते नहीं अघाते. प्रस्तुत हैं ऐसे कुछ उदाहरण और उन के विषयों में विभिन्न ग्रंथों के विवरण:

घड़े से उत्पन्न हुए ऋषि अगस्त्य और वसिष्ठ

ऋग्वेद में आता है कि मित्र और वरुण देवता उर्वशी नामक अप्सरा को देख कर कामपीड़ित हुए. उन का वीर्य स्खलित हो गया, जिसे उन्होंने यज्ञ के कलश में डाल दिया. उसी कलश से अगस्त्य और वसिष्ठ उत्पन्न हुए
ऋग्वेद { 7/33/11-13 }

अर्थात “हे वसिष्ठ, तुम मित्र और वरुण के पुत्र हो. हे ब्रह्मन्, तुम उर्वशी के मन से उत्पन्न हो. उस समय मित्र और वरुण का वीर्य स्खलन हुआ था. विश्वदेवगण ने दैव्य स्तोत्र द्वारा पुष्कर के बीच तुम्हें धारण किया था. यज्ञ में दीक्षित मित्र और वरुण ने स्तुति द्वारा प्रार्थित हो कर कुंभ के बीच एकसाथ ही रेत (वीर्य) स्खलन किया था. अनंतर मान (अगस्त्य ) उत्पन्न हुए. लोग कहते हैं कि ऋषि वसिष्ठ उसी कुंभ से जन्मे थे.”

किस प्रकार हुई शिव पुत्र कार्तिकेय की उत्पत्ति

वाल्मीकीय रामायण. के में आता है कि अग्नि देवता ने गंगा को गर्भवती किया. जब वह उसे धारण करने में कठिनाई अनुभव करने लगीं तो उस ने उसे हिमालय के पास एक जंगल में फेंक दिया. उस फेंके हुए गर्भ से जो बालक उत्पन्न हुआ, वह कार्तिकेय ( शिव का दूसरा पुत्र) कहलाया.


वाल्मीकि रामायण { 1 / 37 / 12, 14-15, 17-18, 21-23 }
अर्थात देवताओं के पास प्रतिज्ञा कर के अग्नि देवता गंगा के पास आया और बोला, ‘हे देवी, तुम मुझ से गर्भधारण करो. देवताओं की यह इच्छा है.’ तब अग्नि ने उसे सींच दिया अर्थात गर्भवती कर दिया. वह उस के तेजोमय गर्भ को धारण करने में कठिनाई अनुभव करने लगी. गंगा ने अग्नि के कथनानुसार उस गर्भ को हिमालय के पास फेंक दिया. उस के फेंकने पर एक तेजस्वी बालक कुमार अर्थात कार्तिकेय पैदा हुआ.

एक ही स्त्री से उत्पन्न हुए साठ हजार पुत्र – वाल्मीकि रामायण 

वाल्मीकीय रामायण के बालकांड में एक अन्य कथा आती है, जिस में बताया गया है कि राजा सगर की दो रानियां थीं-केशिनी और सुमति केशिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया, लेकिन सुमति के गर्भ से एक तूंबा निकला. उस के फटने से साठ हजार पुत्र उस से निकले.


वाल्मीकीय रामायण के{ 1/38/17-18}

अर्थात सुमति ने एक तूंबे को जन्म दिया. उसे फाड़ कर साठ हजार पुत्र निकले. उन्हें धायाओं ने घी के घड़ों में डाल दिया. काफी समय बाद वे सब बड़े हो गए. ब्रह्मांडपुराण के {51 / 39-46 } में इस कथा के कुछ अन्य सूक्ष्म अंश भी दिए गए हैं. उस में आता

अर्थात सुमति ने तब एक गर्भ तूंबे को जन्म दिया. तभी वहां और्व ऋषि अकस्मात आ पहुंचा. उस ने राजा से कहा कि इस तूंबे को फेंको नहीं. इस में तेरे साठ हजार पुत्रों का बीज निहित है. इसे काट कर साठ हजार टुकड़े करो और प्रत्येक को घृत के एकएक घड़े में रख कर ऊपर से ढक दो. समय पूरा होने पर वे उन घड़ों को तोड़ कर अपने आप बाहर आ जाएंगे. राजा ने ऐसा ही किया. एक वर्ष के बाद एकएक घड़े को तोड़ कर वे बाहर निकलने शुरू हो गए.

छींक मारने से के द्वारा नायक से उत्पन्न हुआ इक्ष्वाकु 

विष्णु पुराण में आता है कि मनु ने छींक मारी और एक बच्चा उस के सामने में आ गिरा : – विष्णुपुराण 4 /2/11 अर्थात छींकने के समय मनु की नाक से इक्ष्वाकु नामक पुत्र का जन्म हुआ.

पार्वती को देख ब्रम्हा के वीर्य स्खलन से उत्पन्न हुए असंख्य  ब्रह्मचारी 

शिव पुराण के 18 वें अध्याय में आता है कि शिव और पार्वती के विवाह में जब पार्वती ने अभी चार प्रदक्षिणाएं ही की थीं कि ब्रह्मा को पार्वती का अंगूठा दिखाई दे गया. उसे देखते ही वह कामोन्मत्त हो गया और उस का वीर्य स्खलित हो गया. वह वीर्य ब्रह्मा की गोद में गिरा. उस ने उसे छिपाना चाहा, लेकिन उस से असंख्य ब्रह्मचारी पैदा हो गए :

गिरे वीर्य से हजार वर्ष बाद बच्चा

ब्रह्मवैवर्तपुराण में आता है कि कृष्ण ने अपना वीर्य स्खलित होने पर उसे लज्जावश पानी में मिला दिया. उस से एक हजार वर्ष उपरांत एक बच्चा उत्पन्न हुआ


ब्रह्मवैवर्तपुराण {4/23-24 }
अर्थात काम वशीभूत हुए कृष्ण का वीर्य स्खलित हो गया. उन्होंने देव सभा में लज्जावश उसे छिपाते हुए पानी में गिरा दिया. एक हजार वर्ष के पश्चात वह डिंभ बन गया और उस से महान विराट का जन्म हुआ.

ब्रह्मवैवर्तपुराण में आता है कि कृष्ण ने अपना वीर्य स्खलित होने पर उसे लज्जावश पानी में मिला दिया. उस से एक हजार वर्ष उपरांत एक बच्चा उत्पन्न हुआ
ब्रह्मवैवर्तपुराण {4/23-24 }
अर्थात काम वशीभूत हुए कृष्ण का वीर्य स्खलित हो गया. उन्होंने देव सभा में लज्जावश उसे छिपाते हुए पानी में गिरा दिया. एक हजार वर्ष के पश्चात वह डिंभ बन गया और उस से महान विराट का जन्म हुआ.

लकड़ी से पुत्र

देवी भागवत पुराण में आता है कि एक बार वेदव्यास यज्ञ के लिए आग जलाने के उद्देश्य से अरणीमंथन ( बांस की छड़ियों को रगड़ना) कर रहे थे तभी घृताची नामक अप्सरा को देख कर कामोन्मत्त हो गए. उन का वीर्यपात हो गया, जो अरणी पर गिरा. उस से एक व्यास समान आकृतिवाला पुत्र उत्पन्न हुआ जो शुकदेव कहलाया:
देवी भागवत पुराण १/१४ / ४-८
अर्थात उसे (घृताची अप्सरा को) देखते ही व्यास कामवश हो गए. घृताची ने उन का मन हर लिया. आग पैदा करने के लिए अरणी मंथन करते मुनि का वीर्य अरणी पर ही गिर गया. उस की परवाह न करते हुए व्यास अरणीमंथन करते रहे. उस से व्याससदृश आकृति वाला शुक नामक बालक पैदा हुआ.

श्रीमद्भागवतपुराण में आता है कि अपने बड़े भाई उतथ्य की गर्भवती पत्नी ममता के साथ बृहस्पति ने बलात्कारपूर्वक संभोग किया और उस के वीर्य से भरद्वाज नामक पुत्र उत्पन्न हुआ.
श्रीमद्भागवतपुराण 9/20/36-39

अर्थात, बृहस्पति गर्भवती भावज से संभोग में प्रवृत्त हुआ. उसे रोका. वह गर्भ को शाप दे कर संभोगरत हुआ और उस का वीर्य स्खलित हुआ. उस वीर्य को भावज फेंकना चाहती थी ताकि उस का पति उस से नाराज हो कर उसे त्याग न दे. तब देवताओं ने कहा- हे मूर्ख औरत, इस द्वाज ( वीर्य ) को भर ( धारण किए रह). उस ने उसे धारण किया और जिस पुत्र को उस ने जन्म दिया वह ‘भरद्वाज’ कहलाया.

दोने से द्रोणाचार्य

यही भरद्वाज एक बार गंगास्नान करने गया. वहां उस ने स्नान कर के कपड़े बदल रही घृताची नामक अप्सरा को देखा. उस के शरीर के एक भाग से उस का कपड़ा सरक गया. उसे देख भरद्वाज का वीर्य स्खलित हो गया, जिसे उस ने एक द्रोण ( दोने अथवा प्याले) में रख दिया. उस से एक बालक उत्पन्न हुआ, जो द्रोण से उपजने के कारण ‘द्रोण’ कहलाया.

महाभारत आदिपर्व, 129/33-38

सरकंडे से कृपाचार्य

महाभारत बताता है कि शरद्वान ऋषि ने जानपदी नामक अप्सरा को वन में जब एकवसना देखा तो उस का वीर्यपात हो गया जो एक सरकंडे के गुच्छे पर गिरा. उस से कृप नामक बालक पैदा हुआ जो कौरवों और पांडवों का धनुर्वेद का आचार्य बना. महाभारत लिखता है:

– आदिपर्व, 129/6-20
अर्थात तब इंद्र ने जानपदी नाम की अप्सरा को भेजा. उसे वन में एक वस्त्र पहने देख कर शरद्वान की आंखें फट गईं. उस के हाथ से धनुषबाण गिर गए. शरीर कांपने लगा. उस का वीर्य स्खलित हो गया. वह वीर्य सरकंडे के गुच्छे पर गिर गया. उस से दो बच्चे ( एक लड़का और एक लड़की ) उत्पन्न हुए शिक को उस के एक आदमी ने ये बच्चे दिखाए. वह उन्हें घर 331 / 864 के ⠀⠀ पर कृपा कर के उन्हें पालापोसा था, अतः उन के नाम कृप कृपी.

आदमी की कोख से लड़का

श्रीमद्भागवतपुराण में आता है कि राजा युवनाश्व ने एक बार इंद्रयज्ञ रचा. रात को प्यास से पीड़ित हो कर वह यज्ञशाला में पहुंचा. वहां पुरोहितों को सोते देख कर वह एक घड़े में से पानी कर पी गया. उस पानी को पुत्रोत्पन्न करने वाले मंत्रों से अभिमंत्रित किया हुआ था, अतः राजा के पेट में से कुछ समय बाद उस की दाईं कोख को फाड़ कर एक बालक उत्पन्न हुआ जो बाद में मांधाता नाम का चक्रवर्ती में राजा हुआ:
श्रीमद्भागवतपुराण के {9/6/26-31}

जंघाओं और भुजाओं से बच्चे

इसी पुराण में अन्यत्र आता है कि राजा वेन के मर जाने पर ऋषियों ने उस की जांघ का मंथन किया और उस से निषाद नामक पुत्र उत्पन्न हुआ:

श्रीमद्भागवतपुराण4/14/43-45
अर्थात ऋषियों ने मृत राजा वेन की जंघा का बहुत तेजी से मंथन किया. उस से एक आदमी निकला. उस का कौए जैसा काला रंग था. वह छोटे अंगों, छोटी भुजाओं, बड़ी ठुड्डी, छोटे हाथों, आगे से नीची नासिका, लाल आंखों और तांबई केशों वाला था. वह निषाद कहलाया. फिर उसी मृत राजा की भुजाओं को रगड़ा गया. उन से पुनः एक लड़का और एक लड़की पैदा हुए : -श्रीमद भगवत पुराण 4/15/1 5

अर्थात फिर उस पुत्रहीन राजा के शव की भुजाओं का विनों ने मंथन किया. उन से एक लड़का और एक लड़की उपजे. उन्हें देख कर ब्रह्मवेत्ता ऋषियों ने कहा, यह लड़का पृथु नाम से विख्यात होगा और महाराज बनेगा तथा यह लड़की अर्चि नाम से जानी जाएगी.

गाय से मानव शिशु

पद्मपुराण के में आता है कि आत्माराम नामक निस्संतान ब्राह्मण को एक महात्मा एक बार ऐसा फल दिया जिस के खाने से अपनेआप गर्भ ठहर सकता था. ब्राह्मण ने ने यह फल खुद न खा कर अपनी गाय को खिला दिया. – पद्मपुराण, उत्तरखंड4/62-65

अर्थात तीन महीने के बाद गाय ने एक सुंदर, दिव्य और स्वर्ण की तरह चमक रहे बालक को जन्म दिया. लोग कौतुकवश कहने लगे, देखो आज आत्मदेव की किस्मत जागी है. उस बच्चे के कान गाय के कानों के समान थे, अतः आत्मदेव ने बालक का नाम ‘गोकर्ण’ रख दिया.

लोथड़े से 101 बच्चे

महाभारत के आदि पर्व में आता है कि धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी के पेट में दो साल तक गर्भ ठहरा रहा, जबकि उधर कुंती ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया. उस से खिन्न हो कर उस ने अपने गर्भ को एक दिन बहुत पीटा, जिस से उस का गर्भपात हो गया. उस गिरे मांस के लोथड़े को उठा कर वह बाहर फेंकना चाहती थी कि तभी वहां व्यास ने उपस्थित हो कर कहा कि इस के सौ टुकड़े कर के उन्हें घृतपूर्ण घड़ों में जल्दी से रख दो. उस ने अंगूठे की पोर के परिमाप के एक सौ एक टुकड़े कर के उन्हें घृतकुंभों में सुरक्षित रख दिया. तीन महीनों में उन घड़ों से सौ पुत्र और एक लड़की उत्पन्न हुई :
महाभारत, आदिपर्व, ११४/९-१३, १८-२२, ४०-४१

आग से दो बच्चे

महाभारत का कहना है कि राजा द्रुपद के पुत्रेष्टि यज्ञ रानी को खिलाने के लिए एक विशेष तरह का पदार्थ तैयार किया गया था. उसे रानी ने यज्ञशाला में उपस्थित हो कर ग्रहण करना था, परंतु ऋतुमती होने के कारण वह यज्ञशाला में उपस्थित हो कर उसे ग्रहण न कर सकी. इस पर याज नामक पुरोहित ने वह पदार्थ अग्नि में फेंक दिया : – महाभारत आदिपर्व, 166/39, 44

अर्थात याज ने इस प्रकार कह कर उस पदार्थ को, हवन सामग्री को, जल रहे हवन कुंड में फेंक दिया. उस में से एक लड़का निकला, जो देवताओं के समान था. उस से द्रौपदी नामक एक लड़की भी निकली जो बहुत सुंदर अंगों वाली थी. वह लड़का धृष्टद्युम्न कहलाया जो महाभारत युद्ध में पांडवों का सेनापति बना.

मछली के पेट से मानव

महाभारत में राजा उपरिचर की कथा आती है जिस में कहा गया है कि उक्त राजा का एक बार जंगल में वीर्यपात हो गया. उस ने उसे उठा कर पत्ते पर रखा और उसे बाज के हाथ अपनी पत्नी के पास उसे धारण करने के लिए भेज दिया. जब वह पक्षी उसे ले जा रहा था तब उस पर दूसरा बाज झपट पड़ा जिस से वह वीर्य नीचे नदी में गिर गया और उसे मछली बनी हुई एक अप्सरा निगल गई. दस महीनों के बाद वह मछली पकड़ी गई. उस के पेट में मछेरों को एक लड़का और एक लड़की मिले. राजा उपरिचर ने लड़के का नाम ‘मत्स्य’ रखा और उसे अपना लिया, जबकि लड़की मछेरों को सौंप दी, जो बाद में सत्यवती नाम से प्रसिद्ध हुई और पराशर के पुत्र व्यास की मां बनी. _

महाभारत, आदिपर्व, 63/34, 49-50,54,57,59-61, 63, 67,86

खीर से गर्भ

राम और उन के भाइयों की उत्पत्ति के विषय में वाल्मीकीय रामायण में लिखा है कि जब राजा दशरथ की उम्र साठ हजार वर्ष की हो गई तो उन्होंने एक यज्ञ का आयोजन किया.
– बालकांड, 16/11, 15-20,30

अर्थात उस यज्ञ के अग्निकुंड में से एक पुरुष निकला. उस के हाथों में ख से भरा एक पात्र था. उस ने वह पात्र दशरथ को देते हुए कहा, “राजन, इस ख को तुम अपनी पत्नियों को खाने के लिए दो. इस से तुम्हें पुत्रों की प्राप्ति होगी.’ रानियों ने उसे खाया और गर्भवती हो गईं. उचित समय पर उन्होंने चार पुत्रों को जन्म दिया.

खेत में उगा मानवशिशु

सीता के विषय में रामायण का कहना है कि जब राजा जनक खेतों में हल चला रहा था तब वह उसे खेतों में से मिली थी. जनक ने क्योंकि उसे जमीन से उठाया था, अतः वह अयोनिजा ( स्त्री के पेट से न पैदा हुई ) कही गई. – बालकांड, 66 / 13-15

अर्थात जनक का कथन है कि जब मैं हल चला रहा था तब यह हल के फाले से ऊपर को आई थी. इस का नाम सीता है. यह धरती से पैदा हुई मेरी पुत्री है. यह किसी मानवी के पेट से उत्पन्न नहीं हुई है.

ये कहानियां मुख्यतः दो भागों में विभक्त की जा सकती हैं- 1 अज्ञानजन्य 2. बेसिरपैर की. अज्ञानजन्य कहानियों को पुनः चार उपशीर्षकों में विभक्त किया जा सकता है.

( क ) ऐसी कहानियां जो इस अज्ञानवश पेश की जाती हैं कि बच्चा परखनली में ही जन्मता है, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं होता; जैसा कि पहले हम ने देखा है. जिन कहानियों में घड़ों में से बच्चे जन्मते दिखाए गए हैं, उन्हें पेश करने वाले लोग इसी अज्ञानता के शिकार हैं.

(ख) ऐसी कहानियां जो पेट और गर्भाशय के अंतर को न समझने के कारण पेश की जाती हैं. बच्चा गर्भाशय में विकसित होता है, न कि पेट में. इसी अज्ञान के कारण मुंह से निगले वीर्य से पेट में बच्चे विकसित होते हैं और इस तरह की कहानियों को परखनली शिशु के प्रतिरूप बताने वाले इसी प्रकार की अज्ञानता के शिकार हैं.

(ग) ऐसी कहानियां जो वीर्य के कीटाणुओं की प्रकृति से परिचित न होने के कारण पेश की जाती हैं. इन में वीर्य को ऐसे पदार्थ के रूप में पेश किया जाता है जिस पर दूसरे जीवाणुओं, तापमान की कमीबेशी आदि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता और उस की कार्यक्षमता वैसी की वैसी ही रहती है, जबकि असलियत यह है कि एक निश्चित तापमान से कम या अधिक होने पर उस के जीवाणु नष्ट हो जाते हैं और उन की उत्पादन क्षमता समाप्त हो जाती है. जिन कहानियों में वीर्य को लकड़ी पर गिरा हुआ, पत्तों आदि पर पड़ा हुआ

दिखाया गया है, उन्हें पेश करने वाले लोग वीर्य की प्रकृति संबंधी अज्ञान के शिकार हैं.

(घ) ऐसी कहानियां जिन्हें भ्रूण की प्रकृति के विषय में अज्ञानता के कारण पेश किया जाता है. भ्रूण को तरल नाइट्रोजन में रख कर ( नाइट्रोजन 270 सेंटीग्रेड पर तरल होती है) सुरक्षित रखा जा सकता है. उस में दो साल तक भ्रूण रह सकता है परंतु जिन कहानियों में भ्रूण के सौ या साठ हजार टुकड़े कर के उन्हें घृतकुंभों में रखा जाना चित्रित है और जिन में उन घड़ों से तीन महीने के अंदर बच्चे जन्मते दिखाए गए हैं, उन्हें पेश करने वाले लोग भ्रूण संबंधी ज्ञान के अभाव में ही ऐसा कर रहे हैं.

शेष सब कहानियां जिन में आग की लपटों से बच्चे जन्मते हैं, गाय और घोड़े मानव शिशुओं को जन्म देते हैं, नाक, जंघा व भुजाओं में से बच्चे निकलते हैं, उन्हें परखनली शिशु के प्रमाण स्वरूप पेश करना न केवल अज्ञानता का ढिंढोरा पीटना है बल्कि बेतुकापन, बेहूदापन, पागलपन और बेसिरपैर की हांकना भी है.

संक्षेप में कहा जा सकता है कि धर्म ग्रंथों की इन व ऐसी कहानियों का विज्ञान की अपेक्षा अज्ञान से संबंध है. इस तरह लालबुझक्कड़ों की भांति दूर की अनमिली कड़ियों को खींचखींच कर मिलाने के प्रयासों से न हिंदू धर्म ग्रंथों की महिमा बढ़ सकती है और न खुद हिंदू समाज का ही कल्याण हो सकता है. हां, इन से वैज्ञानिक विचारधारा के पनपने के रास्ते में बाधाएं अवश्य खड़ी हो सकती हैं.

जरूरत है वैज्ञानिक विचारधारा को अपनाने और इस तरह हीनभावनाग्रस्त व पलायनवादी मानसिकता को त्यागने की. इसी में हिंदू समाज और समूचे देश का कल्याण निहित है.

 

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